विचार
कृषि कानूनों से होने वाला बाज़ार का उदारीकरण किसानों का हित करेगा या अहित

मैं कृषि कानूनों के समर्थन में इसलिए हूँ कि मेरे बाप-दादा जनसंघ के जमाने से आज तक की भाजपा सरकार को पसंद करते हैं। वहीं विपक्ष में मेरे मित्र इस कानून के विरोध में इसलिए हैं कि उनके बाप-दादा कांग्रेस की विचारधारा का समर्थन करते आए हैं!

कितने लोगों ने इन कानूनों को पढ़ा होगा, कहना मुश्किल है। सब कुछ सोशल मीडिया से देखा-सुना, उसी आधार पर अधिकांश जनता नए कृषि कानूनों का समर्थन-विरोध कर रही है। वहीं कुछ तो सिर्फ विरोध के लिए विरोध व कुछ समर्थन के लिए सरकार की हाँ में हाँ मिला रहे हैं!

कितने ही नेताओं के भक्त व चमचे कभी खेत में उतरे नहीं होंगे, पर किसानों के पक्ष-विपक्ष में बड़ी-बड़ी डींगें हाँक रहें हैं। कुछ इस तरह का ही यह समर्थन-विरोध कृषि सुधार कानूनों व किसान आंदोलन पर दिख रहा है! भारत में ‛एक राष्ट्र, एक कृषि बाजार’ बनाने व 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने के लिए वर्तमान सरकार कृषि क्षेत्र में तीन कानून कुछ माह पूर्व अध्यादेश के रूप में लाई।

पहला, कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश 2020, इसके तहत किसान अपनी पसंद के बाज़ार में अपनी उपज बेच पाएँगे। साथ ही इससे सरकार को उम्मीद है कि किसानों को फसलों का बेहतर दाम मिलेगा।

वहीं दूसरा कानून “मूल्‍य आश्‍वासन पर किसान समझौता और कृषि सेवा अध्‍यादेश 2020” किसानों को एक राष्ट्रीय ढाँचा देगा जिससे कृषि व्यवसाय से जुड़ी कंपनियाँ, प्रसंस्करक, थोक व्यापारी और निर्यातकों और किसानों के बीच पहले से तय कीमतों पर समझौते की छूट होगी।

साथ ही किसी किसान के साथ कोई धोखाधड़ी या उसकी उपज का उचित दाम उसके द्वारा किए अनुबंध पर नहीं मिलता है तो जिले के अनुविभागीय अधिकारी या जिला कलेक्टर से वह सीधे शिकायत कर सकता है। ऐसी शिकायतों के निपटारे के लिए इस कानून में समय सीमा 30 दिन भी निर्धारित की गई है।

इसके अलावा पुराने आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में संशोधन किया, ताकि अनाज, दलहन और प्याज सहित खाद्य वस्तुओं को नियमन के दायरे से बाहर किया जा सके। सरकार को उम्मीद है कि इससे इन वस्तुओं का व्यापार मुक्त तरीके से किया जा सकेगा और इससे किसानों की आय बढ़ाने में मदद मिलेगी।

कृषि मंडी का एक दृश्य

संशोधन के जरिये राष्ट्रीय आपदाओं, अकाल के साथ कीमतों में बेतहाशा वृद्धि जैसी असाधारण परिस्थितियों में ही खाद्य पदार्थों के नियमन की बात कही गई है। इसके अलावा प्रोसेसर और मूल्य श्रृंखला प्रतिभागियों को भंडारण सीमा से छूट दी गई है।

खैर, ये सरकार के राजनीतिक बयान या आश्वासन भी माने जा सकते हैं। लेकिन जब आप इन तीनों कानूनों का अध्ययन करेंगे तो इनमें कुछ भी ऐसा नहीं पाएँगे, जिससे किसानों के संवैधानिक अधिकारों का हनन होता हो। यदि कानून में यह कहा गया है कि किसान अपनी उपज को एक राज्य से ले जाकर दूसरे राज्य में बेच सकता है। तो इसमें गलत क्या है? व्यापार करने का अधिकार भारत के हर नागरिक का संविधान के तीसरे भाग में मौलिक अधिकार है।

इसको ऐसे भी समझ सकते हैं- उदाहरण के लिए किसान के उत्पाद आलू से कंपनियाँ कितने ही तरह की चिप्स बनाकर संपूर्ण भारत में बेच सकती हैं, लेकिन वही किसान अपने उत्पाद को एक राज्य से दूसरे राज्यों में क्यों नहीं बेच सकता!

खेती किसानी लाभ का धंधा तब ही बनेगी, जब एक मुक्त बाज़ार मिलेगा व किसान के सामने अपने माल को बेचने के लिए एक से अधिक विकल्प बाज़ार में उपलब्ध होगे। और यदि ऐसा नहीं होता है तो कोई भी सरकार किसानों को सब्सिडी या अन्य कोई राहत देकर उसका सर्वांगीण विकास नहीं कर सकती है।

एक बात जिसपर किसानों को भ्रमित किया जा रहा है, वह एमएसपी को लेकर है। इसपर कृषि मंत्री स्वयं लोकसभा में अपने बयान में कह चुके हैं कि “न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को बरकरार रखा जाएगा।” उन्‍होंने कहा कि इन विधेयकों से फसलों के एमएसपी पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। किसानों से एमएसपी पर फसलों की खरीद जारी रहेगी।

किसानों के साथ संवाद में कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर

“सरकारी खरीद की व्‍यवस्‍था खत्‍म नहीं की जा रही है, बल्कि किसानों को और विकल्‍प दिए गए हैं जहाँ वे अपनी फसल बेच सकते हैं। मंडी में जाकर लाइसेंसी व्यापारियों को ही अपनी उपज बेचने की मजबूरी खत्‍म हो गई है।”

कृषि सुधारों से संबंधित इन तीनों कानूनों को मैंने पढ़ा व एक अधिवक्ता व विधि का प्रोफेसर होने के नाते गहराई से समझने की कोशिश की जिसमें मुझे यही समझ में आया कि ये तीनों कानून कृषि क्षेत्र में कुल मिलाकर उदारीकरण व खुली बाजार अर्थव्यवस्था के लिए ही लाऐ गए हैं।

यदि ऐसा नहीं होता तो कृषि मंत्री तोमर यह नहीं कहते कि ‘कृषि उत्पाद व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश, 2020’ राज्य कृषि उपज विपणन कानून के तहत अधिसूचित बाज़ारों के अहाते के बाहर अवरोध मुक्त अंतर-राज्य और अन्य राज्यों के साथ व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा देगा।

साथ ही यह भी पाया कि कृषि क्षेत्र व ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक मजबूत आर्थिक सेक्टर बनाने की ओर सरकार का यह महत्त्वपूर्ण कदम है जैसा कि स्मार्ट सिटी के मामले में वर्तमान सरकार ने कई महत्त्वपूर्ण कार्य किए हैं। या यह भी कह सकते हैं कि कृषि क्षेत्र के लिए उदारीकरण भारत में 30 वर्षों के बाद आया है।

जो काम दशकों पहले राज्यों को करना चाहिए था, वह ऐतिहासिक कार्य केंद्र सरकार ने किया है। वह भी संवैधानिक दायरे में रहकर। इसके अलावा कृषि व इससे संबंधित विषय में राज्यों को कानून बनाने का अधिकार है। वहीं वर्तमान कृषि सुधार कानूनों में यदि कुछ भी असंवैधानिक है तो उसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। लेकिन हर बात पर सड़क पर आना कोई विकल्प नहीं है।

किसानों का विरोध प्रदर्शन

वहीं जो लोग यह कह रहे हैं कि यह सरकार किसान-विरोधी है, उन्हें ऐसा कहने से पहले इस तथ्य पर भी ध्यान देना चाहिए कि इसी मोदी सरकार ने अन्नदाता के सम्मान में 6,000 रुपये सालाना सीधे किसानों के खातों में पहुँचाए हैं। मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार ने इसी सम्मान राशि को बढ़ाकर 10,000 रुपये कर दिया।

ग्रामीण भारत में लाखों किसानों के पक्के घर बनाने में मोदी सरकार व भाजपा की राज्य सरकारों ने ईमानदारी से सहयोग किया है। बिजली कितने ही सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में आजादी के सात दशकों बाद इस सरकार में पहुँची है। हाँ, सरकार ने कुछ जल्दबाज़ी ज़रूर की है, बजाय अध्यादेश के सरकार को इन कानूनों को संसद में बिल के रूप में पटल पर रखकर गहन चर्चा करके पारित कराना था लेकिन कोरोना काल के सीमित संसदीय सत्र में ऐसा नहीं हो सका।

यदि विधेयक के रूप में यह कानून आते तो हो सकता था कि आम जनता व भारत के किसान का विश्वास सरकार की नीयत पर और बढ़ जाता। और शायद कुछ प्रदेशों के किसान संगठन सड़कों पर नहीं आते। लेकिन विरोध के नाम पर सड़क जाम करके आम आदमी को परेशान करना व राष्ट्र की संपत्ति को नुकसान पहुँचाना कहाँ तक उचित है ?

साथ ही किसान आंदोलन की आड़ में खालिस्तान समर्थकों के पोस्टर नज़र आना किसानों व देश के साथ गद्दारी है। लोकतंत्र में विरोध करने की स्वतंत्रता सभी को है लेकिन इसकी आड़ में संवैधानिक व्यवस्था को बिगाड़ने का अधिकार किसी को नहीं है। विपक्ष व दलाल सावधान रहें, भारत का अन्नदाता सब कुछ देख रहा है। अब ग्रामीण भारत राजधानियों से ज्यादा दूर नहीं है।