विचार
पुलवामा हमले के बाद- जनसंवेदनाएँ और सरकार की मुद्रा

आशुचित्र- पुलवामा हमले के बाद सरकार पर लोगों के आक्रोश से अधिक उनके भरोसे को बनाए रखने का दबाव है।

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में आतंकियों द्वारा हमला और उसमे 44 सीआरपीएफ जवानों के सर्वोच्च बलिदान के बाद देश भर में संवेदनाएँ अपने ज्वार पर हैं। इससे पहले सितंबर 2016 में उरी में हुए हमले के बाद भी लोगों ने बदले की कार्यवाही की अपेक्षाएंँ की थीं, और उस बार सेना द्वारा पाकिस्तान की सीमा में घुसकर आतंकी ठिकानों को निशाना भी बनाया गया था। ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की एक कार्यवाही ने भारतीय जनमानस में जो आत्म-विश्वास पैदा किया जो कि अभूतपूर्व था।

इसके बाद हुआ पुलवामा में भीषण हमला जनमानस को झकझोरता है। आतंकवाद की शरणस्थली बन चुके पाकिस्तान के भीतर जाकर वार करने और सुरक्षित लौट आने के विजयी भाव ने जनमानस में जिस शक्ति की भावना को जागृत किया वह एक बार फिर चुनौती का अनुभव कर रही है। देश भर में अलग-अलग जगहों पर सामान्य नागरिक बिना किसी पूर्व योजना के सड़कों पर निकल रहे हैं और पाकिस्तान तथा उसके हमदर्दों के प्रति अपने गुस्से का खुला इज़हार कर रहे हैं। इस तरह के स्वतःस्फूर्त प्रदर्शनों से यह पता चलता है कि जन सामान्य में आक्रोश बहुत गहरा है और इस हमले में अपनी जान गँवाने वाले जवानों के प्रति लोगों में एक अपनत्व का मज़बूत भाव भी है। विशेष यह भी है कि पुलवामा हमले के बाद जो व्यापक जनसंवेदनाएँ उभरी हैं, वे विशुद्ध देशभक्ति के भाव से उपजी हैं। इसलिए यह संवेदनाएँ सरकार विरोधी नहीं हैं और इतना ही नहीं इस बार यह भी देखने को मिल रहा है कि जो राजनीतिज्ञ पुलवामा हमले का प्रयोग सरकार को घेरने के लिए कर रहे हैं, उनके खिलाफ आम लोगों में तुरंत प्रतिक्रिया हो रही है।

यह एक बड़ा परिवर्तन है जिससे अब यह साफ़ हो चुका है कि जनता के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा राजनीति का मुद्दा नहीं है। राष्ट्रीय सुरक्षा को पूर्व में अनेकों बार राजनीतिक गुणा-गणित के लिए दाँव पर लगाया गया है। हमारे देश ने ऐसी भी स्थितियां देखीं हैं जहाँ मात्र अपने विरोधियों को नीचा दिखाने के लिए ‘हिन्दू आतंकवाद’ का जिन्न खड़ा करके उससे राजनीति गयी है। भारतीय राजनीति की घरेलू कुटिलताओं से उपजे ‘हिंदू आतंकवाद’ के काल्पनिक तर्क का प्रयोग करके पाकिस्तान ने भारत को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर घेरा और भारत को आतंकवाद के उत्पादक के रूप में प्रस्तुत किया। यह सब कुछ मात्र इस लिए हुआ था क्योंकि देश की कुछ पार्टियों को चुनावों में अपने वोट बढ़ाने थे और अपने प्रतिस्पर्धियों को अपमानित करना था। लेकिन, आज हम यह कह सकते है कि सामान्य नागरिकों ने राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न को राजनीति से पृथक करके जिस परिपक्वता का परिचय दिया है उससे भविष्य में सुरक्षा को राजनीति का शिकार बना पाना कठिन होगा।

इस बार लोगों का गुस्सा सिर्फ पाकिस्तान पर या शस्त्र-पकड़ने वाले आतंकियों पर ही नहीं है बल्कि वे उन अभिजात्य माने जाने वाले बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और स्वघोषित उदारवादियों से अधिक क्रुद्ध हैं जो आतंकी हमलों के बाद अनावश्यक रूप से शांति के महत्त्व पर प्रवचन करके मूल समस्या पर पर्दा डाल देते हैं। अब भी इन लोगों में यह कहने का दुस्साहस शेष है कि ‘आतंकवाद का कोई मज़हब नहीं होता’। जब स्वयं पुलवामा हमले की जिम्मेदारी लेने वाले जैश-ऐ-मुहम्मद का कहना है वह इस्लाम की लड़ाई लड़ रहा है तब ऐसे में रटी- रटाई सेक्युलर मुहावरेबाज़ी समाज के साथ धोखा है। इनके द्वारा लंबे समय से यह काम किया जा रहा है। इन्हें यह अनुभव होना चाहिए कि वे एक पूरे समाज को भ्रमित करने का काम कर रहे हैं तथा आतंकवाद जैसे घातक खतरे के विरुद्ध भी एक साझी आम राय बनने में बाधा खड़ी कर रहे हैं। इनमें से अधिकतर लोग अपने स्वयं के जीवन में कथनी-करनी के भेद और पाखंडी रवैये के कारण सार्वजनिक रूप से पहचान में आ चुके हैं।

घर के भीतर के रह कर परिवार के प्रति निष्ठा नहीं रखने वाले इन लोगों के लिए उपयुक्त उपचार यही होगा कि आम लोगों के बीच इनकी ठीक से पहचान करायी जाये और इनका सामाजिक बहिष्कार किया जाये। सिर्फ यह उम्मीद करना कि सरकारें इस तरह की मानसिकता वाले लोगों पर कार्यवाही करेंगी अपनी सामाजिक भूमिका से मुँह मोड़ने के बराबर है। आखिर जिहादी मानसिकता को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से संरक्षण देने वाले इन लोगों में यह अनुभूति होनी चाहिए कि मज़हबी उन्माद या किसी विशेष विचारधारा का अनुसरण करते हुए भारत-विरोध की सीमा तक चले जाने की तगड़ी कीमत होती है।

पिछले कुछ वर्षों में यह आम लोगों द्वारा भी महसूस किया गया है कि देश पर होने वाले आतंकी हमलों की तादात और उनका फैलाव दोनों घटा है। पहले की अपेक्षा आतंकियों को हमले करने में कम सफलता मिल रही है और दुर्भाग्य से जो हमले करने में आतंकी सफल भी हो रहे हैं, वे सीमा के क्षेत्रों में ही हो रहे हैं। लेकिन साथ ही साथ इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि आतंकियों द्वारा अब आम नागरिकों के बजाय सेना और सैन्य प्रतिष्ठानों को लक्ष्य किया जा रहा है। जम्मू-कश्मीर और पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्रों को छोड़ कर देश के अन्य सभी भागों में जनमानस के भीतर अपनी सुरक्षा को लेकर भरोसे का भाव बीते कुछ सालों में पुख्ता हुआ है।

आज सरकार और सेना के ऊपर इस भरोसे को बनाए रखने की चुनौती है। जो लोग सड़कों पर लगातार उतर रहे हैं उनकी संवेदनाओं के प्रवाह की दिशा और गति को यथोचित सम्मान मिलना चाहिए। वे अपने भरोसे को जीतते हुए देखना चाहते हैं।

लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में  राजनीति शास्त्र के शोधार्थी हैं।