विचार
पुलवामा हमले के बाद घृणा-अपराध जाँचकर्ता स्वयं के मौलिक सिद्धांतों की जाँच करें

आशुचित्र- गुरुवार को पुलावमा में सीआरपीएफ पर हुए हमले में हर जगह घृणा-अपराध व्याप्त है लेकिन संभवतः इसे भारतीय घृणा-अपराध में नहीं आँका जाएगा।

14 फरवरी को जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादी आदिल अहमद दार ने विस्फोटक से लदे वाहन को सीआरपीएफ की बस में टकरा दिया जिसमें 44 जवान वीरगति को प्राप्त हो गए लेकिन उसके इस अपराध पर कई वेबसाइटों द्वारा चलाए जा रहे घृणा-अपराध भारी पड़ सकते हैं।

एक ऐसी ही वेबसाइट जो कथित तौर पर गौरक्षा संबंधी घृणा-अपराध की हिंसाओं का ब्यौरा रखती है, ने दावा किया कि 2012 से ऐसी 124 घटनाएँ हुई हैं जिसमें 46 लोगों की मौत हुई और इसमें से अधिकांश मुस्लिम थे। गुरुवार को पुलवामा में सीआरपीएफ पर हमले में हर जगह घृणा-अपराध निहित है जिसका प्रणेता दार है और उसके वीडियो ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उसके मन में गौमुत्र पीने वाले हिंदुओं के प्रति कितनी घृणा थी। उसने यह भी दावा किया कि इस तरह की सोच रखने वाले भविष्य में और ऐसे घृणा-अपराधों को अंजाम देंगे।

लेकिन इसकी पूरी संभावना है कि यह स्व-घोषित घृणा अपराध जिसमें 44 जवान शहीद हुए, भारतीय घृणा-अपराध सूची में नहीं आँका जाएगा। इसे प्राधिकारियों और मीडिया द्वारा एक ऐसी आतंक गतिविधि करार दिया जाएगा जिसका किसी समुदाय या घृणा से कोई संबंध नहीं है।

क्या यह सही समय नहीं है जब हम कुछ अपराधों को घृणा-अपराध कहना बंद कर दें और अन्य को कुछ और? अपराध अपराध हैं और उनका किसी प्रकार का नामकरण कर हम विवाद उत्पन्न कर रहे हैं या तो घृणा-अपराध को बढ़ावा दे रहे हैं। क्यों भावी दार इस असंतुलित घृणा-अपराध के आँकड़ों से अपने जघन्य अपराध को सही सिद्ध करने का प्रयास नहीं करेगा?

किसी अपराध को घृणा-अपराध करना, मामले का राजनीतीकरण करना है और इससे कानून व्यवस्था की ओर से इसपर उचित ध्यान नहीं दिया जाता। अब हम ऐसी संख्याओं का जोड़ कर रहे हैं कि किसा समुदाय के लोगों ने किस समुदाय के कितने लोगों को मारा और यह अपराध से निपटने में सहायक नहीं है। आँकड़ों को नॉर्मलाइज़ करके सही तस्वीर पेश करने की जगह, हम सीधी संख्या को जोड़कर उद्देश्यहीन डाटा बना रहे हैं।

किसान आत्महत्या का आँकड़ा जोड़कर हम कृषि असंतोष से लड़ने के सही उपायों को खोजने में असमर्थ रहे हैं और कर्ज़माफी, अधिक समर्थन मूल्य, आदि सब्सिडियों द्वारा अस्थायी सहायता कर रहे हैं। किसानों पर एक दीर्घावधि अध्ययन (1997-2012) बताता है कि भले ही सीधी संख्याएँ अधिक हैं लेकिन कृषि समुदाय से अनुपात के रूप में देखें तो आत्महत्या दर घटी है।

इसी प्रकार हम आत्मगत रूप से कुछ अपराधों को घृणा-अपराध कह रहे हैं और उन्हें सामान्य अपराधों से अलग रखकर यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि हम कश्मीर में आतंककवाद और गौरक्षा संबंधित अपराधों से निपटने के गलत उपायों के साथ उभरेंगे।

घृणा-अपराधों का लगातार गलत संकलन किया जा रहा है जैसा स्वराज्य  की रिपोर्टर स्वाति गोयल शर्मा  अपने लेखों में बताती रहती हैं (यहाँ, यहाँ और यहाँ पढ़ें) और इस प्रकार की प्रक्रिया से निकलकर आने वाले त्रुटिपूर्ण आँकड़े और कुछ नहीं मात्र कथित पीड़ितों में और अधिक घृणा का संचार कर रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय मीडिया द्वारा प्रोत्साहित यह डाटा घृणा की एक छोटी घटना से और घृणा (यहाँ देखें) को बढ़ावा देता है।

गौ संबंधी घृणा-अपराधों पर ध्यान देंगे तो पाएँगे कि यह डाटा अत्यधिक दिग्भ्रमित है।

पहला, इसके अनुसार अल्पसंख्यक समुदाय ऐसी घटनाओं में अधिक पीड़ित है जबकि इस बात को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है कि ऐसा इसलिए क्योंकि वे अधिक संख्या में इसमें लिप्त होते हैं।

दूसरा, इस प्रकार का न्याय ग्रामीण इलाकों में अधिक व्याप्त है क्योंकि वहाँ तक राज्यतंत्र की पहुँच कम होती है। तो यदि वह गाय है, बकरी हो, मुर्गी हो, या बच्च चुराना, जनता अपराधी समझकर उसके साथ न्याय करती है। इसका उपचार यही हो सकता है कि राज्य इन क्षेत्रों में न्याय की पहुँच बढ़ाए, न कि गौरक्षा संबंधी अपराधों को प्रचारित करे।

तीसरा, मीडिया ऐसी घटनाओं की कड़ियों को जोड़कर अपनी भूमिका निभाता है और इसे एक ट्रेंड की तरह स्थापित कर देता है- जैसा 2014-15 में “चर्च पर हमले” के आरोपों के साथ हुआ था। जब दिल्ली पुलिस ने जाँच की तो पाया कि इन छह कथित हमलों में से दो चोरी के मामले थे, दो इलेक्ट्रिक शॉर्ट सर्किट से संंबंझित थे और दो चर्च के निकट विवाद में पत्थरबाज़ी से संबंधित थे जिनका चर्च पर निशाना साधने से कोई मतलब नहीं था। इसी समय 300 मंदिरों और 42 मस्जिदों में भी इसी प्रकार की कुछ घटनाएँ हुई थीं लेकिन मीडिया ने इसे गलत तरीके से वर्गीकृत कर अल्पसंख्यकों में संदेह उत्पन्न किया। और यहाँ भी मामला यही है कि राज्य कानून व्यवस्था नहीं संभाल पाया।

चौथा, जिहादियों द्वारा 5 लाख कश्मीरि पंडितों का खदेड़ा जाना असल घृणा-अपराध है या फिर पाकिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर अत्याचार को घृणा-अपराध के रूप में गिना जाना चाहिए।

फिर घृणा-अपराध के आँकड़ों का क्या अर्थ हैं जब उनमें इतनी त्रुटियाँ हैं?

घृणा-अपराध का डाटा अधिकांश रूप से किसी छुपे हुए एजेंडा द्वारा प्रेरित और चलाया जाता है और वास्तविक घृणा-अपराध से निपटने में कोई सहायता प्रदान नहीं करता। ये आदिल अहमद दार जैसे जिहादी को मारने का नैतिक अधिकार देता है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।