विचार
सबरीमाला विवाद के प्रति एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण

प्रसंग
  • आस्था और तर्क एक दूसरे के विरोधी होते हैं। इसलिए आस्था के मामलों में तर्क देने से काम नहीं चलता। लैंगिक समानता के बारे में सबरीमाला मंदिर को मुद्दा बनाना ऐसी ही एक मूर्खता है।

द हिंदू  में टी.एम. कृष्णा का ‘सबरीमाला एंड द क्वेस्ट फॉर इक्वलिटी’ नामक लेख सबरीमाला विवाद के प्रति लेखक के सतही और भावनात्मक लेकिन अवैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्रकट करता है।

लेख पर चर्चा करने से पहले मैं अपने दर्शन के बारे में बताना चाहता हूँ। मैं एक अनीश्वरवादी व्यक्ति हूँ। मैं मानता हूँ कि सभी धर्म अन्धविश्वास हैं और सत्य विज्ञान में निहित है तथा विज्ञान धर्म के विपरीत कभी भी अंतिम होने का दावा नहीं करती है लेकिन यह लगातार विकास कर रही है।

लेकिन मैं यह भी कहना चाहूँगा कि भारत में अधिकांश लोग मेरे विपरीत हैं – वे अति धार्मिक हैं।

धर्म का आधार क्या है? यह प्राकृतिक और सामाजिक शक्तियों के सामने असहायता की अनुभूति है। सभी प्रारंभिक धर्म प्रकृति की पूजा थे, जैसे – वैदिक देवता इंद्र, अग्नि, सूर्य इत्यादि। ये शक्तियाँ इंसान को लाभ या क्षति पहुँचा सकती थीं, जैसे – वर्षा, अग्नि इत्यादि। चूँकि मनुष्यों को इन शक्तियों की वास्तविक प्रकृति का ज्ञान नहीं था इसलिए उन्होंने सोचा कि ये कुछ अलौकिक शक्तियाँ हैं जिनके प्रकोप से बचने या उनका साथ पाने के लिए उनको संतुष्ट करना चाहिए।

ज्यादातर लोग गरीब हैं और उनके जीवन में इतने दुःख होते हैं कि यदि उनके पास एक मनोवैज्ञानिक सहारे के रूप धर्म न हो तो वे पागल हो सकते हैं। लेकिन भारत में अधिकांश मध्यम वर्ग और समृद्ध लोग भी धार्मिक हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि अवसर का कारक हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण है। हम योजनाएँ कुछ और बनाते हैं, लेकिन होता कुछ और है। इस प्रकार, हम अपने जीवन को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, व्यवसाय में खराब प्रबंधन, प्रतिस्पर्धा, मंदी, या सरकारी नीति में बदलाव के कारण नुकसान हो सकते हैं। इसलिए भारत में अधिकांश व्यापारीजन बहुत धार्मिक हैं और नुकसानों से बचने के लिए देवी लक्ष्मी की उपासना करते हैं। लेकिन यह किसी अलौकिकता के कारण नहीं है बल्कि विज्ञान के निम्न स्तर के विकास के कारण है कि हम अपने जीवन को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं।

भारत में (और कई अन्य देशों में) आज भी अधिकांश लोगों के मन मस्तिष्क पर धर्म की एक शक्तिशाली पकड़ है और यह कई पीढ़ियों तक बनी रहेगी, शायद अगले 100 वर्षों तक, जब तक कि विज्ञान में इतनी उन्नति नहीं हो जाती कि हम अपने जीवन को नियंत्रित कर सकें।

यह समझना महत्वपूर्ण है कि धर्म का आधार श्रद्धा है, न कि तर्क। इसलिए तर्क के आधार पर धार्मिक मान्यताओं का परीक्षण करना एक गलती है।

मिसाल के तौर पर, श्रीनगर में हज़रतबल का पवित्र स्थान है, जहाँ ऐसा माना जाता है कि यहाँ पैगम्बर मुहम्मद के बाल रखे हुए हैं। यहाँ, कोई यह सवाल नहीं पूछ सकता कि इसका क्या सबूत है कि ये पैगम्बर के बाल हैं। एकमात्र प्रश्न जिसे तर्कसंगत तरीके से रखा जा सकता है, यह है कि – क्या इस पवित्र स्थान पर आने वाले मुसलमान यह मानते हैं कि ये पैगम्बर के बाल हैं? उत्तर है हाँ, और बात यहीं ख़त्म। कई साल पहले, बाल गायब हो गये थे और कश्मीर घाटी में तब तक खूब बवाल हुआ जब तक कि बाल मिल नहीं गए।

उत्तर प्रदेश के चित्रकूट में एक “सीता रसोई” है, जहाँ यह माना जाता है कि यहाँ सीता राम और लक्षमण के लिए खाना पकाया करती थीं।

फ्रांस के लॉर्ड्स में यह माना जाता है कि वर्जिन मैरी उन्नीसवीं शताब्दी में दिखाई दी थीं और यह भी माना जाता है कि यहाँ के चर्च में रोगमुक्त करने की शक्तियाँ हैं। हर साल लाखों लोग वहाँ जाते हैं। कुछ ऐसी ही मान्यता तमिलनाडु के वेलानकन्नी में भी है जिसे पूर्व के लॉर्ड्स के रूप में जाना जाता है। श्रीलंका के कैंडी में अनुमानतः एक मंदिर में बुद्ध का दांत मौजूद है।

अमेरिका के मॉर्मन धर्म के सदस्य मानते हैं कि एंजेल मोरोनी 1823 में मॉर्मन संप्रदाय के संस्थापक जोसेफ स्मिथ के सामने दिखाई दीं, और उन्हें स्वर्ण तख्तियाँ दीं जिन पर मॉर्मन धर्म का विश्वास लिखा गया।

ये सभी आस्था के मामले हैं और इनका तर्कसंगत रूप से परीक्षण नहीं किया जा सकता। कोई यह नहीं पूछ सकता कि कुंवारी रहते हुए मैरी जीसस को जन्म कैसे दे सकती हैं या पैगम्बर मुहम्मद पंखों वाले एक घोड़े बुर्राक पर बैठकर मक्का से येरुशलम और फिर स्वर्ग के लिए उड़ान कैसे भर सकते हैं?

अब आते हैं सबरीमाला पर। भक्त (जिन्हें अय्यपन कहा जाता है, जो ब्रह्मचारी बन जाते हैं, काले कपड़े पहनते हैं, आंशिक उपवास रखते हैं और अपनी तीर्थयात्रा शुरू करने से पहले 41 दिनों तक प्रार्थना करते हैं) मानते हैं कि भगवान अयप्पा एक नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं जो अपनी मौजूदगी में रजस्वला महिलाओं की उपस्थिति नहीं चाहते हैं। कोई भी व्यक्ति तर्क की कसौटी पर इस आस्था का इम्तेहान नहीं ले सकता है। यह एक दृढ़ विश्वास है और यहाँ तक कि कुछ लोग तो इसके लिए मरने के लिए भी तैयार रहते हैं। यदि रजस्वला महिलाओं को अनुमति मिलती है तो यह मंदिर की प्रथम प्रकृति को नष्ट कर देगी।

इसलिए, यह मानना गलत है कि ये राजनीतिक दल हैं जो सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में बाधा डाल रहे हैं (हालाँकि वे राजनीतिक लाभ को देखते हुए आंदोलन में शामिल हो सकते हैं)।

सबरीमाला न्यायपीठ पर अधिकांश न्यायाधीशों के सम्बन्ध में, सम्मान के साथ यह कहा जाना चाहिए कि उन्होंने समानता, महिलाओं की प्रतिष्ठा इत्यादि पर अमूर्त, सैद्धांतिक नज़रिया अपनाया और इस बात को अनदेखा किया कि भारत में धर्म अभी भी शक्तिशाली है और धार्मिक मान्यताओं पर प्रहार करने के प्रतिकूल परिणाम होते हैं जो लोगों को और भी कट्टर बनाते हैं। न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा का विचार सही था, जिन्होंने संतुलन और संयम दर्शाते हुए, जो कि महान न्यायाधीशों का परिचायक है, यह इंगित किया कि भारत जैसे विविधता वाले देश में न्यायाधीशों द्वारा धार्मिक मान्यताओं और प्रथाओं में हस्तक्षेप करना बेहद अविवेकी कदम है। उन्होंने यह पाया कि संविधान के अनुच्छेद 14 में समानता के अधिकार को अलग से नहीं पढ़ा जा सकता – इसे अनुच्छेद 25 के साथ पढ़ा जाना चाहिए, जो धार्मिक मान्यताएँ रखने और धार्मिक प्रथाओं का पालन करने के अधिकार की गारंटी देता है और इन दोनों अधिकारों को सुसंगत बनाना होगा।

यदि सबरीमाला के फैसले का पालन किया जाता है तो सैकड़ों धार्मिक स्थलों में हस्तक्षेप करना पड़ेगा। कई सारे मंदिर हैं जो महिलाओं को अनुमति नहीं देते, कई सारे मंदिर हैं जो पुरुषों को अनुमति नहीं देते। हाल ही में, यह ख़बर आई थी कि उत्तर प्रदेश के हमीरपुर के एक मंदिर में एक महिला विधायक ने प्रवेश किया था और फिर बखेड़ा खड़ा हुआ था क्योंकि वहाँ महिलाओं को जाने की अनुमति नहीं थी। बाद में मंदिर के पुजारी ने कहा कि वह वहाँ मौजूद नहीं थे, अन्यथा वह उस महिला को प्रवेश की अनुमति कभी नहीं देते। शुद्धिकरण के लिए मंदिर को गंगाजल से धोया गया और मूर्ति को पवित्र करने के लिए इलाहाबाद के संगम में ले जाया गया।

इसके अलावा व्यावहारिक रूप से बमुश्किल 1 से 2 प्रतिशत मस्जिदें ही महिलाओं, जिन्हें घर पर ही नमाज़ अता करनी पड़ती है, को प्रवेश की अनुमति देती हैं, हालाँकि धार्मिक सिद्धांत में ऐसी कोई रोक नहीं है। तो, क्या उच्चतम न्यायालय पक्षपातपूर्ण हो सकता है? क्या इसे यह निर्देश नहीं देना चाहिए कि मुस्लिम महिलाओं को मस्जिदों में प्रवेश की अनुमति दी जानी चाहिए।

कृष्णा ने अपने लेख में शशि थरूर और निरुपमा मेनन राव के मत के खिलाफ लिखा है, लेकिन इसमें जाना जरूरी नहीं है। हालाँकि, वह गलत हैं कि सबरीमाला में रजस्वला महिलाओं के प्रवेश पर रोक स्त्री जाति से द्वेष और जातिगत पूर्वाग्रह के कारण है। जाति का इससे क्या लेना-देना है? सभी रजस्वला महिलाओं का प्रवेश निषेध है, इससे फर्क नहीं पड़ता कि वे किस जाति से हैं। और यह प्रथा महिलाओं को कलंकित नहीं करती है बल्कि यह सिर्फ भगवान अयप्पा के कारण है जिन्हें ब्रह्मचारी माना जाता है। वास्तविकता यह है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ प्रदर्शनकारियों में बहुत सारी महिलाएँ भी शामिल थीं जो पुरानी परम्परा का समर्थन करती हैं।

मार्कण्डेय काटजू भारत के उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश और प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष हैं।