विचार
21वीं शताब्दी के दो दशकों में क्या हुआ, भारत के लोकमन और अंतर्विरोधों की टोह

21वीं शताब्दी के दो दशक समाप्त हो चुके हैं। आज का ‘इंडिया’ जो कि ‘हिंदुस्तान’ है, प्राचीन काल से ‘भारत’ है– इसे समझने की कड़ी में इस अवसर पर भारतीय लोकमन में गहरी पैठ बना चुके नानाविध अंतर्विरोधों का मुआयना करना समीचीन होगा। भारत को खंड-खंड एवं जर्जर बनाने में जितना योगदान आक्रांता और व्यापारी शासकों का रहा है, उतना ही (निर्विवाद रूप से) उनके भाव-प्रभाव में रचे-गढ़े ‘नैरेटिव’ का भी है।

मानो-न-मानो हमें इतिहास कम पढ़ाया गया परंतु ‘नैरेटिव’ प्रचुर मात्रा में रचे-गढ़े-पढ़ाए गए (जा रहे) हैं। ऐसे ‘नैरेटिव’ ने नानाविध अंतर्विरोध उत्पन्न कर रखे हैं। परिणामतः किसी भी वार्ता-संवाद का अंत बहस-मुबाहिसे से होता है। ‘भारत का रहने वाला हूँ। भारत की बात सुनाता हूँ।’ पर नाक-भौं सिकोड़ने वालों की ही नहीं अपितु भारत के ‘टुकड़े-टुकड़े’ करने के अरमान रखने वालों की एक ‘गैंग’ इस शताब्दी में एक ठोस रूप धारण कर चुकी है और खुलेआम मंचों से एवं प्रदर्शनों में इनके अरमान उछल-उछल कर जन-जन तक पहुँच चुके हैं।

इस शताब्दी के इन दो दशकों में भारत ने देखा कि ‘तारीख पे तारीख’ देने वाले न्यायालय आधी रात में आतंकवादियों के लिए खुलते हैं। ऐसी घटना और भारत को ध्वस्त करने के नैरेटिव से नानाविध ‘आर्ग्यूमेन्ट’ और कई ग्रंथियाँ उत्पन्न हुईं/होती हैं। इधर कुछेक पुरजोश ‘आर्ग्यूमेन्ट’ बहुत चर्चा में रहे अतः उद्धृत करने योग्य हैं। आश्‍वस्त हूँ कि आने वाला समय ऐसे ‘आर्ग्यूमेंट’ का यथोचित विश्‍लेषण करेगा। मुलाहिज़ा है– ‘किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है?’ और हाल ही में बिहार की नई विधानसभा से उठी ‘हिंदुस्तान’ जैसी प्रचलित संज्ञा की अस्वीकृति की आवाज़!

‘बाप का हिंदुस्तान’ और ‘हिंदुस्तान’ की अस्वीकृति ने अनायास ही भारतीय लोकमन के अंतस में कुछ हद तक हलचल पैदा कर दी है। कुछ ‘सेलिब्रिटी’ मीडियाकर्मियों ने ‘हिंदुस्तान’ की अस्वीकृति को हिंदू हितैषी नेताओं (भाजपा) के लिए एक मुद्दे के रूप में परोसा तो कई छद्म हिंदू हितरक्षक नेताओं ने कुछ मीडिया चैनलों पर जम कर काँव-काँव की।

कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्‍वविद्यालय और सर सैयद अहमद खां की भूरी-भूरी प्रशंसा कर मुस्लिम समुदाय को तुष्ट करने का अद्‍भूत प्रयास किया तो एक ‘आर्ग्यूमेन्ट’ यह भी उभरा कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्‍वविद्यालय में हिंदू विद्यार्थी तथा कर्मचारियों का वास्तव और प्रतिशत क्या है?

इस संबंध में मेरे कुछ भी लिखने से बेहतर है 14 अगस्त 2015 को scroll.in में प्रकाशित इरफान हबीब के साक्षात्कार के उस अंश को पढ़ लें, जिसमें उन्होंने स्पष्ट बताया है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्‍वविद्यालय में 90 प्रतिशत मुस्लिम विद्यार्थी हैं और इस संख्यात्मक बहुलता ने वहाँ की आबोहवा बदलकर रख दी है।

पहले वहाँ गुरु नानक जयंती और दीपावली मनाई जाती थी और शहर के गुरुद्वारा से ट्रक भरकर लड्डू आते थे परंतु अब मंज़र कुछ और है। वे बताते हैं कि भर्ती प्रक्रिया में हिंदुओं को रोक दिया जाता है। संभवतः राजनीतिक समीकरणों को दृष्टिगत रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस वास्तविकता को नज़रंदाज़ कर दिया। परंतु इरफान सहज ही बता गए कि जिन्हें हम ‘अल्पसंख्यक’ कह रहे हैं, वे ‘बहुसंख्यक’ की स्थिति में आ जाते हैं तो कैसी स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं!

बहरहाल, हम जानते हैं कि ‘हिंदू-मुस्लिम एकता’ की तमाम बातें जब-तब रद्दी साबित होती रही हैं। यह एकता तब तक बनी रहती है, जब तक इस्लाम के विरोध में कोई बात नहीं होती। जैसे ही कोई घटना घटित होती है ‘एकता’ का नारा नक्कारखाने में तूती की आवाज़ की भाँति दबकर रह जाता है।

एक माह पूर्व हैदराबाद में ‘मुस्लिम राष्ट्रीय मंच’ के कार्यकर्ताओं ने फ्रांस के विरोध में प्रदर्शन (?) कर अपने विचारों के रहस्यमयी पाट खोल दिये। बेंगलुरु (कर्नाटक) में पैगंबर मोहम्मद के नाम पर हुआ दंगा भी विगत कुछ दिनों की अविस्मरणीय घटना है। ऐसी घटनाएँ हम जैसे जन्मजात ‘सर्वधर्म समभाव’ का पालन करने वालों को अनायास ही झकझोर जाती हैं।

ऐसे नानाविध संदर्भ-प्रसंग हैं, जिनको 21वीं शताब्दी के दो दशकों में यदा-कदा नहीं, लगभग सदा-सर्वदा देखा-सुना गया है। अब ‘हिंदुस्तान’ को लगने लगा है कि वास्तव में हम मुग़ालते में जी रहे हैं और स्थिति अत्यंत विकट ही नहीं अपितु भयावह है। इस देश में त्रासदियों का लंबा इतिहास है। यहाँ विभाजन-दर-विभाजन होते चले गए और हमारी सीमाएँ निरंतर सिकुड़ती चली गईं।

हमें अपने उच्चादर्शों को घुट्टी में पिलाकर ‘आव भगत’ (अतिथि देवो भव) का पाठ पढ़ाया जाता रहा और हमारे मुँह में राम नाम (समन्वयवाद) रहा परंतु खंजर कभी सीने में तो कभी पीठ में भोंके जाते रहे। मानो-न-मानो इस अनेकतावादी अथवा बहुलतावादी राष्ट्र को मज़हब के नाम पर घुन की तरह खाया और खोखला कर दिया गया है।

अब तो ‘हिंदुस्तान’ संज्ञा भी गले की फाँस बनने लगी है। ‘बाप का हिंदुस्तान’ और ‘हिंदुस्तान की अस्वीकृति’ के रूप में नए नैरेटिव रच दिए गए हैं। ऐसे नैरेटिव से फ़िज़ा और फ़ितरत का अता-पता चलता है और देश-दुनिया का तानाबाना बनता-बिगड़ता है। दुःखद है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्षों के पश्‍चात् भी इस देश का कोई एक नाम निर्धारित नहीं हो सका है। “India, that is Bharat” जस-का-तस बना ही हुआ है। कहना न होगा कि राष्ट्रहित की बात करने वाली सरकार का अब तक इस दिशा में रुख़ साफ़ नहीं है।

बहरहाल, बात अंतर्विरोधों से आरंभ की है तो अंतर्विरोधों पर लौटते हैं–

हम भारतीयों के संबंध में प्रचलित एवं प्रचारित अनेकानेक अंतर्विरोधात्मक बातें सुनते-सुनते बचपन बीता और जवानी भी बीती जा रही है। तेलंगाना-मराठवाड़ा प्रांत में एक लोकोक्ति प्रचलित है– ‘घर में नहीं जवारी अम्मा पुरियाँ पकारी।’ किसी चर्चा-परिचर्चा, मित्रतापूर्ण संवाद, ठठा-मसखरी अथवा वाद-विवाद, झगड़े-टंटे में किसी-न-किसी प्रसंगवश यह उक्ति सुनाई दे जाती है। बातों ही बातों में यह उक्ति अपने देश की हालत-हालात बताने में भी इस्तेमाल होती है और लोग कहते हैं– ‘अपने मुल्क का भी यइच हाल है मियाँ!’

हम भारतीयों के संबंध में प्रचलित अंतर्विरोधात्मक बातों की कमी नहीं है। आप जानेंगे कि किसी कथन पर मुकम्मल तरह से सहमत होना सहज संभव नहीं है। इतने ‘नैरेटिव’ रचे-गढ़े गए हैं कि वास्तविकता तक पहुँचना लगभग नामुमकीन जान पड़ता है। भारत के संबंध में देश-दुनिया में प्रचलित कुछ कथनों का आकलन करने से अंतर्विरोधों का पता चलता है–

  • भारत बहुत ग़रीब देश है। भारत सोने की चिड़िया है।
  • भारत साँप–सपेरों का देश है। भारत के ज्ञान–विज्ञान से संसार चल रहा है।
  • भारतीय ज्ञान चुराकर विदेशी महान् हो गए हैं। भारतीय ज्ञान का आधार पश्‍चिमी ज्ञान है।
  • मुसलमान आक्रांताओं ने भारतीय स्मारक, पूजा स्थलों के साथ-साथ विद्या-मंदिर (विश्‍वविद्यालय) तोड़े और ग्रंथालय जला दिए। मुसलमान आक्रांता वास्तव में कला एवं साहित्य प्रेमी थे और स्थापत्य कला में वे विशेष रूप से सिद्धहस्त थे। आज भारत में मौजूद लगभग सभी स्मारक (स्थापत्य) उन्हीं के द्वारा बनाए हुए हैं।
  • भारत आयात (परजीवी) पर जीता है। भारत में कच्चा माल का बेशुमार ख़ज़ाना था (है)। भारत कृषि–प्रधान देश है।
  • भारत स्वावलंबी (आत्मनिर्भर) है। भारत को अमरीका और रूस चलाते हैं।
  • भारत उपभोग-आधारित अर्थव्यवस्था है। भारत विश्‍व का सबसे बड़ा बाज़ार है।
  • भारत स्वदेशी (मेक इन इंडिया) का उपासक है। भारत आयात की दृष्टि से चीन पर निर्भर है।
  • भारत वीरभोग्या वसुंधरा है। भारत भूमि को लगभग 1,500 वर्षों से विदेशी आक्रांताओं ने कुचला और बेहिसाब उपभोग किया है।
  • भारतीयों का उद्धार मुसलमान शासकों ने किया है। भारत का स्वर्ण युग ‘मुगल काल’ है। मुसलमान शासक भारतीयों (सनातनी/हिंदू) के प्रति अत्यंत उदार थे। उन्होंने हिंदुओं के साथ रोटी-बेटी का व्यवहार स्थापित कर समन्वय स्थापित किया। भारतीयों पर ज़कात-जज़िया लगता था। भारतीय महिलाओं को जौहर जीवन जीने से ज़्यादा आसान लगता था।
  • अंग्रेज़ों से पहले ‘भारत’ नाम का कोई राष्ट्र अस्तित्व में नहीं था। ‘महाभारत’ में ‘भारत’ का होना केवल संयोग है। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी में ‘इंडिया’ भारत का पर्याय नहीं है।
  • ऋषि-परंपरा में दलित-वंचित ऋषि हुए हैं। ऋषि-मुनि और ब्राह्मण एक-दूसरे के पूरक हैं। ब्राह्मणों ने दलित-वंचितों का शोषण-उत्पीड़न किया है।
  • भारतीय ग़ुलामी मानसिकता वाले लोग हैं। भारतीय स्वतंत्रता-प्रेमी हैं।
  • भारतीय नौकरी-पसंद लोग हैं। भारतीय शूर-वीर योद्धा, रणबांकुरे हैं।
  • अकेले महमूद गज़नी ने 17 बार भारत पर आक्रमण किया और भारतीयों को गाजर-मूली की तरह काट दिया। भारतीय शांति-प्रिय लोग हैं।
  • भारतीय ‘भोग’ को नहीं ‘योग’ को प्राथमिकता देते हैं। जनसंख्या की दृष्टि से भारत विश्‍व का दूसरा सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश है।
  • भारत में नारी का शोषण होता है। भारत में कन्या भ्रूण हत्या परवान पर है। भारत में दहेज प्रथा है। दहेज के कारण कई लड़कियाँ अविवाहित रह जाती हैं। कई को छला और जलाया जाता है। भारत में पितृसत्ता है। भारत में नारी शक्ति है। भारत में नारी पूजनीय है। भारत प्रगतिशील एवं आधुनिक देश है। भारत क्रांति-भूमि है। भारत सामाजिक सुधारों की भूमि है।
  • भारत विकासशील देश है। भारत पिछड़ा देश है।
  • भारत का कोई इतिहास नहीं है। भारत का अतीत अत्यंत गौरवशाली है।
  • भारत एक राष्ट्र है। भारत एक राष्ट्र नहीं है। भारत में अनेकानेक राष्ट्र बसते हैं। ‘भारत’ अनेकानेक टुकड़ों का नाम है। राज्यों में विभाजित भारत वास्तव में असंगत है। अभारतीय दृष्टि से भारत का विभाजन इस प्रकार होना चाहिए– दलितों का भारत, आदिवासियों का भारत, आधी आबादी का भारत, तृतीय लिंगियों का भारत, वंचितों का भारत, शोषितों का भारत, शरणार्थियों का भारत, बेरोज़गारों का भारत, मुसलमानों का भारत इत्यादि।

इन दूरबीनों से देखेंगे आप तो जानेंगे कि भारत एक कहाँ है? वैसे देखा-सोचा जाए तो ‘भारत’ वास्तव में ‘भारत’ भी कहाँ है? वास्तव में वह ‘भारत’ होने के अतिरिक्त सबकुछ है। यह ‘इंडिया’ है! हाँ, कुछ संत एवं कवियों (शायर) ने अलग-अलग संदर्भों में इसे ‘हिंदुस्तान’ (हिंदोस्ताँ) कह दिया था– “खुरासान खसमाना कीआ हिंदुसतानु डराइआ॥” (गुरु नानकदेव), “सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा।” (मुहम्मद इक़बाल) जो इधर कुछेक लोगों को चुभने लगा है।

बहरहाल, हमारे बच्चे प्रतिदिन उपरोक्त तथा ऐसे नानाविध अंतर्विरोधात्मक बातों से जूझते हैं। भारत को देखने-समझने में उनकी दृष्टि ऐसी नानाविध बातों से बाधित होती है।

‘हिंदुस्तान’ की अस्वीकृति

जब मुद्दा ‘हिंदुस्तान’ की अस्वीकृति का उभरा तो एक ‘आर्ग्यूमेंट’ यह भी उभर कर आया कि इसे ‘हिंदुस्तान’ कहना ‘सेक्यूलरिज़्म’ के ख़िलाफ़ है। तर्क यह कि ‘हिंदुस्तान’ में चूँकि ‘हिंदू’ शब्द है, अतः वह ‘सेक्यूलर’ नहीं हो सकता। कुछ बुद्धि-विलासी मित्रों ने इस विरोध को संघ (आरएसएस) की प्रार्थना से जोड़ते हुए कहा कि “नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे, त्वया हिंदुभूमे सुखं वर्धितोहम्।” में ‘हिंदुभूमे’ का प्रयोग हुआ है और संघ मुस्लिम विरोधी है। अतः संज्ञा रूप में हिंदुस्तान का विरोध वाजिब है।

‘भारत’ संज्ञा से सेक्यूलरिज़्म आहत नहीं होता। अतः संवैधानिक दृष्टि से ‘भारत’ उचित संज्ञा है। ग़ौरतलब है कि कुछ दिनों पूर्व बिहार की नई विधानसभा में शपथ सत्र के दौरान सीमांचल के अमौर से ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के नवनिर्वाचित विधायक अख्तरुल इमान ने ‘हिंदुस्तान’ संज्ञा पर आपत्ति जताते हुए उसके इस्तेमाल को असंवैधानिक करार दिया था और ‘हिंदुस्तान’ की जगह ‘भारत’ का इस्तेमाल किया था।

भारत (जो कि हिंदुस्तान है) ने देखा कि प्रोटेम स्पीकर जीतन राम मांझी की बात पूरी होने से पूर्व ही नवनिर्वाचित विधायक ने अपनी शपथ पूरी कर दी थी। ‘हिंदुस्तान’ के निषेध के साथ ही मानस में अनेकानेक घटनाएँ सहज ही स्मरण हो आईं। देश विभाजन की मानसिकता का एक नया तेवर इस विरोध में सहज ही देखा जा सकता है।

बहरहाल, अंतर्विरोधों की दृष्टि से कुछ और बातें उल्लेखनीय हैं– भारतीय सर्वधर्म समभाव का निर्वहन करने वाले लोग हैं अर्थात् जन्मतः ‘सेक्यूलर’ हैं। विधर्मी आक्रांता और व्यापारियों के रूप में भारत आते रहे हैं तथा उनका स्वागत भी होता रहा है। यद्यपि भारत सर्वधर्मसमभाव का निर्वहन करने वाला रहा है, आपातकाल के दौरान संविधान की प्रस्तावना में ‘सेक्यूलर’ शब्द विशेष रूप से जोड़ दिया गया। हम सभी जानते हैं कि ‘सेक्यूलर’ भारत में धर्म-परिवर्तन परवान पर है।

‘जिहाद’ के नानाविध रूप भारत में फल-फूल रहे हैं। शांतिप्रिय अल्पसंख्यक समुदाय (?) की मंशा पर कथा-सम्राट प्रेमचंद की कहानी ‘जिहाद’ पढ़ने योग्य है। सब जानते हैं कि आचार्य चाणक्य द्वारा प्रदत्त साम-दाम-दंड-भेद नीति विधर्मी आक्रमणों के समय से लेकर आज तक हिंदू समाज पर पूरी शिद्दत से लागू की जा रही है। धर्म-परिवर्तन में इस नीति का सलीके से सदुपयोग किया जा रहा है।

सेक्यूलर कहते हैं, दिक्कत क्या है? भारत में ‘राष्ट्रवाद’ इसलिए बेमानी है क्योंकि भारतीय दृष्टि से संपूर्ण वसुधा एक कुटुंब है– ‘वसुधैव कुटुम्बकम्, परोपकाराय सतां विभूतयः’, ‘अतिथिदेवो भव’ इत्यादि। ‘राष्ट्रवाद’ आधुनिक अवधारणा है। यदि भारत राष्ट्रवाद को मानता है तो यह मानना अनुचित नहीं कि भारत का अतीत में कोई अस्तित्व नहीं था। यह आधुनिक समय में ही अस्तित्व में आया है।

भारतीय विश्‍व-बंधुत्व के समर्थन-प्रस्तावक-प्रचारक हैं। इसलिए विश्‍व-बंधुत्व का भाव हममें कूट-कूट कर भरा हुआ है। कैसे नहीं होगा? हम भूल जाते हैं कि हमें सदियों से सलीके से ‘कूटा’ ही तो जा रहा है। कभी विद्यालयों की पाठ्य-पुस्तकों पर एक नज़र दौड़ाइए तो पता चलेगा कि मुसलमान शासकों की लंबी फेहरिस्त है और इतिहासकारों ने आक्रांता शासकों के कसीदे पढ़े हैं।

हममें यह भाव अनायास जाग्रत होता है कि हमें सदियों से सलीके से ‘कूटा’ गया है। हमारे मानस को ‘सेक्यूलर’, ‘विश्‍व बंधुत्व’ इत्यादि छलावों में ‘नपुंसक’ बनाया गया है। देश के टुकड़े-टुकड़े कर देने के बावजूद ‘पिपासा’ अभी समाप्त नहीं हुई है। रह-रह कर आवाज़ें उठती हैं– ‘किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है?’, ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे! इंशाअल्लाह! इंशाअल्लाह!’ 

भारत तेरे टुकड़े होंगे! इंशाअल्लाह! इंशाअल्लाह! 

विश्‍वविद्यालय अर्थात् उच्चतर शिक्षा के विशाल प्रांगण! ये ऐसी जगहें हैं, जहाँ विद्यार्थियों को अपनी समझ अधिकाधिक विकसित एवं समाजोपयोगी, राष्ट्रोपयोगी बनाने के अवसर मिलने चाहिए। इन दशकों ने इस बात को भी बड़ी संजीदगी से रेखांकित किया कि हमारे अनेकानेक विश्‍वविद्यालय परिसरों से अपने ही राष्ट्र में अनास्था का स्वर प्रस्फुटित हो रहा है।

इन दो दशकों ने कथित रूप से ‘नंबर 1 विश्‍वविद्यालयों’ की पोल खोलकर रख दी है। इस शताब्दी ने उच्च शिक्षा और विश्‍वविद्यालयों के संबंध में छाई रस्मी भ्रांतियों को बड़े पैमाने में तोड़ा है। इन टूटी हुई भ्रांतियों के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में अलीगढ़ मुस्लिम विश्‍वविद्यालय के शताब्दी समारोह के अवसर पर विश्‍वविद्यालय को ‘मिनी इंडिया’ कह दिया।

हम सभी जानते हैं, प्रधानमंत्री जिसे ‘मिनी इंडिया’ कह गए, उस ‘इंडिया’ ने भारत की वर्तमान स्थिति बनाने में कितना और कैसा योगदान किया है! यद्यपि उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्‍वविद्यालय के संबंध में ऐसा कहा है तथापि कमोबेश रूप में वर्तमान में सभी विश्‍वविद्यालयों की स्थिति वैसी ही है। सुर्खियाँ बटोरने और राजनीतिक ध्यानाकर्षण के साथ-साथ राजनीति के गलियारों का सुख भोगने की मंशा से चंद बिगडैल विद्यार्थी विश्‍वविद्यालयीन परिसर को ‘हाइजैक’ कर लेते हैं।

ध्यान रहे कि इस शताब्दी ने विश्‍वविद्यालयीन प्रांगणों की रेलपेल और रचे-गढ़े गए नैरेटिव को समझने की कुवत पैदा कर दी है। ‘बाप का हिंदुस्तान’ और ‘हिंदुस्तान’ की अस्वीकृति के साथ-साथ ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे! इंशाअल्लाह! इंशाअल्लाह!’, चिकन नेक को तोड़ने वाली बात और मुसलमानों के हितचिंतक असदुद्दीन ओवैसी के मंच से लगे ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारों को एक क्रम में समझने की आवश्यकता है।

एक जायज़ आर्ग्यूमेन्ट यह उभर कर आता है कि हिंदुस्तान के विरोध में भारत को तोड़ने की साज़िशों का सिलसिला निरंतर जारी है। भारत में राजनीतिक इस्लाम से उपजी एकता ने कट्टरता के नए आयाम जोड़ दिए हैं। बिहार के चुनावों में इस इस्लामिक एकता का एक रूप देखने को मिला है। आने वाले दिनों में वह प्रयोग पश्‍चिम बंगाल में देखने को मिलेगा। और इसका लगभग ऐलान हो चुका है।

‘अस्मिता की राजनीति’ के आधार पर निरंतर मुस्लिम समुदाय एकजुट होने जुटा हुआ है। हिंदुओं को कट्टर साबित करने में ‘सेक्यूलर टोली’ जुटी हुई है परंतु कोई इस्लामिक कट्टरता पर बात करना मुनासिब नहीं समझता। सब जानते हैं कि इस्लाम की कट्टरता पर बोलकर ‘सेक्यूलर’ नहीं हुआ जा सकता।

सेक्यूलर होने की पहली शर्त है, सनातन (हिंदू) में बुराइयों की सर्जना करना। इसीलिए कभी-कभार लगता है कि हम भारतीयों की स्मरणशक्ति और चेतना अत्यंत क्षीण है। हम अपने शास्त्रों से उपार्जित ज्ञान और उच्चादर्श के आधार पर भारत (राष्ट्र) का अहित कर रहे हैं। 21वीं शताब्दी के दूसरे दशक ने इस ओर भी ध्यानाकर्षित किया है कि ‘अल्पसंख्यक’ मुसलमानों की बदलती जनसांख्यिकी जब चाहे ‘चक्का जाम’ करने की योजनाओं को अंजाम देने का इरादा और कुवत रखती है।

हिंदुस्तान से हिंदुस्तानी तक

स्वतंत्रता के पूर्व ही नहीं अपितु उसके पश्‍चात् भी ‘हिंदुस्तान’ संज्ञा के आधार पर तत्कालीन समय में प्रयुक्त-प्रचलित एक भाषा– ‘हिंदुस्तानी’ चर्चा का विषय बनी रही। मानो-न-मानो ‘हिंदू’ शब्द बहुतों के लिए खाज की बीमारी का काम कर जाता है। कोई सिर खुजलाता है तो कोई अपनी बगलें खुजलाने लगता है। ‘हिंदुस्तानी’ के संबंध में दंगल झाल्टे ने लिखा है–

“‘हिंदुस्तानी’ शब्द का प्रयोग सबसे पहले बाबर के समय में उसी भाषा के लिए उसी (सामान्य और क्लिष्ट) अर्थ में हुआ, जिस अर्थ में हिदी या हिंदवी शब्द का हुआ था। कुछ भाषाविदों के मतानुसार ‘हिंदुस्तानी’ शब्द यूरोपीय लोगों का दिया हुआ है। किंतु यूरोपीयन पादरियों ने इस शब्द का प्रयोग अत्यधिक रूप से मुसलमानों की भाषा के लिए ही किया है।

फोर्ट विलियम कॉलेज (1800 ई.) से पहले हिंदुस्तानी, हिंदी तथा हिंदवी शब्द समानार्थी थे तथा एक ही अर्थ में प्रयुक्त भी होते थे किंतु फोर्ट विलियम कॉलेज के गिलक्राइस्ट ने खड़ी बोली हिंदी के नाम पर उर्दू को ही हिंदुस्तानी माना और हिंदुस्तानी विभाग में उर्दू को पढ़ाया। उन्होंने हिंदुस्तानी की तीन शैलियाँ मानी– दरबारी शैली (उर्दू), मध्यम शैली (हिंदुस्तानी) तथा ग्रामीण शैली (हिन्दवी)। किंतु अर्थ की दृष्टि से हिंदुस्तानी से उनका तात्पर्य उर्दू से ही था।” (प्रयोजनमूलक हिंदी : सिद्धांत और प्रयोग, पृ. 49, वाणी प्रकाशन, 2015)

इसी पुस्तक में वे आगे लिखते हैं– “स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने राष्ट्रभाषा के लिए पहले हिंदुस्तानी नाम को ही चुना क्योंकि तब तक ‘हिंदुस्तानी’ शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में होने लगा था।… सांप्रदायिक तालमेल तथा राष्ट्रीय एकता के लिए महात्मा गांधी, मौलाना आजाद तथा जवाहरलाल नेहरू ने भी भारत की राष्ट्रभाषा/राजभाषा के रूप में ‘हिंदुस्तानी’ के प्रयोग पर अधिक जोर दिया था।” (वही, पृ. 49)

पहले उद्धरण में गिलक्राइस्ट के हवाले से ‘हिंदुस्तानी’ को उर्दू बताया गया है, जो कि ‘मुसलमानों की भाषा’ के रूप में स्वीकृत हो चुकी थी। वहीं दूसरे उद्धरण में राजनीतिक दृष्टि से कांग्रेस का उस भाषा को समर्थन मिलना भी स्पष्ट हो जाता है। मज़ेदार बात यह है कि प्रायः गांधी को लेकर हम भारतीय बड़े रक्षात्मक हो जाते हैं। उनके प्रत्येक विचार को येनकेनप्रकारेण योग्य ठहराने की हड़बड़ी में अनेकानेक तर्क बिसरा देते हैं।

उपरोक्त दूसरे उद्धरण में ‘सांप्रदायिक तालमेल तथा राष्ट्रीय एकता’ पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है, जिससे गांधी की भाषा नीति से राजनीतिक दृष्टि का परिचय मिलता है। बदलते समय के साथ-साथ वही ‘हिंदुस्तान’ मुसलमानों के प्रतिनिधियों के लिए खाज का विषय बन गया है।

बहरहाल, आप जानेंगे कि भारत के संबंध में एक पंक्ति में कोई एक सर्वानुकूल बात करना लगभग असंभव है। ऐसी नानाविध अंतर्विरोधी बातों के बावजूद हम अपने इस देश पर गर्व करते रहे हैं। हमारे कवि, लेखक ‘एकता’ का पाठ पढ़ाते रहे हैं– “है प्रीत जहाँ की रीत सदा। मैं गीत वहाँ के गाता हूँ। भारत का रहने वाला हूँ। भारत की बात सुनाता हूँ।” (‘पूरब और पश्‍चिम’) इत्यादि गीतों से भारत की गरिमामयी संस्कृति और परंपरा को रेखांकित किया जाता रहा है।

अनेकानेक फ़िल्में, गीत और घटनाओं ने देश के प्रति प्रेम का भाव जाग्रत ही नहीं किया, अपितु उसे अत्यधिक उत्तरोत्तर बढ़ाया है। स्कूल के दिनों में देशप्रेम के गीत बड़े उत्साह से गाए जाते थे। स्वतंत्रता दिनोत्सव की प्रतीक्षा होती थी और दो-एक माह पहले से तैयारियाँ भी आरंभ हो जाती थीं। अच्छा भी लगता था। आनंदोल्लास में कुछ गीत यों ही जुबाँ पर चले आते थे– “ये देश है वीर जवानों का अलबेलों का मस्तानों का।… इस देश का यारों क्या कहना। ये देश है दुनिया का गहना।” (‘नया ज़माना’)

देशप्रेम की धार में 21वीं शताब्दी के इन दो दशकों को स्मरण रखना अत्यंत आवश्यक है। इन दो दशकों ने हमारी चेतना को नए सिरे से जाग्रत किया है। नए ज़माने में हम ‘सर्वधर्म समभाव’ का पालन अवश्य करते रहेंगे परंतु ‘भारत तेरे टुकड़ें होंगे’ को फलीभूत भी होने नहीं देंगे। इस अवसर पर भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को स्मरण करना समीचीन होगा– “सरकारें आएँगी–जाएँगी, पार्टियाँ बनेंगी–बिगड़ेंगी। मगर ये देश रहना चाहिए।” और हमें गर्व से स्मरण करना होगा – “ॐ नमो हिन्दु देशाय, नमो भारत संस्कृते। नमो धर्माय देवाय, मानवीय हितकारिणे!”

जब बात अस्मिता की ही उठ रही है तो हमें अपने उच्चादर्शों (मानवीय हितकारिणे) के साथ-साथ अस्तित्व-रक्षा के लिए तत्पर रहना होगा। सनातन का नामोनिशान मिटाने की हर कोशिश और कवायद को इन दो दशकों ने सरेआम देखा है। हमें तमाम अंतर्विरोधों से उबरना होगा। अपने गौरवशाली अतीत का ध्यान करना होगा। बने–बनाये नैरेटिव तोड़ना होगा। गलत को गलत कहना होगा।

सेक्यूलरिज़्म के छद्म–आवरण को तोड़ना होगा। वरना ध्यान रहे “अब यह बात सरेआम है। गली–गली में चक्का जाम है।” यही तो भारत-विरोधी करना चाहते हैं/ किया है। नवीन वर्ष और नये दशक का स्वागत करते हुए हमें अपने देश और धर्म के अस्तित्व की रक्षा करने के लिए कटिबद्ध हो जाना चाहिए।

“देश से है प्यार तो हर पल यह कहना चाहिए।
मैं रहूँ या ना रहूँ भारत यह रहना चाहिए।” (‘मणिकर्णिका’)