भारती / विचार
कृषि कानूनों को असंवैधानिक बताने का आधार 1954 का संशोधन क्यों नहीं हो सकता है

नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानूनों के विरुद्ध पंजाब एवं हरियाणा व उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कुछ क्षेत्रों के किसानों द्वारा जारी प्रदर्शन के बीच सर्वोच्च न्यायालय में इन कानूनों के समर्थन व विरोध में याचिकाओं की झड़ी लग गई है।

इन कृषि कानूनों का विरोध करने वाले अधिवक्ता एमएल शर्मा ने 5 जनवरी को संवैधानिक (तीसरा संशोधन) अधिनियम 1954 को चुनौती देकर सर्वोच्च न्यायालय को चौंका दिया। उन्होंने दावा किया कि इस अधिनियम ने कृषि को समवर्ती सूची में डाला था लेकिन यह वैधानिक तरीके से पारित नहीं हुआ था और इसलिए इस सूची में कृषि का होना असंवैधानिक तथा गलत है।

याचिका में शर्मा ने कहा कि संसद द्वारा पारित तीन कृषि कानून संविधान के अनुच्छेद 246 का उल्लंघन करते हैं जो कहता है कि कृषि राज्य सूची के अंतर्गत है। ऐसे में इन तीन कानूनों का पारित होना नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन है, शर्मा ने दावा किया।

‘एमएल शर्मा हमेशा चौंकाने वाली याचिकाएँ दायर करते हैं’

सर्वोच्च न्ययालय की पीठ, जिसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे कर रहे हैं और न्यायाधीश एएस बोपन्ना तथा वी रामसुब्बमण्यम सदस्य हैं, ने माना कि ‘एमएल शर्मा हमेशा चौंकाने वाली याचिकाएँ दायर करते हैं’।

अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने उस याचिका पर आश्चर्य व्यक्त किया दो 65 वर्ष पुराने संशोधन को चुनौती देती है जबकि इतने वर्षों में राज्य सरकारों ने इसपर किसी प्रकार की असहमति व्यक्त नहीं की। इस याचिका पर सुनवाई कृषि कानूनों और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की सीमाओं पर किसानों के प्रदर्शन का विरोध करने वाली याचिकाओं के साथ 11 जनवरी को होगी।

क्या हैं तीन कृषि कानून

सितंबर में संसद में तीन कानून पारित किए गए थे- कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम 2020, मूल्‍य आश्‍वासन पर किसान समझौता और कृषि सेवा अधिनियम 2020 तथा आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम 2020।

व्यापार और वाणिज्य अधिनियम किसानों को अनुमति देता है कि वे अपना उत्पाद देश में कहीं भी, किसी को भी बेच सकें। मूल्य आश्वासन अधिनियम किसानों को अपनी सहूलियत के अनुसार उसी की भाषा में किए गए अनुबंध पर आधारित खेती करने देता है और आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम उन्हें भंडारण सीमाओं की चिंता किए बिना अपने उत्पाद बेचने की अनुमति देता है।

कोरोनावायरस महामारी के दौरान आर्थिक चुनौतियों से निपटने के लिए मोदी सरकार आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत इन कृषि सुधारों को भी लेकर आई थी। कहा जा रहा है कि ये ‘एक देश, एक बाज़ार’ की अवधारणा को प्रोत्साहित करते हैं।

हालाँकि, पंजाब, हरियाण व उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों के किसान इन कानूनों का विरोधकर रहे हैं क्योंकि कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और वामपंथ जैसे विपक्षी दल उन्हें दिग्भ्रमित कर रहे हैं कि इन कानूनों से एमएसपी प्रणाली समाप्त हो जाएगी और लाभ कुछ कॉरपोरेट घरानों को मिलेगा।

केंद्र किसानों की इन चिंताओंका समाधान करने के लिए लगातार प्रयासरत है लेकिन आठ दौर की वार्ता से भी इस झुठे प्रचार के विरुद्ध किसानों को आश्वासन दे पाने में असफल रही है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच सर्वोच्च न्यायालय में जैसे याचिकाओं की बाढ़-सी आ गई है।

क्या है संवैधानिक (तीसरा संशोधन) अधिनियम 1954

22 फरवरी 1955 को लागू होने वाले संवैधानिक (तीसरा संशोधन) अधिनियम 1954 ने संविधान की सातवीं अनुसूची में संशोधन करके तीसरी सूची में 33 विषयों का प्रवेश करवाया था। तीसरी सूची अर्थात् समवर्ती सूची जिसमें कुल 52 विषय हैं व इनपर केंद्र और राज्य दोनों का अधिकार होता है।

इस संशोधन के अनुसार खाद्य सामग्री, चारा, कपास या पटसन जैसे किसी भी उत्पाद के व्यापार और वाणिज्य, उत्पादन, आपूर्ति और वितरण जैसे विषय समवर्ती सूची में होंगे। इसके अंतर्गत तेलबीज, तेल, तेल निकलने के बाद बची खली, पशु चारे के तत्व, ओटी हुई या बिना ओटी हुई कपास, ये सब भी आएँगे।

इस संशोधन में एक बात स्पष्ट कर दी गई थी कि यह जनहित की दृष्टि से एक उपाय के रूप में लाया गया हा और वैधानिक तरीके से संसद में पारित हुआ है।

अनुच्छेद 246 और अनुच्छेद 254 क्या उपाय करते हैं

अधिवक्ता एमएल शर्मा ने अनुच्छेद 246 का उद्धरण देकर कहा है कि कृषि पर कानून बनाने का केंद्र को कोई अधिकार नहीं है क्योंकि वह राज्य सूची का विषय है। अपनी दलील को मज़बूत बनाने के लिए वे संवैधानिक (तीसरा संशोधन) अधिनियम 1954 को चुनौती दे रहे हैं।

“संविधान की सूची 3 के अंतर्गत विधायिका की समवर्ती शक्तियाँ” नामक पृष्ठभूमि पत्र में संवैधानिक विशेषज्ञ पीएम बक्षी कहते हैं कि अनुच्छेद 246(2) के अनुसार संसद और किसी भी प्रदेश की विधान सभा के पास अधिकार होगा कि सातवीं अनुसूची की तीसरी सूची के विषयों पर कानून बना सके।

बक्षी बताते हैं कि अनुच्छेद 246(2) दोनों ही विधायिकाओं को शक्ति देता है और यदि एक ही विषय पर दोनों जगह कानून बनाए गए हैं और उनमें मतभेद हो रहा है तो उस स्थिति में क्या किया जाए इसका विवरण अनुच्छेद 254 में मिलता है।

अनुच्छेद 254(1) के अनुसार यदि राज्य की विधायिका द्वारा बनाए गए किसी कानून का कोई प्रावधान संसद द्वारा बनाए गए कानून के किसी प्रावधान के प्रतिकूल हो तो संसद द्वारा बनाया गया कानून मान्य होगा।

संसद के कानून की मान्यता तब भी होगी जब राज्य की विधायिका ने कानून उससे पहले बनाया हो या बाद में बनाया हो। यह बात उन सभी कानूनों पर लागू होगी जो समवर्ती सूची के 52 विषयों में से किसी विषय पर बनाए गए हों।

हालाँकि, यदि राज्य की विधायिका द्वारा बनाया गया कानून संसद द्वारा बनाए गए कानून के किसी प्रावधान के प्रतिकूल हो लेकिन वह राज्य राष्ट्रपति की अनुमति ले ले तो वह कानून उस राज्य में लागू हो सकता है।

लेकिन इसके बाद भी संसद के पास शक्ति है कि राष्ट्रपति से अनुमति मिलने के बाद भी वह राज्य की विधायिका को कानून के प्रावधानों में संशोधन करने या कानून को वापस लेने के लिए कह सके।

अन्य उचित बिंदु

केंद्र सरकार और राज्यों में सत्ता का विभाजन भारत सरकार अधिनियम 1935 पर आधारित है। सत्ता विभाजन के लिए भारतीय संवैधानिक सुधार पर संयुक्त समिति ने 1934 में जो सुझाव दिए थे, उनके अनुसार “देश भर में लागू होने वाले कानूनों की एकरूपता और प्रांतीय प्रयासों के दिशानिर्देश व प्रोत्साहन के लिए केंद्रीय विधायिका के पास कानून निर्माण का अधिकार होना चाहिए।”

भारतीय संविधान में अब तक 100 से भी अधिक संशोधन हुए ङैं और यह तीसरा संशोधन उपरोक्त सुझावों के अनुकूल ही था। दूसरा महत्त्वपूर्ण बिंदु यह है कि संवैधानिक (तीसरा संशोधन) अधिनियम 1954 खाद्य सामग्रियों, कपास और पटन के व्यापार और वाणिज्य की बात करता है।

यदि केंद्र सरकार के पास अधिकार है कि वह फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय कर सके और आवश्यक भंडारण के लिए अनाज खरीद सके, जिसका वितरण राशन दुकानों के माध्यम से होता है, तो 1954 के संशोधन को शीर्ष न्यायालय भी वैध मानेगा।

केंद्र कृषि नीतियाँ निर्धारित करता है, साथ ही विभिन्न योजनाओं और सब्सिडी के लिए वित्त भी आवंटित करता है। ऐसे में अधिक संभावना इस बात की है कि 1954 का अधिनियम समय की इन परीक्षाओं में उत्तीर्ण हो जाएगा।