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भारतीय राज्य की आत्मा है हिंदू राष्ट्र- सबरीमाला निर्णय न्यायपालिका की गलती

आशुचित्र-

  • न्यायपालिका को इस बात के लिए राज़ी करना होगा कि वह अपना सांस्थानिक और सांभ्रांतिक अहंकार छोड़कर कारण समझने का प्रयास करे।
  • यह बात साफ होनी चाहिए कि भारतीय राज्यतंत्र को सौ करोड़ से अधिक भारतीयों के कल्याण के लिए कार्य करना है और हिंदू राष्ट्र के बिना भारतीय राज्यतंत्र का भी अस्तित्व नहीं रहेगा।

जो सबरीमाला में हो रहा है वह हिंदुओं के लिए 1990 का पूर्वानुभव है। 30 अक्टूबर और 2 नवंबर 1990 को भगवान राम के भक्तों पर मुलायम सिंह यादव की पुलिस ने गोलियाँ चलाई थी और वो भी अयोध्या की पवित्र नगरी में। उनके मृत शरीर सरयू नदी, जो कि भगवान राम की स्मृति से जुड़ी है, से रेत की बोरियों से बंधे हुए मिले। राम के भक्त निहत्थे थे। यह नेहरु के छद्म-धर्मनिरपेक्ष राज्यतंत्र का जलियांवाला कांड था।

आज 28 वर्षों बाद इसकी पुनरावृत्ति सबरीमाला में शुरु हो चुकी है जो अयप्पा जैसे हिंदू देवता का धाम है जिन्होंने जाति, पंथ, भाषा आदि के ऊपर उठकर मानवता को जोड़ा है। लेकिन एक शर्त है। देवता के साथ परंपरा जुड़ी है कि प्रजनन आयुवर्ग की महिलाएँ इस मंदिर में नहीं जा सकतीं क्योंकि अयप्पा एक स्वीकृत अविवाहित देव हैं- एक नैश्तिक ब्रह्मचारी।

कुछ समय पहले, इस निषेध को महिलाओं के विरुद्ध भेदभाव नहीं माना जाता था। आखिर हिंदू धर्म संभवतः दुनिया में आखिरी धर्म है जो मूर्ति पूजा की संस्कृति को मानता है इसलिए इसमें कई विशिष्टताएँ हैं। सहस्त्रों वर्षों में धर्म ऐसे विकसित हुआ है कि इसमें कुछ पवित्र स्थानों की संरचनाएँ और क्रियाएँ लिंग-आधारित हो गईं हैं। केरला में एक अत्तुकल भगवती पोंगल उत्सव मनाया जाता है जहाँ पुरुष प्रवेश निषेध है। प्रथम तमिल महीने कूवगम में चित्रा के पूर्ण चंद्र के समय तमिल नाडू के विज्ज़ुपूरम जिले के एक गाँव में एक ऐसी प्रथा है कि केवल अन्य लिंगों के लोगों को पूजा करने का विशेषाधिकार प्राप्त है। इस प्रकार भारत में कुछ पवित्र स्थानों में लिंग-विशिष्ट प्रथाएँ हमेशा से रहीं हैं। ना ही यह सामाजिक भेदभाव है, न ही लिंग न्याय की अस्वीकृति है।

सबरीमाला निर्णय में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अधिरोपित समानता और लिंग न्याय में भ्रमित होकर इस भूमि की भावना के विरुद्ध फैसला दिया है जो न्यायिक धोखा है। यह भ्रम अस्पृश्यता जैसी प्रबल भेदभावपूर्ण प्रथाओं की रोक में न्यायिक हस्तक्षेप के कारण उत्पन्न हुआ है। हालाँकि, आदर के साथ हम यह कामना करते हैं कि विद्वान न्यायाधीश सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संवेदनाओं से यह समझें कि एक वास्तविक सामाजिक कुरीति और पवित्र स्थानों में एक बहुलवादी निषेध में क्या अंतर होता है।

बेशक, ऐसे तर्कसंगत भेदभाव को समझने के लिए सांस्कृतिक-संवेदनशीलता चाहिए जो बुनियादी मूल्यों से आती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) का नेतृत्व पहले सबरीमाला मुद्दे पर भ्रमित था लेकिन संगठन की वृक्ष-रूपी संरचना के कारण इसे ज़मीनी मूल्यों की समझ हुई और संघ ने अपना मत स्पष्ट किया। कामना है कि भारतीय न्यायपालिका संघ से यह सीख ले। आखिरकार न्यापालिका भी मानव संचालित संस्था ही है।

सत्तारूढ़ पार्टी अपने मत पर ज़िद के साथ टिकी है और सबरीमाला मुद्दे की सच्चाई जानने का प्रयास नहीं कर रही है। पूर्व कानून मंत्री, जो 2014 में भाजपा से जुड़े, ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को लागू करने के लिए सेना और अर्धसैन्य बलों का प्रयोग करना चाहिए। यह व्यक्ति जो खुद को बौद्धिक क्षत्रिया कहता है, ने इसी प्रकार का कथन 1992 में राम जन्मभूमि मुद्दे पर भी कहा था कि धर्मनिरपेक्ष राज्य को सेना की सहायता से उस जगह पर कब्ज़ा करके मुस्लिमों को दे देना चाहिए।

यहाँ तक कि केंद्रीय मंत्रीमंडल भी इस निकट दृष्टि दोष और असंवेदनशीलता से प्रतिरक्षित नहीं है। मेनका गांधी, जिन्होंने पशुओं के साथ मनुष्यों के प्राकृतिक संबंधों के प्रति अपनी अज्ञानता दिखाई है और यू.पी.ए. द्वारा जल्लीकट्टू की रोक को अपना समर्थन दिया था, ने सबरीमाला विषय में भी हठी असंवेदनशीलता दिखाई है। शुक्र है, अरुण जेटली ने न्यायिक हस्तक्षेप के प्रति अपने संदेह व्यक्त किया है।

विंध्य के उत्तर में नेहरुवादी विचारों से प्रभावित दक्षिणपंथी और वामपंथी मीडिया ने अपने आत्मपूजी एंकरों द्वारा विंध्य के दक्षिण की आध्यात्मिक परंपराओं के प्रति घोर सांस्कृतिक अशिक्षा का परिचय दिया है। विंध्य के दक्षिण  के वासियों ने वैदिक परंपरा को उत्तरवासियों से अधिक संरक्षित रखा है। हालाँकि यह बात समझ में आती है कि दक्षिण ऐसा करने में इसलिए सफल हुआ क्योंकि आक्रमणकारियों के विरुद्ध 800 वर्ष लंबा प्रतिरोध उत्तर द्वारा किया जा रहा था। लेकिन उस समय उत्तर भारतीय धर्म को समझते थे व दक्षिण भारतीयों की संस्कृति का सम्मान करते थे। पिछले दशकों में नेहरुवादी शिक्षा ने सांस्कृतिक साक्षरता को नष्ट कर दिया जिससे आज जैसी विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गई। अपनी समगठनात्मक एकता के बावजूद आज दक्षिण भारत और उत्तर भारत अक-दूसरे को अन्य दृष्टि से देखते हैं।

और इस सांस्कृतिक समझ की शून्यता को मार्क्सवादी अवसर की तरह देखते हैं। मार्क्सवादी औपनिवेशिक, यूरो-केंद्रित, मूर्ति पूजा विरोधी विचारधारा के समर्थक हैं जो उन्हें नैसर्गिक तौर पर हिंदू-विरोधी विचारधारा का बनाती है। हिंदू संस्कृति और परंपरा पर किसी भी प्रकार के आक्रमण का ये हमेशा समर्थन करते हैं परंतु इस्लाम और ईसाई धर्म की विचारधाराओं के सामने खुशी-खुशी समर्पण कर देते हैं।

सबरीमाला मुद्दे में जो चीज़ दाँव पर लगी है वह एक मंदिर के मुद्दे से कई अधिक महत्त्वपूर्ण है।

अन्यथा, यह तथ्य कि हज़ारों साधारण हिंदू महिलाएँ निर्णय के विरोध में केरला की सड़कों पर उतर आई हैं, किसी भी न्यायपालिका को संवेदना एवं स्वेच्छा से सुनने के लिए मजबूर कर देती। अन्यथा इस तथ्य से, कि समुदाय के प्रथम अनुसूचित पूजारी यदुकृष्णन जो सबरीमाला परंपरा की रक्षा के लिए विरोध कर रही महिलाओं के समर्थन में आए हैं, मीडिया और न्यायपालिका यह समझ जाती कि इस निषेध का संबंध सामाजिक न्याय से नहीं है।

न्यायाधीशों को इस बात का आभास नहीं हुआ होगा परंतु केरला की सड़कों पर उतर आई महिलाएँ भारतीय न्यायपालिका को इस आत्मघाती निर्णय से रोकने के लिए रैली कर रहीं हैं। आत्मघाती इसलिए क्योंकि यह हिंदू राष्ट्र की धड़कन समझने में अक्षम है। लेकिन दुखद बात यह है कि भारतीय राज्य की संस्थाएँ तेज़ी से ‘हिंदू-फोबिक’ होती जा रही हैं। सबरीमाला आंदोलन इस संस्थानिक हिंदू घृणा के विरुद्ध एक हिंदू राष्ट्र की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है।

भारतीय राज्य का अस्तित्व में होना आवश्यक है। हम इसे असफल नहीं होने दे सकते। यह असफल न हो, इसका पतन न हो, इसके लिए आवश्यक है कि यह अपने वर्तमान रूप में 5000 साल पुराने लेकिन जीवंत हिंदू राष्ट्र को समाहित करे जो हज़ारों साल से विध्वंस सह रहा है। माननीय न्यायपालिका ने उसी डाल को काटना शुरु कर दिया है जिस पर यह आसीन है। तो चलें प्रयास करें कि न्यायपालिका अपना सांस्थानिक और सांभ्रांतिक अहंकार छोड़कर कारण को समझे।

यह बात साफ रहे कि न्यायपालिका को 100 करोड़ से ज़्यादा भारतीयों के कल्याण के लिए कार्य करना है और बिना हिंदू राष्ट्र के राज्यतंत्र असफल हो जाएगा। एक खंडित भारत, मार्क्सवादियों और भारत-विरोधी ताकतों का दीर्घकालिक लक्ष्य है। यदि हिंदू अध्यात्म हमें नहीं जोड़ेगा तो भाषाई विविधता के आधार पर हम सब बँट जाएँगे- जैसा कि सबरीमाला मुद्दे में देखा जा सकता है।