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नवरात्रि विशेष- देवी के नौ रूपों का जीवंत उदाहरण है भारतीय स्त्री शक्ति

विचित्र विडम्बना है कि प्रभावशाली पुरुषों द्वारा प्रताड़ित महिलाओं के संघर्ष के अंतर्राष्ट्रीय अभियान “मी-टू” का आगमन भारत में नवरात्रि में देवी पूजन के भारतीय त्यौहार के साथ हो रहा है। जहाँ पश्चिमी दर्शन भारत की मातृ-सत्तात्मक संस्कृति का प्रशंसक सदा से रहा है, पश्चिम से प्रेरित राजनैतिक प्रबुद्ध समाज आविष्कृत तथ्यों के आधार पर उसे नकार कर वैचारिक औपनिवेशवाद की रक्षा करने में संलग्न रहा है।
यह वही प्रबुद्ध वर्ग है जो बौध्दिक विकेन्द्रीकरण से खासा चिंतित रहा है एवं हर दुर्भाग्यपूर्ण घटना पर भारत को विश्व में महिला-विरोधी अपराधों एवं बलात्कारों के केंद्र के रूप में स्थापित करने में व्यस्त रहा है। यह एक खास वर्ग रहा है जिसे अपने हाथ से सत्तर वर्षों में स्थापित वैचारिक सत्ता फिसलती जान पड़ती है और इनका सूर्य पूर्व के बजाय पश्चिम से उदय होता है। इन्हें इससे अंतर नहीं पड़ता कि जब आप अपने राष्ट्र की छवि को राजनैतिक द्वेष के कारण अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में मलिन करते हैं, इससे न तो महिला सशक्तिकरण की धारा को कोई बल मिलता है, न उस राष्ट्र को जो सनातन काल से स्त्री सशक्तिकरण को सबल करता आया है। इन्हें इससे अंतर नहीं पड़ता कि भारत बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों में विश्व के राष्ट्रों में 45वें स्थान पर है, वहीं अमेरिका नौवें स्थान पर।
ऐसा नहीं है कि यह तथ्य कोई हर्ष का विषय है, क्योंकि जब तक हमारे देश में एक भी महिला अधिकारों से वंचित रहेगी, हम उस आध्यात्मिक आदर्श से दूर ही रहेंगे जो हमारे पूर्वजों ने स्थापित किया था। स्त्री की स्थिति ही समाज में नैतिकता का मानदंड निर्धारित करती है। कुछ तो विचार महर्षि व्यास के मन में रहे होंगे एक नव निर्मित समाज व्यवस्था के लिए कि जब वेदों को मानवजीवन के मानक के रूप में स्थापित किया जा रहा था, उन्होंने एक दो नहीं तीस के लगभग ऋषिकाओं को ऋग्वेद में स्थान दिया। जहाँ उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में मूर्धन्य लेखिका ‘अ रूम ऑफ़ हर ओन’ में महिलाओं के लिए ब्रिटिश पुस्तकालयों में प्रवेश के अधिकार के लिए संघर्ष कर रही थी, सात-आठ हज़ार वर्ष पूर्व मनु-पुत्री देवहुति न केवल ऋग्वेद में देववाणी संस्कृत में श्लोक लिख रहीं थीं, वरन अपने लिए पति का भी चयन कर रही थी।
भारत में स्त्रियाँ सामान्यत: सांस्कृतिक दृष्टि से पूजनीय रहीं हैं भले ही स्व-संस्कृति पर अविश्वास पैदा करने के विचार से जानबूझकर इस सन्दर्भ में भ्रम उत्पन्न किया गया हो। स्वतंत्रता सेनानी सावरकर के अनुसार एक ऐसे राष्ट्र को पराधीन रखनाअपेक्षाकृत सरल होता है यही विचार सम्मुख रखकर, आधा श्लोक उठाकर वेदों में सती के वैधता का दुष्प्रचार किया गया। दुर्भाग्यवश, वामपंथी भारतीय शिक्षाविदों ने मैकॉले की राजनैतिक शिक्षा पद्धति में सुधार करने का कोई विचार नहीं किया, शिक्षा के लोकतंत्रीकरण का मार्ग अवरुद्ध करने की चेष्टा में, ऐतिहासिक तथ्यों के पुनर्स्थापन में विघ्न ही प्रस्तुत किया।
भारत में स्त्रियों की सशक्त स्थिति इस्लामिक आक्रमणों एवं ब्रिटिश विक्टोरियाई सिद्धांतों के सामने भी टिकी रही, इसका कारण भारतीय संस्कृति एवं धर्म में उसका होना था। हिन्दू ग्रन्थ एवं पुराण कवित्त सौंदर्य एवं दार्शनिक गूढ़ता धारण किये हैं एवं इनके अध्ययन के लिए एक स्नेहिल श्रद्धा आवश्यक है। हम नवरात्रि के पर्व को उसके ब्रह्मरूप से स्वीकार कर सकते हैं, या उसके भीतर व्याप्त दार्शनिक सत्य पर मनन कर के सामाजिक परिवर्तन की नींव रख सकते हैं।
नवरात्रि का सौंदर्य एवं महत्त्व इसी में है कि यह वार्षिक आयोजन सामाजिक सोच के भिन्न स्तरों पर उतरकर सामाजिक सुधार एवं महिला सशक्तिकरण के संघर्ष को बल देता है। हम इसे एक विचार-शून्य रूढ़िमान कर एक प्रपंच के रूप में नकार सकते हैं, किन्तु हमारे ह्रदय और आचरण में उतरी ऐसी ही मूल्य व्यवस्था की विरासत है जिसमें हमारे भविष्य की कुंजी है।
नवरात्री का त्यौहार, नौ दिन देवी के नौ रूपों के पूजन पर आधारित है। किन्तु नौ दिवस क्यों, नौ रूपक्यों? व्याख्याएँ कई हो सकती हैं, किन्तु मेरे विचार में नौ रूपों का तात्पर्य उन भिन्न भूमिकाओं से है, जिनका निर्वाह एक महिला, आज भी, अपने जीवन में अलग-अलग समय पर करती है।
प्रथम दिवस देवी शैलपुत्री होती है। इस रूप में हिमालय की बिटिया गौरी की लाड-मनुहार, ज़िद-व्यवहार किसी कन्या से भिन्न नहीं होता है। गौरी राजपुत्री है, किन्तु विवाह की इच्छा धरती है प्रथम – दार्शनिक शिव से। शिव जो एक अर्थ में अनार्यदेव हैं, विधुर भी हैं , एवं सामाजिक व्यवस्था के अनुसार भिन्न वर्ग में पड़ते हैं। पिता हिमवान पुत्री प्रारंभ में पृष्ठभूमि की भिन्नताओं को देखते हुए आशंकित अवश्य होते हैं, किन्तु अंततः एक स्नेही पिता की भाँति वर्ग-वर्ण भेद को छलांग कर पुत्री को अपने स्वप्न की प्राप्ति की साधना की अनुमति दे ही देते हैं। पुत्री की इच्छा एवं अभिलाषा के मार्ग में न समाज का स्थान है, न ही राजनीति का।
गौरी शिव को पति मान लेती है एवं पिता की अनुमति भी प्राप्त कर लेती है। किन्तु गौरी के अस्तित्व का उद्देश्य केवल महादेव की अर्धांगिनी बन जाने में ही सीमित नहीं है। एक व्यक्ति के नाते गौरी को विवाह पूर्व शिक्षा प्राप्त करनी है, एक महिला के नाते परिपक्व भी होना है। सो द्वितीय दिवस देवी ब्रह्मचारिणी का होता है। आज जो युवती समाज में अपने स्थान को लेकर संघर्षरत है, विद्यार्थी है, ज्ञान या कला के अभ्यास में रत है, ब्रह्मचारिणीहै। उसने अपने लिए गगन का चयन तो कर लिया है किन्तु, उसे अपने पंखों को भी पुष्ट करना है ताकि वे उड़ान में उसकी सहायता कर सकें एवं महादेव समान प्रतापी पति को पाकर भी वह पति की प्रतिच्छाया होने तक सीमित न रह जाए।
इसके पश्चात तीसरा दिवस देवी चंद्रघंटा का होता है। इसकी कथा भी प्रत्येक गृहणी के लिए एक आदर्श प्रस्तुत करती है। राजपुत्री गौरी की माता मैना जब शिव का वैरागी रूप देखती है तो भयभीत होती है। गौरी शिव के समान रूप धारण कर के माता-पिता को विश्वास दिलाती है कि वह अपने नए जीवन के लिए समर्पित है। परिवार समाज की इकाई है एवं पारिवारिक सामंजस्य पर अगली पीढ़ी का स्वास्थ्य एवं भविष्य निर्भर होता है। ऐसे में पारिवारिक एकात्मकता एवं तारतम्य का ही प्रतिरूप देवी चंद्रघंटा में है। आधुनिकता की पश्चिमी परिभाषा में बहुधा पारिवारिक महिलाएँ उपेक्षित होती हैं, किन्तु समाज की रीढ़ बन के खड़ी रहने वाली विवाहिताओं को माँ चंद्रघंटा का श्रद्धा पुष्प समर्पित होता है।
चौथे दिन भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति की मातृ-सत्तात्मक संरचना की कटिबद्धता परिलक्षित होती है। जहाँ अन्य पुरुष प्रधान संस्कृतियाँ प्रथम पुरुष से प्रारम्भ होती है जिसमें स्त्री की उत्पत्ति पुरुष से होती है, एवं उसका अस्तित्व पुरुष की संगिनी होने तक ही सीमित होता है, माता कूष्माण्डा का दिवस उस स्त्री शक्ति का सम्मान करता है जो सृष्टि का उद्गम है। जब कुछ नहीं था, होने ना होने से परे, जीवित निर्जीव से परे, आदिशक्ति नारी रूप में उपस्थित थी, जिसके मंद स्मित से सृष्टि का जन्म हुआ। इस कथा में संसार में जीवन की उत्पत्ति एवं विस्तार की दो मूलभूत आवश्यकताएँ परिभाषित होती हैं- स्त्री का होना, एवं स्त्री का प्रसन्न होना। समाज की निरंतरता के लिए स्त्री का प्रसन्न एवं अवसाद-हीन होना आवश्यक है। जिस समाज में नारी न हो या निराश हो वह समाज पतनोन्मुखी हो जाता है एवं अस्तित्व की निरंतरता बनाने में असमर्थ हो जाता है।

पंचम दिवस स्कंदमाता का है। गौरी पुत्र न प्राप्त कर सकी, किन्तु क्या उससे उनकी मातृत्व की भावना या क्षमता प्रभावित होती है? शिवपुत्री गौरी ने जिस दिन कृतिका पुत्र स्कन्द को गोद में लिया, वह एक माता के रूप में परिपूर्ण हो गया। यह दिन देवी को पुत्रहीन महिलाओं से जोड़ता है एवं दत्तक संतान को सामाजिक मान्यता देता है। आधुनिक समाज में जहाँ परिवार विहीन बच्चों को घर और जीवन देने के लिए अभियान चलाए जा रहे हैं, क्या गौरी का स्कंदमातारूप समाज को एक आधुनिक परिपेक्ष्य नहीं प्रदान करता?
षष्ठी या छठा दिन माता कात्यायिनी का होता है। जिस समाज में बौद्धिकता का सम्मान नहीं रहता, महिष बुद्धि पुरुष भुजाओं के बल पर नीति एवं नियम का निर्धारण करते हों, वहाँ माता कात्यायिनी प्रधान शक्ति के रूपमें, स्त्री एकता के रूप में, अन्य स्त्री शक्तियों को अपने साथ जोड़कर पाशविक शक्ति की सत्ता को चुनौती देकर सामाजिक संतुलन को पुनर्स्थापित करती है। गौरी को इस अभियान के लिए शिव की आवश्यकता नहीं, केवल आवश्यकता है तो शिव के द्वारा उसे सशक्त करने की। अपने युद्ध व ह स्वयं लड़ने में सक्षम है। एक अपने आप को लेकर आश्वस्त पुरुष के द्वारा सशक्त की हुई महिला किसी भी संघर्ष के लिए सक्षम होती है। माँ कात्यायनी क्षत्रिय परिवार में जन्म न लेकर , एक ब्राह्मण के घर का जन्म के लिए चयन करती हैं इसमें वर्ण-व्यवस्था की तरलता का सिद्धांत भी कहीं न कहीं छुपा प्रतीत होता है।
सप्तमी माता कालिका का दिवस, एक सशक्त महिला एवं एक प्रतापी एवं सहयोगी पुरुष के तारतम्य की कथा। जब स्त्री पुरुषवत हो जाए, एवं नारी सुलभ सौम्यता के त्याग को भूलवश सशक्त अस्तित्व का पर्याय मान ले, उच्छृंखलता को स्वतंत्रता समझले तो शिव समान पुरुष को समर्पण एवं सम्मान के साथ स्त्री को उसके विध्वंसकारी रूप से वापस लाना होता है। स्त्री सामाजिक मर्यादा का मेरुदंड है , जिसके बिना कोई भी समाज बिखर जाएगा। स्त्री सुलभ सौम्यता समाज के नैतिक स्थायित्व का निर्धारण करती है। माता कालिका का क्रोध, हिंसा, मानव हृदय में छुपी कलुषित भावनाओं की स्वीकार्यता एवं निराकरण को
इंगित करती है। सनातन दर्शन पाप-पुण्य के आधार पर व्यक्ति और विचारों को नहीं तौलता, न ही नकारात्मक भावनाओं के दमन का समर्थन करता। सनातन दर्शन इस सन्दर्भ में उसी सिद्धांत की बात करता है जिसको आधुनिक मनोविद भी स्वीकार करते हैं।
माता कालिका के दिवस के पश्चात अष्टम दिवस उस योद्धा स्त्री के सम्मान में है जो अपने अंतर के एवं बाहर के युद्ध में विजयी होकर लौटी हो। हृदय के कोनों में छिपी कलुषित भावनाओं को स्वीकार करके , अपने व्यक्तित्व के नकारात्मक भावों से कालिका रूप में विजयी हुई माँ एक उज्जवल आत्मा के साथ माँ महागौरी बनकर लौटती है- लोभ, मोह, क्रोध से परे।
नवम दिवस माँ सिद्धिदात्री का होता है। जिस दिन स्त्री ज्ञान प्राप्त करके समाज में स्थान खोज लेती है, अपना गौरव सृष्टि के मूल के रूप में प्राप्त कर लेती, परिवार में, माता, पत्नी के रूप पा लेती है, अपना स्वतंत्र अस्तित्व बूझ लेती है, अपने आप से आत्मिक संघर्ष में विजयी होकर, स्वयं को पा लेती है, उसके जीवन का लक्ष्य सिद्ध हो जाता है और वह सिद्धिदात्री रूप में पूजी जाती है।
नवरात्रि स्त्री के भिन्न रूपों का व्रत है, एक स्त्री के भिन्न रूपों को सम्मानित एवं पूजित करता है। हमें हमारी जड़ों की ओर लौटने का अवसर देता है, एक सुलझी हुई सोच के लिए जगह बनाता है। वह सोच जो व्यक्ति के आतंरिक संघर्ष, स्त्री एवं पुरुष के आपस के समन्वय और वृह द्समाज के साथ तारतम्य को परिभाषित करती हो। इसी संघर्ष पर, समन्वय पर, तारतम्य पर एक स्वस्थ एवं संपन्न समाज की आधारशिला स्थापित होती है। नवरात्रि उसी विचार को पुनःपरिभाषित करने का अवसर प्रस्तुत करती है जिस विचार पर युगों-युगों से यह सभ्यता सनातन है।