विचार
पत्रकारिता का पाठ कम-से-कम वे तो न पढ़ाएँ जिनके खुद के घर ‘शीशे’ के हैं

कितनी विडंबना है कि समाचारों को तोड़-मरोड़कर पेश करने वाले, कुछ घटनाओं को दबाने और कुछ घटनाओं को अनुपात से अधिक बड़ा दिखाने के लिए नमक-निर्च लगाकर परोसने वाले मीडिया पोर्टल किसी दूसरे को पत्रकारिता का पाठ पढ़ाते हैं।

निस्संदेह ही भाषा का बड़ा महत्त्व है और शालीन भाषा से पत्रकारिता में चार-चांद लग जाते हैं लेकिन सिर्फ ऐसी शालीन भाषा का वागाडंबर जो तथ्यों में खोखला हो, उसे पत्रकारिता नहीं कहा जा सकता, वह मात्र आत्म-तुष्टि और अपने संरक्षकों की सेवा में गढ़ा गया एक आभासी शब्द-महल है।

वहीं, दूसरी ओर तथ्य-आधारित पत्रकारिता में कुछ अपशब्दों के उपयोग से गरिमा तो गिरती है लेकिन मात्र इस आधार पर किसी की पत्रकारिता को ‘कैन्सल’ नहीं किया जा सकता। वैसे तो आप जानते हैं कि ‘कैन्सल कल्चर’ वामपंथियों की उपज है।

हो भी क्यों न! किसी भी वाद-विवाद के लिए आवश्यकता होती है तथ्यों और तार्किकता की जो वामपंथियों के पास अल्प मात्रा में उपलब्ध है। ऐसे में ‘कैन्सल कल्चर’ उनके लिए ब्रह्मास्त्र बन जाता है जिससे उन्हें किसी प्रतिद्वंद्वी का सामना ही न करना पड़े और वे उसे ‘कैन्सल’ करके आगे बढ़ जाएँ।

वैसे, ‘कैन्सल कल्चर’ को एक सफल पद्धति बनाने के लिए वामपंथी पारिस्थितिकी तंत्र की प्रशंसा करनी पड़ेगी। यहाँ कोई छोटा मीडिया पोर्टल भी किसी को ‘कैन्सल’ करने का आह्वान करे तो ‘बड़े-बड़े बौद्धिक’ भी उसके समर्थन में उतर जाते हैं।

‘कैन्सल कल्चर’ के अलावा जो दूसरा हथियार वामपंथियों के पास है, वह है दोहरे मापदंड। जिस तरह से अब्राह्मिक मतों में मत को मानने और मत को न मानने वालों की दो श्रेणियों में मानव-जाति को बाँटा गया है, ठीक वही सिद्धांत वामपंथियों ने भी अपनाया है।

अब्राह्मिक मतों में मत को मानने और न मानने वालों के लिए अलग-अलग नियम भी होते हैं, उसे ही दोहरे मापदंड कहा जा सकता है। वही नियम वामपंथी लागू करते हैं। जो व्यक्ति वामपंथी है, उसे कुकृत्यों के आरोपों से छूट दे दी जाती है और दूसरे पक्ष के व्यक्ति की छोटी चूक भी बड़ा रूप ले लेती है।

इन सबके पीछे की प्रेरणा वही है, जो किसी भी साम्राज्यवादी विचारधारा की होती है- अपना आधिपत्य स्थापित करना। आज जब मीडिया का लोकतांत्रिकरण हो रहा है, दूसरे पक्ष की आवाज़ों को भी उपयुक्त मंच मिल रहे हैं तो वामपंथी अपने हाथ से इस सत्ता को जाते नहीं देख पा रहे हैं।

इसी कारण देखा गया कि जन की बात के प्रदीप भंडारी और डुपॉलिटिक्स के अजीत भारती जैसे पत्रकारों को निशाना बनाया गया क्योंकि वे ऐसे मुद्दों को उठा रहे थे जो न सिर्फ वामपंथियों द्वारा गढ़े गए नैरेटिव की पोल खोल रहे थे, बल्कि उनका असली चेहरा भी सामने ला रहे थे।

वामपंथी-उदारवादी मीडिया इस तरह के प्रपंचों से लोगों के लिए नैरेटिव गढ़ने के आधिपत्य को पुनः प्राप्त करने का प्रयास कर रही है। आशा करती हूँ कि लोग समझदार हैं और अच्छे-बुरे में भेद कर सकते हैं। आप ही को चुनना है कि किस तरह की पत्रकारिता के उपभोक्ता आप बनना चाहते हैं।

निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में वरिष्ठ उप-संपादक हैं। वे @nishthaanushree के माध्यम से ट्वीट करती हैं।