विचार
हिन्दू-मुस्लिम द्वंद्व को समझना है तो अंबेडकर, सरदार पटेल को पढ़ें

हिन्दुस्थान के संबंध में खरी-खरी बात है कि ‘हिन्दू-मुस्लिम द्वंद्व’ शताब्दियों में विकसित ‘सबसे बड़ा द्वंद्व’ एवं ‘सबसे बड़ी ग्रंथि’ है। यद्यपि हम अति उदार होकर कह लें कि ‘हिन्दू-मुस्लिम का डीएनए एक’ है, तथापि नकारा नहीं जा सकता कि यह सर्वाधिक कटुतापूर्ण द्वंद्व है। मन पर नौ मन बोझ रखकर ही सही, इसे स्वीकार लेना चाहिए।

कफ़ील आज़र अमरोहवी की मशहूर नज़्म है– “बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी। लोग बे-वज्ह उदासी का सबब पूछेंगे।” इसलिए आलोच्य विषय पर बात करते हुए वर्तमान की बेहतर समझ हेतु अतीतावलोकन नितांत आवश्यक है। खरी-खरी कहनेवाले बिरले ही मिलेंगे।

अंबेडकर इस द्वंद्व (ग्रंथि) को बेहतर समझते थे। उन्होंने ‘थॉट्स ऑन लिंग्विस्टिक स्टेट’ में आलोच्य विषय के संबंध में अत्यंत बेबाकी से खरी-खरी कही, “मुझे खुशी थी कि भारत पाकिस्तान से अलग हो गया था। मैंने विभाजन की वक़ालत इसीलिए की थी क्योंकि मुझे लगा कि विभाजन से हिन्दू न केवल स्वतंत्र होंगे, अपितु मुक्त होंगे।

यदि भारत और पाकिस्तान एक ही राज्य में एकत्रित रहते तो हिन्दू स्वतंत्र होकर भी मुसलमानों की दया पर निर्भर होते। हिन्दुओं की दृष्टि से स्वतंत्र भारत उनके लिए कदापि स्वाधीन भारत नहीं होता। दो राष्ट्र होते हुए यह एक देश की सरकार होती और हिन्दू महासभा एवं जनसंघ के होते हुए भी मुसलमान ही शासक होते। जब बंटवारा हुआ तो मुझे लगा कि भगवान अपने श्राप को हटाने और भारत को एक, महान् और समृद्ध बनाने के लिए तैयार हैं।”

इसी क्रम में सरदार पटेल के विचार भी खरी-खरी कहने वाली चिंतन-धारा में हैं। उन्होंने मुसलमानों की मज़हबी मनोग्रंथि के मद्देनज़र 3 जनवरी 1948 को कोलकाता में कहा था, “हिन्दुस्थान में तीन-चार करोड़ मुसलमान पड़े हैं। यह कोई ऐतराज़ की बात नहीं है। उनमें से ज्यादातर लोगों ने पाकिस्तान बनाने में साथ दिया लेकिन अब एक रोज़ में, एक रात में क्या दिल बदल गया?

दिल कैसे बदल गया, मेरी समझ में नहीं आता। वो कहते हैं कि हम वफ़ादार हैं तो हमारी वफ़ादारी पर शंका क्यों की जाती है? तो हम कहते हैं कि अपने दिल से पूछो। हमने एक बात कही कि आपने पाकिस्तान बनाया, आपको मुबारक! वो कहते हैं कि पाकिस्तान और हम (हिन्दुस्थान) एक हो जाएँ, तो मैं कहता हूँ कि मेहरबानी करके ऐसी बात न करो, हमें अलग ही रहने दो।”

पटेल ने विभाजन को अकारण ही स्वीकार नहीं किया था। ‘द्विराष्ट्र के सिद्धांत’ की आधारशिला रखे गए शहर लखनऊ में 6 जनवरी 1948 को जनसभा को संबोधित करते हुए कहा, “भारतीय संघ के प्रति देशभक्ति की घोषणा मात्र कर देने से उन्हें (मुसलमान) कोई सहायता नहीं मिलेगी। उन्हें अपनी घोषणा का व्यावहारिक प्रमाण प्रस्तुत करना होगा।”

इसी भाषण में मुसलमानों की मज़हबी मनोग्रंथि को रेखांकित करते हुए कहा, “यह कहा गया था कि मुस्लिम सभ्यता और परंपराएँ हिन्दुओं के समान नहीं हैं। उनका एक अलग देश था।… तब हम लोगों ने सोचा कि यदि देश का विभाजन होना ही है तो इसे हो जाने दिया जाए।”

स्पष्ट है कि मज़हबी उन्माद ने विभाजन की विवशता को तीव्रातितीव्र कर दिया था। ‘द्विराष्ट्र का सिद्धांत’ देने वाली मुस्लिम लीग (1906) येनकेनप्रकारेण पाकिस्तान प्राप्त करना चाहती थी। जबकि छद्म आवरण एवं मुखौटो में लेफ्ट-लिबरल प्रायः हिन्दू महासभा एवं जनसंघ को दोषी ठहराकर मुद्दा भटकाते हैं।

मज़हबी उन्माद के प्रतिक्रियास्वरूप हिन्दू महासभा (1915) और कांग्रेस की तुष्टीकरण की नीति के परिणामस्वरूप जनसंघ का उदय (1951) हुआ था। ‘अखण्ड भारत’ के स्वप्नजीवी ‘द्विराष्ट्र’ के पक्षधर कैसे हो सकते थे? सत्य है कि हिन्दुओं ने मज़हबी उन्माद का प्रतिरोध किया। वह आत्मरक्षात्मक दृष्टि से अनिवार्य था।

पटेल-अंबेडकर ने मज़हबी मानसिकता का आकलन-विश्लेषण करते हुए खरी-खरी कही परंतु ‘पीर पराई’ का आग्रह करने वालों ने कल्पनातीत हिन्दू-मुस्लिम समन्वय-एकता, सेक्यूलरिज़्म की लच्छेदार बातों में हिन्दुओं की स्थिति दाँतों में जीभ की तरह कर दी।

स्वतंत्रता उपरांत तो हिन्दुओं के मन-मस्तिष्क को सेक्यूलर (नपुंसक?) बनाने के हरसंभव प्रयास हुए। इसमें साम्यवादी दृष्टि ने भी सक्रिय भूमिका अदा की। इस प्रकार मध्यकालीन ‘परहित सरिस धरम नहिं’ और आधुनिककालीन ‘पीर पराई’ की दृष्टि के परिणामस्वरूप हिन्दुओं की जीभ मज़हबी उन्माद पर बोलना चाहकर भी अचकचा जाती है।

कोई मज़हबी उन्माद पर बोलता है तो लेफ्ट-लिबरल गिरोह हुँआ-हुँआ करने लग जाता है। अंततः हिन्दू ही ‘सांप्रदायिक’ हो जाता है। यह जानना-समझना चाहिए कि पूरे विश्व में सेक्यूलरिज़्म अस्तित्व में नहीं है। हरकोई अपना-अपना खाका खींचकर चल रहा है।

सेक्यूलरिज़्म जितना भुलावा है, उससे अधिक छलावा है। इसीलिए पटेल-अंबेडकर ने बेपरवाह होकर खरी-खरी कहने की हिम्मत की। पटेल की स्पष्टवादिता के कारण मुसलमानों ने उन्हें शत्रु माना और उनके विरुद्ध ज़हर भी उगला। लखनऊ की जनसभा में पटेल ने स्पष्ट कहा, “मैं स्पष्ट रूप से अपनी बात कहने में विश्वास करता हूँ। मैं नहीं जानता कि मृदु शब्दों में किसी का खंडन किस प्रकार किया जाता है।”

कितने लोग यह हिम्मत रखते थे (हैं?)। स्वतंत्रता उपरांत भी हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए गांधी ने उपवास किया। 16 जनवरी 1948 को पटेल ने मुंबई में कहा, “यदि स्वाधीनता प्राप्त करने के बाद भी हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित करने के लिए गांधीजी को उपवास करना पड़ रहा है तो हम लोगों के लिए यह एक शर्मनाक स्थिति है।” अंत में कहा, “मुसलमानों को अपनी मनोवृत्ति बदलनी होगी। उन्हें जो ‘द्विराष्ट्र का सिद्धांत’ सिखाया गया है, उसे भुलाना होगा।”

स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मनाते हुए हमें मज़हबी समुदाय की मानसिकता का आकलन-विश्लेषण करना चाहिए। सबकुछ मनमुआफिक होने के बावजूद मज़हबी उन्माद समाप्त नहीं भी हुआ तो क्या उसमें कुछ कमी हुई? यदि मुस्लिम पाकिस्तान-परस्त नहीं हैं तो मौक़े-बेमौक़े पाकिस्तान की जीत पर पटाखे क्यों फूटते हैं?

क्या यह सच है कि उन्हें देश से अधिक घुसपैठियों से विशेष प्रेम है? यदि नहीं तो नागरिकता संशोधन अधिनियम पर पूरे देश में चक्काजाम क्योंकर किया गया? आचरण-व्यवहार की दृष्टि से ऐसे अनगिनत विचारणीय प्रश्न हैं।

यह जानना-समझना चाहिए कि इतनी शताब्दियों में हिन्दू-मुस्लिम द्वंद्व कटुतर नहीं होता यदि मुसलमान हिन्दुओं को ‘काफ़िर’ न मानते और मज़हबी विस्तारवादी सोच के साथ उनका पददलन न होता परंतु मुस्लिम शासकों ने प्रायः अपनी मज़हबी मनोग्रंथि के साथ हिन्दुओं को लक्ष्य बनाया।

यह बात और है कि भारत की खोज करने वाले तथाकथित इतिहासकारों ने मुसलमान शासकों के ख़ूब कसीदे पढ़े। मध्यकाल के उत्तरार्ध में छत्रपति शिवाजी के उदय का अध्ययन करते हुए ‘मुसलमान शासकों की उदारता’ का अनुमान लगता है। गुरु गोविंद सिंह के पुत्र जोरावर सिंह और फतेह सिंह की हत्या की घटना से भी उदारता का परिचय मिलता है। इस्लाम कुबूल न करने पर उन्हें दीवार में चुनवा देने की घटना स्तब्ध कर देती है।

प्रसंगावधान से शाह वलीउल्लाह का प्रकरण स्मरणीय है। जब ‘भारतीय शक्ति’ के रूप में मराठों ने अंततः ज़ज़िया कर लागू करनेवाले मज़हबी अराजकतावादी मुग़लिया सल्तनत का अंत किया और दिल्ली पर मराठा साम्राज्य स्थापित हुआ तो शाह वलीउल्लाह ने उन्हें दिल्ली से पदच्युत करने के लिए अफगानिस्तान के अहमद शाह अब्दाली (दुर्रानी) को आमंत्रित किया था। मज़हबी काफ़िरों को बर्दाश्त नहीं कर पाता है।

मोपला, डायरेक्ट एक्शन, नोआखाली नरसंहार इत्यादि जैसी षड्यंत्रकारी घटनाएँ हिन्दुओं के घावों को कुरेदने का काम करती रही हैं। आये दिन मज़हबी उन्माद की घटनाओं के कारण ये घाव जीवंत हो उठते हैं। हिन्दुओं में उभरती हुई चेतना कहती है कि मुस्लिमों को मज़हब के नाम पर पाकिस्तान तो मिला परंतु हिन्दुओं को सेक्यूलरिज़्म के पाठ के अतिरिक्त क्या मिला? कफ़ील आज़र अमरोहवी ने उचित ही लिखा है– “बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी। लोग बे-वज्ह उदासी का सबब पूछेंगे।”

क्रमशः

यह लेख पहले स्वदेश के 17 जनवरी 2022 संस्करण में प्रकाशित हो चुका है।

डॉ आनंद पाटील युवा आलोचक हैं और तमिलनाडु केन्द्रीय विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं। वे @AnandPatilCU के माध्यम से ट्वीट करते हैं।