विचार
धर्मांतरण का मूल आधार ऐसी अवसरवादिता जो वास्तव में कोई अवसर नहीं देती

यह लेख किसी सिद्धांत-दर्शन पर आधारित नहीं है, अपितु अत्यंत व्यावहारिक तथा अनुभवजन्य बातों पर आधारित है। जिस ‘सच’ से सामना करते हुए भी हम ‘मुझे क्या और मेरा क्या?’ वाली प्रश्नार्थक मुद्रा में आगे बढ़ जाते हैं; निर्विकार भाव से उसी में गुज़र-बसर करते हैं, इस बात से बाख़बर या बेख़बर कि कितने ‘शातिराना’ अंदाज़ में ‘वह सच’ हमारे जीवन में घुसपैठ कर रहा (चुका) है।

स्मरणीय है कि ‘सेक्यूलरिज़्म’ केवल हमारी ही (हिंदू) शिराओं में बहता (रहा) है। अर्थात् हमारे डीएनए में है। मुसलमान ‘आसमानी क़िताब’ का अनुसरण कर इस्लाम और ईसाई ‘बाइबल’ का अनुसरण कर ईसाइयत के प्रचार-प्रसार में अविरत लगे हुए हैं। वे अपने धर्म-विस्तार हेतु मौक़ों की तलाश ही नहीं करते, अपितु मौक़े-बेमौक़े मौक़े बनाते हैं और उन्हें सफल बनाते हैं।

एक ओर ‘जिहादी मानसिकता के खतरे’ हैं, तो दूसरी ओर हिंदुओं के मानस में अंतर्निहित ‘सर्वधर्म समभाव’ (सेक्यूलरिज़्म) की भावना ही उनके लिए खतरा बनी हुई है। भारत में इस्लाम और ईसाइयत में धर्मांतरण विकराल रूप ले चुका है।

यद्यपि हिंदू संस्कृति का प्रकृत, पवित्र एवं परिष्कृत रूप दक्षिण भारत में ही है। ‘भक्ति द्राविड़ी उपजी’ को विस्मृत नहीं किया जा सकता। तथापि दक्षिण में केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश धर्मांतरण की चपेट में हैं। पूर्वोत्तर की स्थिति से हम परिचित हैं ही।

पहाड़ियों की पहाड़ियाँ धर्मांतरित कर दी जा चुकी हैं– येनकेनकप्रकारेण अर्थात् साम दाम दंड भेद की नीति का प्रयोग करते हुए। यह सबकुछ राज्याश्रय (लोकतांत्रिक) से ही संभव होता रहा है/हो रहा है। ‘हिंदू आतंकवाद’, ‘हिंदुत्व’ और ‘जातिवाद’ को चर्चा में बनाए रखकर इसके फलने-फूलने का माहौल बनाया जाता (रहा) है। दो-राय नहीं कि ‘हिंदुत्व’ को ‘सांप्रदायिक’ बताकर हिंदुओं को ‘कलंकित’ करने का सतत् प्रयास होता (रहा) है।

ऐसे देशकाल और वातावरण में इस अनुभवजन्य लेख का उद्देश्य है कि सभी अपनी जड़ों को जानें-तलाशें और सच का सामना तथा प्रतिरोध करना सीखें। ‘थोड़ा गंभीर होकर’ (शातिराना) अपने आसपास परिवेश को ध्यान से देखिए और समझिए कि क्या-कुछ बदला है और बदल रहा है?

हिंदी के ‘जनवादी’ पक्षधर कवि नागार्जुन (बैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’) की काव्य-पंक्तियाँ हैं, “क्या नहीं है/ इन घुच्ची आँखों में/ इन शातिर निगाहों में/ मुझे तो बहुत कुछ/ प्रतिफलित लग रहा है!/ नफ़रत की धधकती भट्टियाँ/ प्यार का अनूठा रसायन/ अपूर्व विक्षोभ।”

ऐसी तथाकथित ‘जनवादी’ रचनाओं से आतंकित होने और आशंकित रहने की आवश्यकता नहीं है। इन रचनाओं का देशकाल और वातावरण भारतीय ही है। बस, इन्हें देखने-खोजने की वांछित ‘दृष्टि’ की आवश्यकता है। ‘हिंदी वालों’ में अपनत्व (भारतीय) वाला और नया कुछ सोचने-खोजने की अपेक्षया लीक पीटने के आदी अधिक हैं।

लीक पर चलकर बाहर (विदेशी) का सबकुछ अच्छा लगता है और देशी अनगढ़, गँवार तथा भदेस। गोरांग स्त्रियों से लेकर आयातीत सिद्धांतों तक इनके विचार-विमर्श के मुद्दे अकारण ही नहीं बने (हैं)। अस्तु, हमें भारतीय रचनाकारों में अपने काम की ‘वस्तु’ (विषयवस्तु) देखने-खोजने की वृत्ति-प्रवृत्ति विकसित करने की आवश्यकता है।

इस दृष्टि से हिंदी में ‘नया दौर’ आरंभ हो सकता है। अमीर मीनाई का एक शेर प्रासंगिक है- “शौक़-ए-दीदार अगर है तो नज़र पैदा कर।” हिंदी के स्वनामधन्य आलोचकों ने अपने ‘इच्छित का आरोपण’ कर आलोचना में ऐसी ही धाराओं (छिन्नतार) का विकास किया है।

जो हो, देशहित में आलोचना का उद्देश्य यही होना चाहिए कि पाठकों में भारतीय दृष्टि से ‘इच्छित’ देखनेवाली नज़र पैदा हो सके। देखिए उस नज़र से और ध्यान दीजिए कि धर्मांतरणकारी तत्वों की ‘शातिर निगाहों में’ ‘नफ़रत की धधकती भट्टियाँ/ प्यार का अनूठा रसायन/ अपूर्व विक्षोभ’ सहज ही दिखाई दे जाएगा।

‘नफ़रत की धधकती भट्टियाँ’ और ‘अपूर्व विक्षोभ’ (ज़िहाद) से तो आप परिचित हैं। परंतु ‘प्यार का अनूठा रसायन’ के दो ज्वलंत उदाहरण (व्यक्तिगत) साझा करना प्रसंगोचित है। पहली घटना उन दिनों की है, जब हम हैदराबाद में (2006) सपरिवार निवास कर रहे थे। जिस भवन में हम निवास करते थे, वहीं पड़ोस में एक मुस्लिम परिवार रहता था।

धनी और व्यापारी परिवार था। पड़ोस में थे, तो उनका हमारे घर आना-जाना होता था। घनघोर संघर्ष के दिन थे और भयंकर विपन्नता थी। वह सहज ही दिख भी जाती थी। हम जैस-तैसे स्थितियों में सुधार का यत्न कर रहे थे। छोटा भाई अभी अविवाहित था और पढ़ ही रहा था।

उसे एक दिन उस परिवार के एक सदस्य ने प्रस्ताव दिया कि आप इस्लाम कुबूल लीजिए। आपके जीवन की सारी कठिनाइयाँ दूर हो जाएँगी। आपको इसी जीवन में जन्नत की हूरों का सुख भोगने को मिलेगा। पहली बार समझ आया कि संस्कारों का कितना महत्व है। अन्यथा प्रायः धन-लोभ और स्त्री-मोह में लोग फिसल जाते हैं।

दूसरी घटना तमिलनाडु में घटी। 2011 में तमिलनाडु में नियुक्ति हुई। देशकाल और वातावरण (हवा-पानी) बदला, तो परिवार में सबका स्वास्थ्य गड़बड़ा गया। विशेष रूप से, बड़े पुत्र को स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ (पोलन एलर्जी) होने लगी थीं। ऐसी परिस्थितियों में एक परिवार के ‘कुछ लोग’ मित्रवत ‘प्यार का अनूठा रसायन’ के साथ घर आने-जाने लगे।

सामाजिक होने के अनेक लाभ हैं, तो हानि भी है। मेल-मिलाप बढ़ा, तो उन्होंने एक दिन अचानक स्वास्थ्य लाभ के लिए विशेष ‘प्रार्थना’ करने की बात की। हमारा परिवार चाल-चलन समझ रहा था। इस ‘आत्मीय भाव’ वाले ‘पैटर्न’ से परिचित था ही।

अतः उनकी ‘इच्छित प्रार्थना’ नहीं हो पाई और उस दिन से ‘प्यार का अनूठा रसायन’ परोसनेवाले आत्मीयों का प्रवेश निषिद्ध हो गया। ऐसे अनगिनत पैटर्न हैं, जो आपको ‘भावात्मक’ रूप में दुर्बल और विवश बनाते हैं। बहुतांशतः आपका ‘हिंदू मन’, जो कि स्वभावतया ‘सेक्यूलर’ है, सोचता है कि अरे! ईसा, अल्लाह और हमारे आराध्य में भला क्या अंतर है? केवल उपासना पद्धतियों में भिन्नता है।

इसी क्रम में अंततः आप उस ‘प्यार का अनूठा रसायन’ प्राषण करते-करते ‘हिन्दू पीड़ा से मुक्ति’ पाते हैं और जीवन में ‘अमरत्व’ को प्राप्त कर लेते हैं। आप समझ रहे होंगे कि अपने इर्द-गिर्द के परिवेश को ‘थोड़ा गंभीर होकर’ ध्यान से देखने-सोचने-समझने की आवश्यकता क्यों है?

जो लोग प्रायः वाद-विवाद करते हैं कि जाति-प्रथा (वर्ण व्यवस्था) धर्मांतरण के लिए कारणीभूत है। उनसे समय-समय पर निवेदन किया जाना चाहिए कि अपने इर्द-गिर्द के परिवेश को ‘थोड़ा गंभीर होकर’ ध्यान से देखिए और मूल्यांकन कीजिए कि धर्मांतरित होकर अमरत्व को प्राप्त करने वालों की स्थिति-परिस्थिति में क्या-कुछ बदल गया है?

क्या उनकी समाजार्थिक स्थिति-परिस्थिति में आमूलचूल परिवर्तन हुआ है? यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि धर्मांतरण का मूल आधार और मानसिकता अवसरवादिता है। जीवन में बिना परिश्रम और सबकुछ सहज प्राप्त करने के तीव्र आकांक्षी लोगों की फ़ितरत ‘धर्मांतरण’ है।

यदि पिछड़ी जाति का कोई व्यक्ति ईसाई बनता है, तो क्या उसका विवाह धनी संपन्न ईसाई परिवार में संभव हो पाता है? क्या ईसाइयों में ऊँच-नीच की भावना नहीं है? कहना न होगा कि जाति अथवा अमीरी-ग़रीबी वहाँ भी उपस्थित है ही। धर्मांतरण की प्रक्रिया में लिप्त एजेंट प्रायः हिंदुओं की मानसिक दुर्बलता को निशाना बनाते हैं।

इस कार्य में उनके पास विदेशों से प्राप्त अकूत एवं अनियंत्रित निधियाँ हैं। तिस पर जन्नत से बेहतरीन हूरें हैं। जिसका जैसा मोह (कमज़ोरी), वैसा ही प्रस्ताव और प्राप्य। अस्तु, सजग रह कर ही इस गंभीर समस्या का सामना (समाधान) किया जा सकता है।

प्रत्येक काम मोदी शासित भाजपा सरकार करेगी, यह धारणा अवांछित और निंदनीय है। उक्त कविता में प्रयुक्त ‘शातिर निगाहों’ का समाधान सजगता ही हो सकती है। उनके ‘प्यार का अनूठा रसायन’ ‘अपूर्व विक्षोभ’ से बना (भरा) हुआ है।

उक्त शेर में ‘दीदार’ की ‘नज़र पैदा करने’ पर अकारण ही बल नहीं दिया गया है। जब जागो, तभी सबेरा! हिंदी कवयित्री महादेवी वर्मा की कविता है– ‘जाग तुझको दूर जाना’। गुरु! ‘विश्वगुरु’ बनने से पूर्व जागना-जानना-समझना अत्यावश्यक है। उत्तर विरोध नहीं, प्रतिरोधी संस्कृति है।

यह लेख पहले ‘स्वदेश’ के 7 जनवरी 2022 संस्करण में प्रकाशित हो चुका है।