संस्कृति
महिरावण के बाद उसके पुत्र अहिरावण का भी वध कर डाला हनुमान ने (अकाल बोधन- 4)

हम कथा के उस भाग (पिछला भाग यहाँ पढ़ें) की ओर चलते हैं जब महामाया हनुमान को महिरावण की मृत्यु का भेद बता रहीं थीं। महिरावण की मृत्यु के भेद का ज्ञान देते हुए महादेवी कहती हैं, “सर्वप्रथम महिरावण बलिवेदी पर श्रीराम को मेरे चरण वंदन की आज्ञा देगा।

उस समय श्रीराम यह प्रस्ताव रखें कि चूँकि वह राज-पुत्र हैं तथा उन्हें चरण-वंदन की विधि ज्ञात नहीं, अतः महिरावण स्वयं महादेवी महामाया का चरण वंदन कर यह विधि बताए। इस प्रकार जब वह दंभी तथा महापापी राक्षस मेरे चरण वंदन हेतु साष्टांग भूमिष्ट हो, उसी समय, हे हनुमान, इस खड्ग से तुम उस दंभी का मस्तक विच्छेद कर डालना।”

पूर्ण घटनाक्रम इसी भाँति घटित होता है। श्रीराम-लक्ष्मण प्रणाम करने में असमर्थता प्रकट करते हैं। महिरावण जैसे ही महादेवी के सम्मुख दंडवत होता है, देवीप्रतिमा के पृष्ठ भाग में मक्षिका रूप में छिपे हनुमान वास्तविक रूप में प्रकट हो जाते हैं। महादेवी के हाथ से खड्ग लेकर हनुमान प्रथम वार में ही महिरावण को दो भागों में विभाजित कर उसका वध कर डालते हैं।

महिरावण का वध देख प्रतिमा-रूपिणी देवी महामाया के अट्टहास से सभी अनुचर भयभीत हो भाग खड़े होते हैं। प्रतापी हनुमान का बल देखकर आकाश से सभी देवता प्रशंसापूर्वक पुष्पवर्ष करते हैं। हनुमान श्रीराम-लक्ष्मण को बंधनों से मुक्त करते हैं तो दोनों भ्राता हनुमान को अपने हृदय से लगा लेते हैं।

कथा यहीं समाप्त नहीं होती। कथानुसार उस समय महिरावण की स्त्री गर्भवती थी। जब उसे हनुमान द्वारा अपने स्वामी की मृत्यु के बारे में ज्ञात होता है, तो वह हनुमान को युद्ध हेतु चुनौती देती है। महिरावण की स्त्री भी एक शक्तिशाली तथा युद्ध प्रवीण योद्धा थी। युद्ध भीषण रूप धारण कर लेता है।

युद्धावधि में ही महिरावण की स्त्री को प्रसव पीड़ा होती है तथा वह एक अत्यंत भयंकर पुत्र को जन्म देती है। उस विचित्र तथा प्रचंड बालक के चार मुंड तथा आठ भुजाएँ थीं। वह अद्भुत विक्रमशाली पुत्र भूमिष्ठ हो, व्याकुल रक्तिम चक्षु लिए, हनुमान के साथ युद्धरत हो जाता है। गर्भ क्लेद रक्त से मलिन उसका नग्न शरीर एक उन्मुक्त, उन्मादी तथा विक्षिप्त के समान सिंहनाद कर उठता है।

महिरावण पुत्र अहिरावण द्वारा हनुमान के वक्ष स्थल पर अतिरेक आघात किए जाते हैं किंतु हनुमान इस चेष्टा को एक अबोध बालक का परिहास समझ क्षमा कर देते हैं। हनुमान द्वारा क्षमादान पश्चात् भी जब अहिरावण द्वारा निरंतर प्रहारों की गति में विराम नहीं लगता तब हनुमान द्रुतवेग से उसे बंदी बनाने की चेष्टा करते हैं।

गर्भ क्लेद रक्तयुक्त होने के कारण वह बालक हनुमान की जकड़ में नहीं आ पाता। हनुमान अपने पिता वायुदेव का स्मरण कर उस बालक को शुष्क अवस्था में लाने की याचना करते हैं। पवनदेव के आशीर्वाद स्वरूप रणस्थल में भयावह आंधी का प्रकोप आता है तथा वह बालक धूल द्वारा आच्छादित होने लगता है।

उस बालक को बंदी बनाने में अब हनुमान को किंचित मात्र भी समय नहीं लगता तथा महिरावण पुत्र अहिरावण को वह एक शिला पर पछाड़ उसकी अस्थियों को चूर्ण में परिवर्तित कर देते हैं। हनुमान की कल्याण कामना का आशीर्वाद प्रदान करते हुए आकाश से देवगणों, ऋषि, मुनियों द्वारा पुनः पुष्पवर्षा होती है।

पाताल-लोक से प्रस्थान के समय, श्रीराम मकरध्वज को प्रासाद के प्रवेश द्वार पर बंधे हुए देखते हैं तथा उसके संदर्भ में जिज्ञासा प्रकट करते हैं। हनुमान श्रीराम को अपने पुत्र पराक्रमी मकरध्वज (वह भाग यहाँ पढ़ें) का परिचय देते हैं।

यह विदित होने पर कि मकरध्वज पवनपुत्र के पुत्र हैं, श्रीराम उसे मुक्त कर पाताल-लोक का राजा बनाने की आज्ञा देते हैं। तत्पश्चात् श्रीराम- लक्ष्मण एवं हनुमान सीता माता की मुक्ति हेतु रावण से युद्ध के लिए प्रस्थान करते हैं।

मनीष श्रीवास्तव  इंडिका टुडे जैसे कई मंचों से जुड़े लेखक हैं। वे @shrimaan के माध्यम से ट्वीट करते हैं।