विचार
ज्ञानवापी मामला मुसलमानों के लिए अपनी उदारता दिखाने का सुअवसर

‘भारतीय संस्कार’ अर्थात् ‘सर्वधर्म समभाव’। इसे विपरीत क्रम में लिखने पर भी अर्थाभाव नहीं हो सकेगा और उसकी दार्शनिक सादृश्यता अपने मूल भाव का यथावत वहन करती रहेगी। यथा – ‘सर्वधर्म समभाव’ अर्थात् ‘भारतीय संस्कार’ अथवा ‘भारतीय संस्कार’ अर्थात् ‘सर्वधर्म समभाव’।

युगों पूर्व उत्पन्न तथा युगानुयुगों में विकसित इस भारतीय भावना (संस्कार) के बरक्स आधुनिक बुद्धिवादियों ने ‘सेक्युलरिज़्म’ को वैकल्पिक एवं स्वकल्पित भाव के रूप में प्रस्तावित एवं अतिप्रचारित किया। यह सर्वविदित है कि यह समभाव वाला संस्कार, जिसे भाव एवं भावना भी कहा जा सकता है, विश्व में अन्यत्र कहीं भी इस रूप एवं अर्थ में दृष्टिगोचर नहीं होती। यह भारतीय मूल का मूलभूत एवं सर्व युगों में पल्लवित तथा अंगीकृत ‘संस्कार’ है।

यद्यपि वर्तमान समय में इसे ‘भारतीय संस्कार’ कहना अत्यंत जोखिम भरा काम है। क्योंकि ‘नागरिकता’ की दृष्टि से मुसलमान और ईसाई भी ‘भारतीय’ हैं ही। यह बात और है कि उनका दिल मुल्क (भारत) के लिए कम, मजहब (रीलिजन) के लिए ज़्यादा धड़कता है।

परिणामतः प्रसंग-अप्रसंग मजहबी उन्माद तथा रीलिजनिस्टिक कन्वर्ज़न मिशन में ‘सर्वधर्म समभाव’ की भारतीय भावना छिन्न-भिन्न हो जाती है और उनके चरित्र-व्यक्तित्व से ‘समभाव’ का सर्वतः लोप हो जाता है। इसे ‘हिंदू संस्कार’ कहना समीचीन प्रतीत होता है, जो कि वास्तव में ‘हिंदू संस्कार’ ही है, परंतु ‘हिंदू’ संज्ञा प्रयोग से बहुतों के मन-मस्तिष्क में हिकारत की भावना उत्पन्न होती है और आँखों में ही नहीं, अपितु बातों में भी ज्वालामुखी धधकने लगता है। अतः ‘हिंदू’ संज्ञा को इस लेख में वर्जित ही समझा जाना समीचीन है।

अब जब ‘भारतीय संस्कार’ कहा ही गया है और अनेकानेक अवसरों पर सनातन धर्म के ध्वज धारक एवं वाहक ‘डीएनए एक है’ की बात करते अथवा समय-असमय उठाते रहे हैं, तो यह मानने की जोखिम उठाई जा सकती है कि मुसलमान भी इस ‘भारतीय संस्कार’ (समभाव) को युगानुबोध के साथ (नये सिरे से) आत्मसात कर नव भारत की सर्जना का प्रयास करेंगे।

थोड़ी-बहुत उदारता, प्रगतिशीलता और आधुनिक बुद्धिवादियों द्वारा कल्पित तथा अतिप्रचारित सेक्युलरिज्म का ही सही, परिचय अवश्य देंगे। क्योंकि मुल्क बचा रहेगा और विकास करेगा, तो सबका जीवन मंगलकारी बना रहेगा, अन्यथा मजहब के नाम पर बने मुल्क (पाकिस्तान) की आम अवाम की हालत, हालात एवं बददुआओं का स्मरण करना प्रासंगिक हो सकता है।

स्मरणीय है कि अब तक केवल सनातनियों (हिंदू) से ही उपरोक्त ‘भारतीय संस्कार’ के अनुसरण का आग्रह होता रहा है। अब जब सभी भारतीयों का ‘डीएनए एक’ ही बतलाया जा रहा है, तो सबसे इस संस्कार के अनुसरण की अपेक्षा करना अनुचित नहीं हो सकता।

यह शतशः सच है कि सनातनियों को यह संस्कार माँ की कोख से ही प्राप्त होता है। अतः जन्म से मरण तक वे इसी भाव का हर भूमि में संवहन करते दिखाई देते हैं। बहुतांश इसी भावधारा के कारण ही भारत भूमि के टुकड़े-टुकड़े होने की स्थिति में भी उदारवादी तथा कल्पनातीत रूप में सर्वसमावेशी बनने का उपक्रम करते रहे हैं।

यह अकारण नहीं कि शिरडी के साईंबाबा को मुसलमान मानने-समझने के बावजूद उनके प्रति सनातनियों की अगाध श्रद्धा सहज ही देखी जा सकती है। नानाविध दरगाहों पर मत्था टेकने वाले सनातनियों का जत्था भी संदर्भोचित उल्लेखनीय है। वास्तव में, यही ‘भारतीय संस्कार’ है।

ऐसे भारतीय संस्कारों का अनुधावन करते हुए तथा देशांतर्गत लोकजागृति व युगबोध की दृष्टि से मुसलमानों को अपनी वैचारिक पृष्ठभूमि (मजहबी) में संशोधन कर ‘भारतीयता’ के भाव एवं संस्कारों का अर्थपूर्ण अंगीकार करना चाहिए।

गुरु नानक देव जी ने उचित ही कहा है, ‘नानक उतमु नीचु न कोइ।’ कोई भी व्यक्ति जन्म से महान या नीच नहीं होता, अपितु अपने कर्मों से होता है। वर्तमान घटनाक्रमों को दृष्टिगत रखते हुए भारतीय मुसलमानों को अपने औदात्यपूर्ण विचार एवं समभाव रूपी कर्मों का परिचय देना चाहिए।

अनेकानेक अवसरों पर इस्लाम के संबंध में अत्यंत उदारवादी बातें सुनने को मिलती हैं। प्रायः सुनने को मिलता है कि “दीन-ए-इस्लाम ने मोहब्बत का पैग़ाम दिया है। दीन-ए-इस्लाम सबको जोड़ता है। सबका भला चाहता है। मुसलमान अमन का पैरोकार है। वह सारी दुनिया में अमन-चैन चाहता है।“

ऐसे में, जब ज्ञानवापी का मामला विवाद एवं चर्चा के केंद्र में आ चुका है, मुसलमानों को ‘दीन-ए-इस्लाम की उदारता एवं औदात्य’ का परिचय देते हुए सौहार्द की भावना का विकास एवं विस्तार करना चाहिए। इसे अन्यार्थ बोध में भी देखा-समझा जा सकता है। ‘अतिक्रमित मुल्क’ में प्रसारित अतिरंजित विचारों के लिए संभवतः अब कोई स्थान शेष नहीं रह गया है।

इधर, ‘डीएनए एक है‘ के बोलबाला के साथ-साथ भारतीय संस्कार के संवाहक प्रायः यह भी उद्धृत करने लगे हैं कि ‘समभाव’ अच्छी बात है। नितांत आवश्यक भी परंतु, अतिक्रमित विचार एवं प्रहारों का पुरजोर प्रतिरोध भी आवश्यक है; अन्यथा अहोम राजा पृथु, हेमू विक्रमादित्य, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी जैसे योद्धाओं की कदापि आवश्यकता न पड़ती।

यह भी कि भारतीय मुसलमानों को दारा शिकोह के मार्ग का अंगीकार कर भारतीय दृष्टि से सत्यान्वेषी बनने का उत्कट उपक्रम करना चाहिए, न कि औरंगजेब के दमनकारी तथा जिहादी मनसूबों का निर्वाहक बनना चाहिए। भारतीयों को दारा शिकोह स्वीकार है, औरंगजेब जैसा अविचारी एवं आततायी कदापि नहीं।

ऐसे समय में, भारत के अधिकाधिक भूभाग में विनम्रता के संवाहक तथा समभावी संस्कारों के बावजूद सनातनियों में महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी महाराज इत्यादि के संस्कार जाग्रत हो चुके हैं, मुसलमानों को सौहार्द स्थापना की दृष्टि से शर्त रहित पहल करनी चाहिए।

यद्यपि बहुतेरे आधुनिक बुद्धिवादी कह रहे हैं कि संघ-समर्थित भाजपा ने देश के वातावरण में हिंदू-मुसलमान का विष घोल दिया है, तथापि इस सत्य को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि यह संघ-भाजपा ही है, जो ‘डीएनए एक है’ और ‘सबका साथ, विकास और विश्वास’ की रट लगाए हुए है।

अतः यह विष वमन की चर्चा अप्रासंगिक है। संघ-भाजपा सही अर्थों में संविधान की भावना का संपोषण करने का कार्य कर रहे हैं। इससे विपरीत कोई तो बात है कि सनातनियों में अपनी धर्म ध्वज रक्षा की भावना का प्रस्फुटन हुआ है। इस पर भारतीय मुसलमानों को अन्वेषण तथा मंथन करना चाहिए।

युगानुबोध एवं हिंदू लोकजागृति की दृष्टि से यह कहना अत्युक्तिपूर्ण न होगा कि जब एक भाई हरसंभव क्षण में लड़ने को उद्यत हो जाए, तो दूसरे को सतत ‘शांति बहाली’ का प्रयास करना चाहिए। मुसलमानों को अब शांति बहाली के अग्रदूत बनने का सतत उपक्रम करना चाहिए। इससे ‘भारतीय संस्कार’ अत्यधिक दृढ़ होगा।

ज्ञानवापी पर जारी हो-हल्ले के बीच मुसलमानों को उदार हृदय से यह कहने में कोई हिचक और हानि नहीं कि बाबरी दे दी, तो ज्ञानवापी, ताजमहल, शाही मस्जिद ईदगाह वगैरह क्या चीज़ है? भारतीय भाईचारा बने रहना चाहिए। कौमी एकता बनी रहनी चाहिए। कुछेक मुसलमानों ने कहा भी कि “हम हिंदू-मुस्लिम भाई साथ-साथ हुक्का पीते थे। अब इक्का-दुक्का भी एकसाथ नहीं दिखते।”

ऐसा कहते हुए उन्हें यह कहने में भी आनाकानी नहीं करनी चाहिए कि “बिना किसी ज़िद और जिरह के भाइयों की भावनाओं का सम्मान करते हुए सबकुछ लौटाने को तैयार हैं। कौन-सा इस्लाम भारत में पैदा हुआ था? जाहिलों ने जो किया, वह नहीं करना चाहिए था।”

इस बात का प्रमाण देने का यह सुअवसर है कि मुसलमान विनम्र एवं उदार होते हैं। राष्ट्रभक्ति, भाईचारा और उदारता भी कोई बात होती है। ऐसे लोकोपकारी-राष्ट्रोपकारी विचारों से अखिल विश्व में भारतीय मुसलमान अपनी एक अलग प्रतिष्ठा स्थापित कर पाएँगे। इससे उनका सच्चे अर्थों में ‘भारतीय’ होना भी सुनिश्चित हो सकेगा, सो अलग। माने दोहरा लाभ। मुसलमानों के पास इतिहास रचने का सुअवसर है।

यह लेख पहले मध्य स्वदेश में ‘ज्ञानवापी- जिद और जिरह से बहुत आगे…’ शीर्षक से प्रकाशित हो चुका है। लेखक की अनुमति से यहाँ पुनः प्रकाशित किया गया है।

डॉ आनंद पाटील वरिष्ठ युवा आलोचक और तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं। वे @AnandPatilCU के माध्यम से ट्वीट और कू करते हैं।