राजनीति
द प्रिंट का ज्ञानवापी पर लेख छद्मरूप इतिहास का प्रचार और कुतर्कों का भंडार

वाराणसी के ज्ञानवापी परिसर में हुए सर्वेक्षण में शिवलिंग मिलने के बाद ज्ञानवापी का इतिहास, उसके पीछे की राजनीति और न्यायिकता पर भाष्य करते हुए पिछले कुछ दिनों में कई लेख लिखे गए हैं। मुख्यधारा के बीबीसी जैसे भारतद्वेषी वार्तापत्र औरंगज़ेब को बहुआयामी व्यक्ति सिद्ध करने में मग्न हैं।

द प्रिंट नमक एक भारतीय वेबसाइट द्वारा भी पिछले दिनों इस मुद्दे पर एक लेख प्रकाशित किया गया। द प्रिंट के संपादक के द्वारा लिखे गए लेख का वीडियो रूप भी द प्रिंट के यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध है। मंदिरों के विध्वंस की सच्चाई को मानते हुए आगे बढ़ने के बात इस लेख में की गई है।

लेख शुरुआत में ही कुछ प्रश्न उठाता है- “1947 से आज तक के सारे प्रधानमंत्रियों के देश के प्रति भाषण लाल किले के प्राचीर से क्यों हुए? क्या लाल किला एक राष्ट्रीय स्मारक है? या हमें उसे मुस्लिम स्मारक कहना चाहिए, क्योंकि उसे एक मुस्लिम शासक ने बनाया था?”

द प्रिंट के लेख के अनुसार, 1638 में बने लाल किले पर पहला आक्रमण 1739 में नादिरशाह द्वारा हुआ। ईरान के राजा नादिरशाह ने अपने इस आक्रमण के दौरान दिल्ली एवं लाल किले को पूरी तरह लूटकर, भारी मात्रा में तहस-नहस किया।

इस आधार पर लेख यह प्रश्न उठाता है, “लाल किला कोई हिंदू किला नहीं था, ना ही उसमें कोई मंदिर था। फिर भी नादिरशाह, जो एक मुस्लिम था, ने किले को क्यों तोड़ा?” इस प्रश्न का उत्तर देते हुए द प्रिंट बताता है कि “चूँकि नादिरशाह एक मध्यकालीन शासक था, उसने उस समय के लूटेरों का तरीका ही अपनाया”।

द प्रिंट के अनुसार, लाल किले पर नादिरशाह के बाद का आक्रमण 44 वर्षों बाद सिखों द्वारा हुआ। लेख यह दावा करता है कि इस दौरान ना किसी हिंदू ने और ना ही किसी मुस्लिम आक्रांता ने लाल किले पर आक्रमण किया। लाल किले पर निशान साहिब फहराने के बाद मुग़ल बादशाह को दिल्ली शहर में सात गुरुद्वारा बांधने के लिए बाध्य किया गया।

इस घटना का आधार लेते हुए लेख यह दावा करता है कि “मध्यकालीन आक्रमणों में धर्म एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा था।” इस प्रकार, मध्ययुगीन क्रूरता व धार्मिकता को मिलाते हुए, विध्वंस को सामान्य बताकर, द प्रिंट का लेख लाल किले के खंडन की तुलना मंदिरों को गिराने से करता है।

किंतु क्या यह तुलना उचित है? आक्रांताओं की दृष्टी से मंदिर और किले एक सामान थे या भिन्न? क्या हिंदुओं ने कभी लाल किले पर आक्रमण नहीं किया? हिंदू मंदिरों को तोड़ने के पीछे कौन-से राजनितिक कारण थे? क्या हमें मुस्लिम शासकों द्वारा बनाये गये हर स्थापत्य को अस्वीकार करना चाहिए?

प्रथमतः, द प्रिंट के लेखक व संपादक को इतिहास का पुनराध्ययन करने की आवश्यकता है। उनके द्वारा इस लेख में लिखी गई ऐतिहासिक घटनाएँ असत्य तो हैं ही, उनके पीछे के कारण भी अतार्किक हैं। असंतुलित और अपूर्ण इतिहास पढ़ने वाले लोग, और उनकी ऐतिहासिक पात्रों को तुच्छ व स्वयं को सुसंस्कृत समझने वाली विचारधारा के मिलाप से ही ऐसे निराधार तर्क निकलकर आते हैं।

ख़ैर, जब पिछले 75 वर्षों में हमारी इतिहास की पाठ्यपुस्तकों द्वारा असत्य और अपप्रचार ही किया गया है, तब लोगों से योग्य इतिहास जानने की अपेक्षा रखना कठोरता होगी। औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद लाल किले पर सर्वप्रथम आक्रमण 1719 में पेशवा बालाजी विश्वनाथ के नेतृत्व में मराठाओं द्वारा किया गया।

30,000 मराठा सैनिकों की सहायता से उस समय के ‘सम्राट’ फ़र्रुख़सियार को पदच्युत एवं दंडित किया गया। नादिरशाह के आक्रमण से केवल दो साल पहले, 1737 में, वीर पेशवा बाजीराव ने दिल्ली पर आक्रमण कर मुग़ल शासक ‘रंगीला’ से अपनी सारी शर्तें मनवाई।

अगले कई वर्षों तक, बादशाह केवल नाम के लिए ही बचा व दिल्ली की सत्ता वस्तुतः मराठाओं के हाथ में रही। इसी वजह से 1758 में मराठाओं ने अहमदशाह अब्दाली का अटक तक पीछा किया था। दिल्ली को आक्रांताओं से बचाने वाली इस मुहीम का नेतृत्व बाजीराव के कनिष्ठ पुत्र रघुनाथराव कर रहे थे।

मराठा साम्राज्य उस वक़्त दिल्ली और लाल किले के उत्तर में कोसों दूर पेशावर तक पहुँच गया था। केवल तीन साल बाद, पानीपत पहुँचने के पहले मराठाओं ने पुनः लाल किले पर आक्रमण करके भगवा फहराया था। पेशवा बाजीराव के भतीजे सदाशिवराव द्वारा किए गए इस आक्रमण ने लाल किले को एक गढ़ी में परिवर्तित कर दिया था।

पानीपत के तीसरे और दुर्भाग्यपूर्ण युद्ध के कुछ वर्षों बाद ही दिल्ली एक बार फिर मराठाओं के नियंत्रण में थी। 1803 में अंग्रेजों के लाल किला जीतने से पूर्व 17 वर्ष मराठा साम्राज्य का ध्वज लाल किले की प्राचीर पर लहरा रहा था। ये सभी घटनाएँ इतिहास के दस्तावेज़ों में स्पष्ट रूप से प्रलेखित है, परंतु हमारे पाठ्यक्रम में इनका उल्लेख तक नहीं मिलता।

आश्चर्यजनक बात यह है कि ‘बाजीराव-मस्तानी’ और ‘पानीपत’ जैसे बॉलीवुड के चित्रपटों द्वारा भी उपरोक्त सही इतिहास दिखाने का प्रयास हुआ। हालाँकि, भारत के इतिहास को यूरोपीय नज़रों से पढ़ने वाले स्वघोषित प्रगतिशील जनों को शिक्षित करने के लिए चित्रपट का माध्यम भी असमर्थ है।

ख़ैर, उपरोक्त ऐतिहासिक तथ्यों द्वारा यह सत्य स्थापित होता है कि दिल्ली और लाल किले पर न केवल नादिर शाह ने बल्कि मराठा जैसे कई ग़ैर-मुस्लिम राज्यों ने आक्रमण किया। इस तथ्य को मानने के बाद कुछ प्रश्न उत्पन्न होते हैं जो पूछे जाने चाहिए-

“इतने मराठा आक्रमणों के बावजूद भी दिल्ली की जामा मस्ज़िद अपने मूल रूप में कैसे रह पाई?”
“क्या 18वीं सदी में कहीं मूल मस्जिद तोड़कर उनपर मंदिर बनाए गए?”
“दिल्ली के मशहूर हज़रत निज़ामुद्दीन दरगाह पर मराठाओं द्वारा कितनी बार आक्रमण हुआ?”

इन सभी प्रश्नों के उत्तर भारतीय व बाहरी विचारधारा के बीच का मूलभूत अंतर दर्शाते हैं। अपने स्वराज्य के लिए लड़ते समय भारतीय शासकों ने कभी शत्रु की धार्मिक भावनाओं को ठेस नहीं पहुँचाया। जबकि दूसरी ओर मंदिर तोड़ने के पीछे एक ही उद्देश्य था- लाखों हिंदुओं के आत्मसम्मान व आत्मविश्वास को कुचलना।

मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा मंदिरों को गिराने के पीछे भी एक ही तर्क था- मूर्तिपूजा (बूतपरस्ती) ग़ुनाह है और मूर्तिपूजक मृत्युदंड के पात्र (वाज़िब-उल-क़त्ल)। इसी कारण से सभी इमारतों में से केवल मंदिरों को चुनकर गिराया जाता था और मूर्तियों को भंग किया जाता था।

धर्म मानवीय जीवन का मूलभूत हिस्सा कल भी था और आज भी है। लेकिन, योजनाबद्ध तरीक़े से किसी के प्रार्थनास्थलों को गिराना और उपलब्ध भूमि पर अपने प्रार्थनास्थलों को बनाना, ये दोनों पूर्णतः विपरीत कृतियाँ है। इन दोनों कृतियों को धार्मिकता कहकर एक ही आवरण में ढकना मूर्खतापूर्ण एवं पक्षपाती होगा।

ग़ैर-इस्लामी शासकों के निर्माण कार्य को धार्मिकता कहना और इस्लामी शासकों द्वारा किए गए धार्मिक स्थलों के मजहबी विध्वंस को ‘मध्ययुगीन प्रथा’ कहना किसी पाखंड से कम नहीं। यह सोचने की आवश्यकता है कि लाल किले के परिसर में यदि (काल्पनिक रूप से) कोई मंदिर होता, तो क्या नादिरशाह उसे वैसे ही बख़्श देता जैसे उसने जामा मस्ज़िद को बख़्शा?

द प्रिंट का लेख अपनी सुविधा अनुसार मंदिरों जैसे धार्मिक भवनों के विध्वंस की तुलना किले जैसी राजकीय इमारत के विध्वंस से करता है। इसी के साथ लेख युद्धकालीन विनाश और राज्य की मतांध नीति द्वारा किए गए विध्वंस को भी एक ही पलड़े में रखकर तौलता है।

औरंगज़ेब ने काशी विश्वनाथ का मंदिर तोड़ने का आदेश कई वर्षों के मुग़ल शासन के बाद दिया था, ना कि किसी युद्ध या आक्रमण के दौरान। यदि तुलना करनी ही हो, तो इस्लामी आक्रमणों द्वारा किए गए मंदिर विध्वंस और हिंदू-सिख आक्रमणों में किए गए मस्ज़िद विध्वंस, की की जानी चाहिए।

औरंगज़ेब के काशी विश्वनाथ गिराने के आदेश की तुलना शिवाजी महाराज या राजा रणजीत सिंह या राजपूत राणाओं के मस्जिद गिराने के आदेश से की जानी चाहिए। बारंबार मंदिर तोड़ने की इस्लामी राज्यों की नीति की तुलना मस्जिद तोड़ने की गैर-इस्लामी राज्यों की नीति से की जानी चाहिए। पर क्या करें, तुर्कों-मुग़लों की घिनौने कार्य मराठा, सिख, राजपूत, जाट आदि राज्यों में ना होने के कारण, ये तुलनाएँ असंभव हो जाती हैं।

इसी वजह से इस्लामी शासकों द्वारा हिंदुओं पर किए गए अनन्वित अत्याचारों और मंदिरों के खंडन को उचित और सामान्य बताने के लिए द प्रिंट जैसी संस्थाओं द्वारा ऐसी अभद्र तुलनाएँ की जाती है। “21वीं सदी के अनुसार कोई भी मध्यकालीन शासक सही नहीं था, बस कुछ दूसरों से अधिक बुरे थे”, इस तरह के बेतुके बयान द प्रिंट का लेख अंत तक देता है।

ऐसे बयानों द्वारा धर्मांध, क्रूर, पशुवत औरंगज़ेब और न्यायी श्रीमान् योगी शिवाजी महाराज को एक ही जैसा बताने का दुष्कर्म किया जाता है। “दोनों पक्षों द्वारा सत्य को स्वीकार करने के बाद ही सुलह की ओर बढ़ा जा सकता है”, ऐसा कहकर समाप्त होने वाला द प्रिंट का लेख स्वयं ही सत्य से कोसों दूर है।

लेखक आईआईटी मुंबई में जनपद अभियांत्रिकी विभाग में पीएचडी छात्र हैं।