संस्कृति
गोकुल जाट की कहानी से पता चलता है कि जौहर सिर्फ राजपूत ही नहीं करते थे

मोहनदास करमचंद गांधी अपनी जीवनी में लिखते हैं कि आम हिंदुओं की शब्दों की समझ उतनी ही है, जितनी उनके सेवाश्रम की गायों की। इसका उदाहरण देखना है तो देखिए कि कश्मीर से पलायन किनका हुआ? लगभग 22 लाख से अधिक हिंदुओं को शरणार्थी बना दिया गया।

जब इसी को कश्मीरी “पंडितों” का पलायन कहते हैं तो 22-23 लाख की गिनती तुरंत घटकर 3 लाख पर पहुँच जाती है। ऊपर से जब आप सुनते हैं तो लगता है कि यह “हिंदुओं” का मुद्दा नहीं, हमें क्या लेना-देना? यह तो बस चंद “पंडितों” का मुद्दा है !

बिलकुल ऐसा ही होता है जब “जौहर” का उल्लेख करते समय संजय लीला भंसाली कहते हैं कि “राजपूतों” की भावना का पूरा ध्यान रखा है। क्या “जौहर” सिर्फ राजपूतों का मुद्दा था? क्या यह सिर्फ राजस्थान के कुछ क्षेत्रों भर की बात थी? बिल्कुल नहीं।

जौहर भारत के कई क्षेत्रों में इस्लामिक हमलों के कारण हुए थे। गौरतलब है कि हिंदू राजा भी एक-दूसरे से लड़े थे, मगर ऐसे मामलों में जौहर की घटनाएँ सुनाई नहीं देतीं। नमूने के तौर पर इतिहास में लिखित काफी बाद का, यानी औरंगज़ेब के समय का, मथुरा से आगरा के बीच के क्षेत्रों का जौहर देखिए।

अप्रैल 1669 में औरंगज़ेब ने दारुल-हरब यानि हिंदुस्तान को दारुल-इस्लाम बनाने के लिए फ़रमान जारी किया। जिन मंदिरों की वजह से बुतपरस्ती होती थी, उन्हें तोड़ा जाना था। इस आदेश पर क्षेत्र की हिंदू जनता भड़क उठी और विद्रोह हो गया।

जाट बहुल क्षेत्रों के इस विद्रोह में स्थानीय मीना, मेव, अहीर, गुज्जर, नरुका, पंवार सभी शामिल हो गए। मंदिरों को तोड़ने आई सेनाओं का सशस्त्र विरोध होने लगा। कट्टर मुस्लिम अब्दुन नबी खान मथुरा के इलाके का फौजदार था। वह विद्रोह को कुचल कर मंदिरों को तोड़ने आगे आया।

गोकुल जाट के नेतृत्व में हुई लड़ाई में शाहजहाँ के काल में बने शादाबाद के फौज़ी ठिकाने को जनता ने ध्वस्त कर दिया और 12 मई 1669 को हुई लड़ाई में गोकुल जाट और उसके साथियों ने किसानों के औजारों से ही मुग़ल सैनिकों को हराकर, अब्दुन नबी खान को मार गिराया।

जनता भड़की रही और लड़ाई जारी रही तो आगरा के ठिकानों से रदंदाज़ खान की कमान में भी “ज़िंदा पीर” औरंगज़ेब की फौज़ें मैदान में उतरीं। लगभग पाँच महीने चलती रही इस लड़ाई में सैन्य प्रशिक्षण और हथियारों से विहीन किसानों ने मंदिरों को टूटने से बचाने की लड़ाई जारी रखी।

कमज़ोर पड़ते गोकुल जाट की सेनाएँ जौहर के बाद पीछे हटती रहीं। आगरा के फौजदार अमानुल्ला को भी जंग में शामिल होने का हुक्म हुआ। लगभग सहस्र बंदूकची, सहस्र राकेट दागने वालों और पच्चीस तोपों के साथ अमानुल्ला हसन अली की मदद करता आगे आया।

तीर-गुलेलों से तीन दिन तक गोकुल जाट और उसके साथियों ने मुकाबला जारी रखा। काफिरों-बुतपरस्तों के इस विद्रोह को कुचलने 28 नवंबर 1669 को “ज़िदा पीर” ने खुद दिल्ली से कूच किया। चौथे दिन की लड़ाई में तिलपत के किले की दीवारें टूटी। सम्मुख युद्ध में करीब 4,000 मुग़ल और 5,000 किसान मारे गए।

करीब 7,000 विद्रोही कैद कर लिए गए। शैख़ राज़ी-उद्दीन पेशकार बने और उन्होंने बादशाह के सामने गोकुल जाट और उदय सिंह को पेश किया। सज़ा तो पहले से ही तय थी। इस्लाम कबूलो या मौत। गोकुल जाट को टुकड़े टुकड़े कर देने का हुक्म हुआ।

जल्लाद वार उनकी बाँह पर हुआ, कटी बाँह को फड़फड़ाते देखते गोकुल जाट निर्विकार खड़े रहे। बुरी तरह तड़पाकर मारने का हुक्म था तो जल्लाद को कोई जल्दी नहीं थी। घटना जिन्होंने देखी उनमें से कई भयभीत भाग खड़े हुए।

गोकुल जाट के बाद उदय सिंह के भी टुकड़े कर दिए गए। पकड़े गए करीब 7,000 किसान काट दिए गए। मथुरा के जिस कृष्ण जन्मस्थान मंदिर को शायद आपने देखा होगा उसे ही टूटने से बचाते हुए ये जौहर हुआ और हज़ारों किसान मारे गए।

गोकुल जाट का नाम शायद ओला था, वृंदावन-मथुरा के मंदिरों को बचाते उनका नाम गोकुल हो गया। ऐसा हुआ भी था क्या जैसे सवाल अगर मन में उमड़ते हों तो आप 2002 में आई, ब्लू ब्लड सेक्युलर इतिहासकार इरफान हबीब की पुस्तक एसेज इन इंडियन हिस्ट्री: टुवर्ड्स ए मार्क्सिस्ट परसेप्शन में गोकुल जाट (या वामपंथी तोड़-मरोड़ के साथ गोकुल सिंह) ढूंढ सकते हैं।

सिर्फ “राजपूत” बोलकर जौहर के नाम पर बरगलाते धूर्त फिल्मकारों को याद रखना चाहिए कि ये सिर्फ एक के सम्मान की नहीं, पूरे भारत के विरोध की कहानी है। कभी गोकुल जाट की हत्या की जगह पर, आगरा कोतवाली के आस पास, एक मूर्ती लगवाने की बात के लिए भी खुद को राष्ट्रवादी बताने वाले किसी राजनैतिक या उसके गैर-राजनैतिक संगठनों ने गोकुल जाट का नाम लिया हो ऐसा याद नहीं आता। हाँ मगर इतना तो ज़रूर है कि आम हिंदुओं को मथुरा की बात करते समय गोकुल जाट का नाम भी याद आना चाहिए।