अर्थव्यवस्था
फिनटेक के ऋण देने वाले व्यापार को आँकड़ों से समझें
ऋतु भंडारी - 29th September 2021

2 सितंबर को आरबीआई संरचना के अंतर्गत खाता संकलक (अकाउंट एग्रेगेटर) प्रणाली के शुरू हो जाने के बाद से अपेक्षा है कि भारत में ऋण प्राप्ति को प्रोत्साहन मिलेगा। भारत में 1,200 से अधिक डिजिटल रूप से ऋण देने वाले स्टार्ट-अप हैं।

साथ ही अधिकांश डिजिटल भुगतान फिनटेक (वित्तीय तकनीक कंपनियाँ) विस्तार करके ऑनलाइन ऋण देने के क्षेत्र में प्रवेश कर रही हैं क्योंकि इसे लाभप्रद माना जाता है।

ग्राहकों और व्यापारियों में बड़े स्तर तक पहुँच बनाने के लिए गूगल पे, फोन पे, अमेज़ॉन पे, वॉट्सैप पे, आदि जैसे यूपीआई में थर्ड पार्टी ऐप्लिकेशन प्रोवाइडर (टीपीएपी) और पेटीएम पेमेन्ट्स बैंक मार्केटिंग एवं प्रचार पर आक्रामक रूप से खर्च कर रहे हैं।

प्रचार के लिए ऑफर, भारी कैशबैक, छूट, प्रसिद्ध व्यक्तियों द्वारा प्रचार और बड़े आयोजनों में प्रायोजक बनने के लिए वे खर्च करते आ रहे हैं। इससे भले ही यूपीआई लेन-देन एवं ग्राहक आधार में घातीय वृद्धि हुई है, परंतु कंपनियों को भारी नुकसान भी झेलना पड़ा है।

नवीनतम यूपीआई भूगतान आँकड़े

यूपीआई पर एमडीआर की छूट से भी राजस्व मॉडल प्रभावित हुआ है। इतना विस्तार करने के पीछे विचार यह है कि आने वाले समय में डाटा का मुद्रीकरण किया जा सके, जैसे वित्तीय सेवाओं, विशेषकर ऋण देना, को बेचकर।

एक ओर जहाँ डाटा सुरक्षा विधेयक विचार के अंतिम चरण पर है, वहीं बिगटेक, फिनटेक एवं डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में अन्य खिलाड़ियों पर डाटा मुद्रीकरण को लेकर खतरा मंडरा रहा है।

हालाँकि, ऋण देना एक विशेष प्रकृति का व्यापार है। जिन लोगों का ऋण लेने और चुकाने का डाटा उपलब्ध नहीं है, उन्हें व छोटे व्यापारों को ऋण देना जोखिम भरा है।

भारत जैसे देश में, जहाँ स्वरोजगार करने वाले तथा कम वित्तीय साक्षरता एवं अनुशासन वाले छोटे ग्राहकों की संख्या अधिक है, डाटा संकलित करने के लिए एक सशक्त प्रणाली की आवश्यकता है।

चीन एक अच्छा उदाहरण है जो हमें सचेत करता है कि जब बिना पर्याप्त जोखिम विश्लेषण के, लेनदारों के पास सरलता से ऋण लेने का मार्ग हो, तब क्या होता है। चीनी गृहस्थियों के सिर पर अब 90 खरब डॉलर का ऋण है जिसमें छोटे व्यापारों पर बकाया ऋण का एक-चौथाई भाग है।

यदि हम ऋण की पिछली नकारात्मक घटनाओं को देखें जैसे 2010 का आंध्र माइक्रोफाइनेन्स संकट और असम की माइक्रफाइनेन्स गुत्थी, तो हम पाते हैं कि बिना अधिक जानकारी के ऋण देने में उसके अत्यधिक उपभोग, स्थानीय स्तर के कारकों, बड़ी घटनाओं और राजनीतिक अस्थिरता (चुनाव) का जोखिम रहता है।

ग्राहक अनिश्चित हैं और नोटबंदी, बाढ़ या सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं या कोविड-19 वैश्विक महामारी से ऋण न चुकाने की घटनाएँ बढ़ सकती हैं।

यदि ऋणदाता विस्तार प्राप्त करने के लिए आक्रामक ऋण देने और मार्केटिंग की रणनीतियाँ अपनाते हैं तो इसकी संभावना है कि जोखिम विश्लेषण के मानक घटाए जाएँगे, नुकसान झेलने की क्षमता बढ़ाई जाएगी और औसत से अधिक ऋण दिया जाएगा जो ऋण न चुकाने की संभावनाओं को बढ़ाएगा।

लोगों को भी किसी भी ऋण के नियम और शर्तों के प्रति सचेत रहना होगा और सोचना होगा कि सरलता से ऋण लेने के चक्कर में वे स्वयं को बड़ी मछलियों के ऋण के जाल में तो नहीं फँसा रहे हैं।

गैर-बैंकिंग वित्तीय फिनटेक कंपनियों (एनबीएफसी) के अशोधित ऋण की मात्रा चिंताजनक है। निजी बैंकों की तुलना में फिनटेक पोर्टफोलियो में ऋण न चुकाने वालों का प्रतिशत आठ गुना है (अगस्त 2020 तक 5 प्रतिशत बनाम 43 प्रतिशत)।

ऋण न चुकाने वालों की इतनी बड़ी संख्या को समझने के लिए पोर्टफोलियो ध्यान से देखना होगा और ऋण वसूली की बेहतर रणनीतियों पर ज़ोर देना होगा।

‘फिनटेक कलेक्शन्स, ट्रेंड एंड स्ट्रैटेजीज़’ की रिपोर्ट के अनुसार अगस्त 2019 में जहाँ 22 प्रतिशत निजी निजी ऋण खातों में बकाया चल रहा था, वहीं अगस्त 2020 में यह 43 प्रतिशत हो गया था।

हो सकता है यह ऋण चुकाने के लिए दिए गए अतिरिक्त समय के कारण हुआ हो परंतु रिपोर्ट का कहना है कि जोखिम वाले ग्राहकों में आधार बनाने के कारण फिनटेक में बकाया ऋण बढ़ा है।

बैंक प्रायः उन्हें ही ऋण देते हैं जो प्राइम व जोखिम से ऊपर के स्तर पर हों तथा जिनकी आय का तुलनात्मक रूप से स्थिर साधन हो और अधिक देयता के कारण वे निजी ऋण लेना चाहते हों।

भारत में कई बैंक सिर्फ अधिक ऋण विश्वसनीयता वाले क्षेत्रों पर ही केंद्रित रहे हैं क्योंकि अन्य श्रेणियों में ऋण लेने और चुकाने का इतिहास नहीं मिल पाता है। पारंपरिक रूप से बैंक 25-40 प्रतिशत ऋण आवेदनों को ही स्वीकृत करते हैं।

वहीं, फिनटेक में कम क्रेडिट स्कोर वाले ग्राहक होते हैं और वे वैकल्पिक डाटा का उपयोग करते हैं। अगस्त 2020 में फिनटेक द्वारा आधे से अधिक ऋण प्राइम जोखिम स्तर के नीचे (730 या उससे नीचे का क्रेडिट अंक) के ग्राहकों को दिया गया था।

वहीं, एनबीएफसी के लिए यह आँकड़ा 38 प्रतिशत, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए 25 प्रतिशत व निजी क्षेत्र के बैंकों के लिए 19 प्रतिशत रहा था।

नीति आयोग के अध्यक्ष अमिताभ कांत ने कहा था कि भारत में ऋण और जीडीपी का अनुपात (51 प्रतिशत) इसके वैश्विक समकक्षों में न्यूनतम है और हमें निजी ऋण बढ़ाना होगा। परंतु यह सावधानी से किया जाना चाहिए!