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गिटार का हिंदी फिल्म संगीत से मेल और ऑल इंडिया रेडियो से बैर (सरगम के सितारे- 1)

गिटार को कॉर्डोफोन के रूप में वर्गीकृत किया गया है- जिसका अर्थ है कि ध्वनि दो निश्चित बिंदुओं के बीच फैली एक कंपन स्ट्रिंग द्वारा उत्पन्न होती है। ऐतिहासिक रूप से, गिटार का निर्माण लकड़ी से किया गया था, जिसके तार कैटगट से बने होते थे।

संयुक्त राज्य अमेरिका में 19वीं शताब्दी के अंत तक स्टील के तार वाले गिटार चलन में आ चुके थे, नायलॉन के तार 1940 के आसपास आए। आधुनिक गिटार के तीन मुख्य प्रकार हैं- क्लासिक गिटार (स्पेनिश गिटार/नायलॉन-स्ट्रिंग गिटार); स्टील-स्ट्रिंग एकॉस्टिक गिटार या इलेक्ट्रिक गिटार; और हवाईयन गिटार जिसे वादक की गोद में रखकर बजाया जाता है।

हिंदी फिल्मों में गिटार का चलन शुरू से ही रहा है, चाहे वह 1950 के दशक की फिल्म बाज़ी रही हो या 2013 में आई आशिकी 2 हो। पाश्चत्य आधुनिक संगीत में मंच पर अपना कार्यक्रम देने वाले लगभग सभी कलाकारों के हाथ में आपको गिटार ही दिखेगा।

इस मामले में हिंदी फिल्म के गायक और संगीतकार भी पीछे नहीं रहे हैं, चाहे वह सोनू निगम हो, अरिजीत सिंह हो या खुद अनु मलिक ही क्यों ना हो। सचिनदेव बर्मन से लेकर प्रीतम तक सभी गिटार के दीवाने रहे हैं। हिंदी फिल्मों में गिटार के बारे में ख़ास बात यह रही है कि इसे हीरो या हीरोइन का एक फैशन स्टेटमेंट माना गया है।

1950 के दशक में बड़े बर्मन साहब की दो फिल्में- जाल और बाज़ी दर्शकों के सामने आईं थीं। बाज़ी में गीता बाली को परदे पर गिटार बजाते हुए देखकर दर्शक हैरान रह गए थे। कुछ ही दिनों बाद बड़े बर्मन ने गीता बाली और देवानंद का गिटार पर आधारित एक गीत और पेश किया जिसे हेमंत कुमार ने अपने स्वर दिए थे।

हिंदी फिल्म के गिटार के सफर पर ले चलने से पहले आपको बताता चलूँ कि 1952 ही वह साल था जब स्वतंत्र भारत के सूचना और प्रसारण मंत्री बीवी केसकर ने निर्णय किया था कि ऑल इंडिया रेडियो फिल्मी गीतों को प्रसारित नहीं करेगा क्योंकि उनका मानना था कि वे पश्चिमी संगीत पर आधारित थे और इन गीतों में पाश्चात्य वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल हुआ था।

उनका मानना ​​​​था कि इस तरह के गीत भारत के सांस्कृतिक विकास में बाधा डालेंगे। इसके बजाय, उन्होंने प्रस्तावित किया कि देश की जनता को भारतीय शास्त्रीय संगीत पर अपना ध्यान देना चाहिए।

द हिंदू (19 जुलाई 1953) में एक लेख में केसकर ने तर्क दिया था कि इन विदेशी धुनों, संगीत आदि से शास्त्रीय संगीत के लिए देशवासियों के दिल में कोई जगह नहीं रह गई है और शास्त्रीय संगीत अब विलुप्त होने की कगार पर है। वे ऐसे गीत चाहते थे जिनमें बांसुरी, तानपुरा या सितार आदि का प्रयोग हो।

कुछ ही समय में आदेश आया कि आकाशवाणी पर प्रसारित सभी गीतों की स्क्रीनिंग की जाएगी, और “सभी कार्यक्रम समय का 10 प्रतिशत का कोटा” लगाया जाएगा। इसके अलावा, केसकर ने सुनिश्चित किया कि यदि एक फिल्मी गीत बजाया जाता है, फिल्म के शीर्षक की घोषणा नहीं की जाएगी और केवल गायक के नाम का उल्लेख किया जाएगा।

वही हुआ जैसा कि केसकर ने अनुमान लगाया था, संगीत निर्देशकों ने ऑल इंडिया रेडियो के साथ अपने अनुबंध तोड़ दिए और फिल्म संगीत केवल तीन महीनों के भीतर रेडियो से पूरी तरह से गायब हो गया। इसके जवाब में केसकर के आदेशानुसार इस शून्य को आकाशवाणी के शास्त्रीय संगीत के प्रसारण द्वारा भर दिया गया।

देव साहब फिर भी नहीं मान रहे थे और परदे पर उनका गिटार बजे (दिल की उमंगे हैं जवां) जा रहा था। इस बार फिल्म थी मुनीम जी और संगीतकार वही थे बड़े बर्मन साहब। केसकर के इस तुगलकी फरमान ने एक ऐसे संगीत कार्यक्रम को जन्म दिया था जिसने सफलता के ऐसे आयाम प्रस्तुत किए जिन्हें आज तक कोई नहीं छू पाया।

साथ ही इस फरमान की वजह से दुनिया के सामने आई एक ऐसी प्रतिभा जिनका नाम अपने आप में एक विश्लेषण बनकर रह गया। उस कहानी के बारे में अगली बार बात करेंगे फिलहाल एक और गिटार वाला गीत सुनते चलते हैं जिसने हिंदी संगीत को कलयुग से बाहर निकालने में फिल्मी दुनिया की मदद की थी।