इन्फ्रास्ट्रक्चर
भारतीय बंदरगाह विधेयक 2021 के प्रारूप का स्वागत राज्यों को क्यों करना चाहिए

दक्षिण 24 परगना के कुल्पी में कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट के हल्दिया डॉक कॉम्प्लेक्स के सामने गंगा नदी पर एक निजी बंदरगाह बनाने के लिए दशकों पहले पश्चिम बंगाल में पूर्ववर्ती वाम मोर्चे की सरकार ने एक छोटे स्थानीय व्यापार समूह के साथ एक रियायती समझौता किया था।

यह निजी बंदरगाह कभी धरातल पर नहीं उतर पाया। लेकिन इस प्रयास ने कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न खड़े किए। केंद्र सरकार द्वारा नियंत्रित कोलकाता पोर्ट नदी के पेटे के रखरखाव में सहस्रों करोड़ों रुपये खर्च करती है। जोखिमों और निवेशों की दोनों में साझेदारी कैसे होगी?

इस संदर्भ में हम भारतीय बंदरगाह विधेयक 2021 के प्रारूप को समझेंगे और हाल में इसे लेकर केंद्र-राज्य के विवाद का विश्लेषण करेंगे। यह विधेयक भारतीय बंदरगाह अधिनियम 1908 का स्थान लेने का प्रस्ताव देने के साथ-साथ छोटे बंदरगाहों के मामले में कुछ केंद्रीय विनियमन जोड़ने की बात करता है जो वर्तमान में राज्य सरकारों का अनन्य कार्यक्षेत्र है।

आपको बता दें कि बड़े और छोटे का वर्गीकरण मात्र उदारवाद से पहले के काल की एक विरासत है। बड़े बंदरगाहों पर केंद्र सरकार को नियंत्रण होता है और उन्हें अधिसूचित किया गया है। निस्संदेह रूप से भूतकाल में वे बड़े बंदरगाह थे।

लेकिन आज अडानी का “छोटा” मुंद्रा बंदरगाह अधिकांश “बड़े” बंदरगाहों से अधिक ट्रैफिक वहन करता है। इस विधेयक प्रारूप पर विचार-विमर्श किया जा रहा है। उद्देश्य है कि समुद्री राज्य विकास परिषद् (एमएसडीसी) को कुछ विनियमनों के माध्यम से कुछ शक्तियाँ दी जाएँ, वर्तमान में वह सिर्फ राज्य समुद्री मंडलों को “सलाह” देता है।

भारत के संघीय ढाँचे का उल्लेख करके राज्य इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन, जो हाल में निर्वाचित होकर द्रमुक-कांग्रेस के गठबंधन वाली सरकार चला रहे हैं, इस मामले में सबसे मुखर रहे हैं। आंध्र प्रदेश ने भी अपना विरोध व्यक्त किया। अधिकांश राज्य, विशेषकर गैर-भाजपा शासित राज्य, भी इस सूची में शीघ्र जुड़ जाएँगे।

तालमेल आवश्यक

संघीय ढाँचे के लाभ को कोई नकार नहीं सकता है। न इस बात को नकारा जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य गुजरात समेत कई राज्यों ने वर्तमान परिस्थिति का भरपूर लाभ उठाया है और बंदरगाह क्षेत्र में बड़े निजी निवेशों को आकर्षित किया है।

गुजरात का मुंद्रा बंदरगाह

लेकिन मात्र “निवेशों” को आकर्षित करना ही सफलता का पैमाना नहीं है। देश को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि ये निवेश व्यवहारिक हों। यूपीए शासन काल (2004-14) में कोयला ऊर्जा के लिए जो दौड़ थी, उसका उदाहरण देखें।

निजी निवेशों के बड़े भाग निष्क्रिय हो गए हैं और शेष क्षमता का पूर्ण उपयोग न कर पाने से संघर्ष कर रहे हैं। पीपीए मॉडल के तहत राजमार्ग निर्माण की जो दौड़ थी, उसके भी अच्छे परिणाम देखने को नहीं मिले हैं। वहीं, दूसरी ओर बैंकों पर गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों का भार आ गया है, निवेशकों की भावनाएँ भी आहत हुई हैं।

यही बात बंदरगाह क्षेत्र में दोहराई जा सकती है जो निष्क्रिय क्षमता की समस्या से परेशान होने भी लगा है। ओडिशा को देखकर कारण समझें। 2019 में विधान सभा में राज्य सरकार द्वारा दिए बयान के अनुसार ओडिशा 12 और बंदरगाहों पर निजी निवेश आकर्षित करने की योजना बना रहा है। यह संप्रति तीन बड़े समुद्री बंदगराहों के अतिरिक्त होगा।

इसके मायने समझने के लिए देखिए कि 485 किलोमीटर लंबे तट पर हर 32 किलोमीटर पर ओडिशा एक समुद्री बंदरगाह बनाना चाहता है। वह भी इसके बावजूद कि वर्तमान के तीन में से दो बंदरगाह निष्क्रिय क्षमता की समस्या से जूझ रहे हैं। कोई तुक है?

इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में निवेश दीर्घ प्रतीक्षा अवधि का शिकार रहते हैं। इसके अलावा, बंदरगाह विकास के लिए राजमार्गों, रेल संयोजकता, रोलिंग स्टॉक, आदि पर भारी सार्वजनिक निवेश की भी आवश्यकता होती है। यहाँ पर अंधाधुंध प्रतिस्पर्धा का कोई स्थान नहीं रह जाता, संघीय संरचना के नाम पर भी नहीं।

लगभग 160 छोटे बंदरगाहों में से मात्र 10-15 पर सम्मानजनक ट्रैफिक आता है। इसके बावजूद रियायतों के प्रलोभन में सार्वजनिक धन को दाँव पर लगाकर नए निवेश होंगे। प्रस्तावित विधेयक केंद्र को कुछ अधिकार देकर इसी कमी को रोकना चाहता है।

नए बंदरगाहों को अधिसूचित करने, वे बंदरगाह किन जलडमरूमध्य का उपयोग करेंगे और उनकी सीमाओं को सीमित करने का अधिकार केंद्र के पास होगा। अन्य शब्दों में कहें तो नए बंदरगाह के उत्तरदायित्वों को लेकर स्पष्टता होगी। कोई किसी का लाभ नहीं खा पाएगा।

पर्यावरण और सुरक्षा

प्रस्तावित परिवर्तन समुद्री पर्यावरण और सुरक्षा मुद्दों से भी बेहतर निपट सकेंगे और कार्यशैली वैश्विक व्यवहारों के समान होगी। मुद्दा सिर्फ इसका नहीं है कि बंदरगाह किसका है, बल्कि किसी दुर्घटना या आपदा में कौन उत्तरदायी होगा यह भी स्पष्ट होना चाहिए।

मान लें कि कुल्पी बंदरगाह पर परिचालन कठिन है और इसपर पहुँचते-पहुँचते एक जहाज़ डूबने लगता है जिससे हल्दिया और कोलकाता डॉक कॉम्प्लेक्स तक जाने वाली जलग्रीवा बाधित हो जाती है, ऐसे में कोलकाता बंदरगाह को हुए वित्तीय नुकसान की भरपाई कौन करेगा?

तेल बहने से पर्यावरण को होने वाले नुकसान का उत्तरदायी कौन होगा? क्या कोई भी राज्य सरकार इस प्रकार की आपात स्थिति से निपटने के लिए तैयार है? ऐसी चिंताएँ वास्तविक हैं और कई बार राज्य की सीमाओं में बंधी नहीं रहतीं, अपितु उन्हें अंतर्राष्ट्रीय ध्यानाकर्षण की आवश्यकता है।

समुद्री प्रदूषण के मामले जटिल होते हैं और अंतर्राष्ट्रीय समझौतों में राष्ट्रीय सरकारें हस्ताक्षरकर्ता होती हैं। इसलिए यूएस में ऐसे मामले संघीय विनियमनों के अधीन आते हैं। कई तर्क दे सकते हैं कि बंदरगाह परिचालन चाहे निजी हो या सार्वजनिक परंतु वही राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय समझौतों और मानकों का पालने करते हैं।

आदर्श रूप से ऐसा ही होना चाहिए। लेकिन क्या हम दावे से कह सकते हैं कि बड़े और छोटे बंदरगाहों, दोनों पर बराबरी से इन मानकों का पालन किया जा रहा है? मुख्य समस्या राज्य समुद्री मंडलों की क्षमता में बड़े अंतर हैं। ओडिशा ने 2019 में समुद्री मंडल का गठन किया। वहीं, पश्चिम बंगाल में तो यह अभी तक कागज़ों पर ही है।

वाइज़ग बंदरगाह

सुरक्षा के मुद्दे और जटिल हैं। नेपाल चाहता था कि वह ओडिशा के एक कुशल निजी बंदरगाह का उपयोग किसी अन्य देश से आने वाले आयातों के लिए करे और केंद्र सरकार के नियंत्रण वाले वाइज़ग बंदरगाह नहीं जाना चाहता था। लेकिन दोनों प्रकार के बंदरगाहों में सुरक्षा परिवर्तन के अंतर के कारण ऐसा संभव नहीं हो पाया।

उत्तरदायित्व तय हों

प्रश्न है कि ऐसी कमियों से देश आगे कैसे बढ़ेगा? राज्यों को स्वायत्तता मिलनी चाहिए लेकिन उतनी ही जो संघीय उत्तरदायित्वों पर अतिक्रमण न करती हो। छोटे या निजी बंदरगाहों के लिए राज्यों को व्यावसायिक मामलों में पूर्ण स्वायत्तता दे दी जाए और बंदरगाह शुल्क या कार्गो शुल्क में केंद्र अपनी नाक न घुसाए।

परंतु राज्यों को मानना होगा कि समुद्री प्रदूषण और सुरक्षा के मामले में संघीय उत्तरदायित्व हैं। और दोनों को साथ मिलकर काम करना चाहिए यह सुनिश्चित करने के लिए कि देश के बंदरगाह बराबरी से सभी नियमों और विनियमनों का पालन करें।

भारतीय बंदरगाह अधिनियम 1908 आज की समस्याओं को ध्यान में रखकर नहीं बनाया गया था। बड़े निजी निवेश जो आकर्षित हो रहे हैं, यह उनके अनुकूल नहीं है। यदि हम इसे अभी नहीं बदलते हैं तो संभवतः कोयला खनन क्षेत्र में जिस समस्या का सामना किया था, उससे बड़ी समस्या का सामना करना पड़ेगा।

राजनीतिक कारणों से किसी ने कोयला क्षेत्र का विराष्ट्रीयकरण नहीं किया, बल्कि राष्ट्रीयकरण कानून में बंदी खनन प्रावधानों के माध्यम से निजी पूँजी को पीछे के रास्ते से आमंत्रित किया। इसके बाद जो हुआ वह इतिहास है। कोयला एक घरेलू मुद्दा था।

परंतु शिपिंग एक अंतर्राष्ट्रीय मामला है। हाल में जो समाचार आया था कि श्रीलंकाई बंदरगाह पर पूर्व जानकारी के बिना एक विवादास्पद चीनी कार्गो मिला था, वह हमें याद दिलाता है कि समय आ गया है कि चीज़ों को व्यवस्थित किया जाए।