पुस्तकें
‘एक स्वर, सहस्र प्रतिध्वनियाँ’ की कथा माला में पिरोए गए भावों के मोती

पुस्तक का नाम- एक स्वर,सहस्र प्रतिध्वनियांँ
लेखक का नाम- श्री साकेत सूर्येश
प्रकाशक- नोशन प्रेस
प्रकाशन स्थल- भारत
प्रकाशन वर्ष- 2021
मूल्य- 165/-

ग्यारह लघुकथाओं से सज्जित “एक स्वर सहस्र प्रतिध्वनियाँ” कथासंग्रह स्वयं में अत्यंत ही अनूठा है। प्रत्येक कथा माला में पिरोए मोती के समान भिन्न होते हुए भी एक दूसरे को प्रभावित एवं सज्जित करती है।

‘पापा को समर्पित’ करते हुए लेखक ने पहले पृष्ठ पर जो भावों के पुष्प समर्पित किए हैं, उसकी सुगंध अंतिम पृष्ठ तक सहज ही समाहित है और सहृदय पाठक उसकी अनुभूति करता है।

प्रस्तावना भी इस पुस्तक का एक बहुत सशक्त पक्ष है। पौराणिक संदर्भ के साथ प्रारंभ हुई प्रस्तावना साहित्य, संस्कृति से होते हुए वर्तमान की वैश्विक एवं राजनैतिक यात्रा पूर्ण करती हुई आदर्श लेखन का प्रतिनिधित्व करती हुई दो संपूर्ण पृष्ठों में ही इतना कुछ कह जाती है कि पाठक के हृदय में आगामी कथाओं के लिए स्वयं ही उत्साह मिश्रित जिज्ञासा का जन्म होता है।

कथा संग्रह की पहली ही कथा ‘पुलोमा’ माता-पिता एवं संतान के बीच के आपसी सुदृढ़ संबंध की मुखर अभिव्यक्ति है।

जहाँ दूसरी कथा ‘तुलसी विवाह’ सत्य एवं निष्ठा से परिपूर्ण ‘गुंजा’ के माध्यम से नारी के विद्रोह के साथ ही अपने सम्मान के लिए युद्धरत एक योद्धा को प्रदर्शित करती है, वहीं तीसरी कथा ‘शैलसुता’ की ‘गौरी’ कहीं अधिक तार्किक एवं संयमित होकर मानव कल्याण के साथ ही अपने इष्ट के प्रति प्रेम को सहज ही प्रदर्शित करने से तनिक भी संकोच नहीं करती।

चौथी कथा ‘ब्रह्मचारिणी’ नारी सुलभ धैर्य एवं तपस्या के साथ ही प्रेम के हठी रूप को दर्शाती है।

पाँचवीं कथा ‘माँ चंद्रघंटा’ बालिका से माता बनने तक के मार्ग में चरणबद्ध परिवर्तित होते नारी के अभूतपूर्व गुणों की अलौकिक व्याख्या करती है।

छठी कथा ‘शिव-शक्ति’ पुरुष और प्रकृति के मध्य स्थापित समग्र संबंध की अभिव्यक्ति है जिसके बिना सृष्टि अपूर्ण है।

सातवीं कथा ‘ओणम कथा’ सांस्कृतिक एवं सामाजिक परिवर्तन की अनूठी कथा है। महाबली और वामनावतार विष्णु के सामूहिक प्रयास का उत्कृष्ट उदाहरण है।इसी कथा का विस्तार आठवीं कथा ‘रक्षा बंधन’ है।

नौवीं कथा ‘बांग्लादेश-एक कहानी’ बांग्लादेश की गलियों से निकल कर भारतवर्ष के विस्तृत भूभाग पर विस्तार लेते हुए पुनः बांग्लादेश तक जाती है जहाँ भूतकाल ने अपने गहरे चिह्न छोड़ रखे हैं। शेखर की यह यात्रा साझा संस्कृति की कतरन बटोरने की यात्रा है।

10वीं कथा ‘घर वापसी’ आधुनिक काल की सबसे बड़ी समस्या ‘पूर्वाग्रह’ पर करारा प्रहार है। सुने को सच मानती नवोदित पीढ़ी के लिए एक दर्पण है जो सत्य को प्रदर्शित करता है।

‘कॉफ़ी हाउस’ कथा संग्रह की 11वीं एवं अंतिम कथा है और यह पूर्व कथा का ही विस्तृत क्षेत्र है। आधुनिकता के दिखावे में वर्तमान पीढ़ी का वैचारिक परिवर्तन समाज को नई दिशा दे रहा है। ऐतिहासिक पात्रों के साथ इनका सामंजस्य बिठाते हुए लेखक ने सटीक कथा रचना की है।

भाव के साथ भाषा इस संग्रह की विशेषता है। हिंदी के अत्यंत सुंदर शब्दों ने इसे सज्जित किया है परंतु कहीं-कहीं तत्सम शब्दों की अधिकता नवीन पाठकों अथवा क्षेत्रीय पाठकों के लिए क्लिष्ट हो जाती है।

पुस्तक का कवर नामानुरूप अत्यंत आकर्षक है। नई पीढ़ी के लिए अत्यंत ही उपयोगी एवं सराहनीय रचना है। लेखक को इस पुस्तक की रचना हेतु हृदयश: शुभकामना।

लेखक का परिचय- लेखक साकेत सूर्येश जागरण, स्वराज्य जैसे प्रकाशन में व्यंग्य, राजनीतिक स्तंभ, कविताएँ लिखते हैं। हिंदी में लेखक का व्यंग्य संग्रह ‘गंजहों की गोष्ठी’ पाठकों एवं समीक्षकों द्वारा स्नेहपूर्वक स्वीकार किया गया और अमेज़ॉन पर बेस्टसेलर भी हुआ।

लेखक द्वारा क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा का अंग्रेज़ी अनुवाद भी लोकप्रिय रहा था। लेखक दिल्ली के निकट अपने परिवार के साथ रहते हैं और वर्तमान में एक बहुराष्ट्रीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान में कार्यरत हैं। लेखक ट्विटर पर @saket71 हैंडल से सक्रिय हैं और काफी चर्चित हैं।