अर्थव्यवस्था
बढ़ते खाद्य तेल मूल्यों को रोकने के लिए मोदी सरकार के बौने प्रयास

कभी-न-कभी प्रेमचंद की लिखी कहानी “बड़े घर की बेटी” पढ़ी ही होगी। नहीं, मेरा इरादा उस कहानी की व्याख्या करने जैसा बिलकुल नहीं है। भाइयों के झगड़े, परिवार के टूटने, संयुक्त परिवारों जैसी कोई बात भी नहीं करनी। मेरा इरादा बस यह ध्यान दिलाने का है कि इस कहानी में झगड़ा दाल में घी न होने पर शुरू हुआ था।

बड़े घर की बेटी, किफ़ायत क्या जाने? ऐसा कुछ कहते हुए करीब आठ दशक पहले खाने के तेल-घी इत्यादि के बारे में प्रेमचंद अपनी कहानी में बता गए हैं। घी-तेल खाने की दशा तब से अब तक में काफी बदल चुकी है। भारत में लोग पहले घी-तेल से वनस्पति घी कहलाने वाले उत्पादों पर आए और फिर उनकी कमियाँ देखते हुए, वापस पुरानी चीज़ों और “ऑर्गेनिक” कहलाने वाले उत्पादों की तरफ मुड़ने लगे हैं।

इसी बीच भारत की तेल की खपत बहुत बढ़ गई है। खाद्य तेलों के उत्पादन का मामला देखें तो ऐसे बीजों के उत्पादन में सबसे आगे यूएसए है और उसके बाद फिर ब्राज़ील, चीन, अर्जेंटीना और फिर कहीं भारत और यूरोपीय यूनियन की बारी आती है। खपत में अपनी जनसंख्या के कारण सबसे आगे चीन है और भारत भी प्रति व्यक्ति तेल की खपत में कोई बहुत पीछे नहीं है।

विश्व की लगभग 53 प्रतिशत जनसंख्या, एशिया-पैसेफिक कहलाने वाले क्षेत्र में रहती है, इसलिए सर्वाधिक खाद्य तेलों की खपत इसी क्षेत्र में होगी, यह भी समझ आता है। उत्पादन कम होने के कारण वर्तमान में भारत अपनी आवश्यकता का लगभग 56 प्रतिशत खाद्य तेल आयात करता है।

अगर सबसे बड़ा बाज़ार होने के कारण मूल्य तय करने की क्षमता चीन के पास हो, और उस समय भारत अपनी आवश्यकता का आधे से अधिक आयात कर रहा हो तो क्या-क्या हो सकता है, इसे समझने के लिए किसी का विशेषज्ञ होना आवश्यक नहीं है। भारत जो तेल आयात करता है, उसमें से लगभग आधा पाम तेल है।

साभार- डाउन टू अर्थ

इस पौधे को बड़ा होने और फलने-फूलने में काफी समय लगता है। इसलिए साल-दो साल या पाँच वर्षों में भी इसकी उत्पादन क्षमता बढ़ नहीं सकती। सरकारी स्तर पर खाद्य तेल वाली फसलों की खेती और पैदावार बढ़ाने के प्रयासों के बाद भी यह तुरंत नहीं बढ़ पा रही है।

नीतियों का मामला देखें तो खाद्य तेलों के आयात से जुड़ी नीतियाँ भी बदलती रही हैं। वैसे तो खाद्य तेलों का आयात “ओपन जनरल लाइसेंस” (ओजीएल) के तहत होता है लेकिन जनवरी 2020 में सरकार पाम तेल को “प्रसंस्कृत पाम तेल” को मुक्त से प्रतिबंधित क्षेत्र में ले आई थी।

आयात शुल्कों और करों में भी स्थानीय किसानों के हितों को देखते हुए लगातार बदलाव किए जाते हैं। सीधे शब्दों में इसका अर्थ है कि परिशोधित तेल पर कर लगातार बढ़ाए जाते रहे हैं। कच्चे तेल पर (जनवरी 2020 में) आयात कर 37.5 प्रतिशत से घटाकर 27.5 प्रतिशत किया गया था।

अगर देखा जाए तो कच्चा तेल आए और उसके शोधन के लिए कारखाने भारत में लगें, इससे लाभ ही है। इसलिए ऐसे निर्णय को सही कहा जा सकता है। जब 2021-22 का बजट आया तो कच्चे पाम तेल पर कर और भी कम किया गया (27.5 प्रतिशत से 15 प्रतिशत)। इसी तरह कच्चे सोयाबीन के तेल पर भी आयात कर को 35 प्रतिशत से घटाकर 15 प्रतिशत कर दिया गया था।

इसी समय ऐसे तेलों पर “एग्री-सेस” लगना शुरू हुआ जो कच्चे पाम तेल के लिए 17.5 प्रतिशत था और सोयाबीन तथा सूरजमुखी के कच्चे तेल पर 20 प्रतिशत। इसका परिणाम यह हुआ कि असल में कुल कर देखें तो कच्चे पाम तेल पर यह 35.75 प्रतिशत हुआ और सोयाबीन और सूरजमुखी के कच्चे तेल पर 38.5 प्रतिशत।

हाल के दौर में बढ़ते हुई तेल मूल्यों को समझने के लिए हमें कुछ और बातें भी मालूम होनी चाहिए। भारत में खाद्य तेलों की आपूर्ति सुनिश्चित हो सके, इसलिए यहाँ से खाद्य तेलों का निर्यात मार्च 2008 में प्रतिबंधित किया गया था। समय-समय पर यह प्रतिबंध आगे के लिए बढ़ाया जाता रहा।

फरवरी 2015 में राइसब्रान तेल के थोक निर्यात की छूट दी गई। मार्च 2017 से फिर मूंगफली, सोयाबीन और मक्के इत्यादि के तेल के निर्यात की छूट मिली। अप्रैल 2018 से सरसों के तेल के अलावा सभी खाद्य तेलों के निर्यात की छूट दे दी गई। वर्तमान में सरसों के तेल के 5 किग्रा तक के पैक में 900 अमेरिकी डॉलर प्रति मेट्रिक टन की न्यूनतम निर्यात कीमत पर निर्यात की छूट है।

विगत पाँच वर्षों के देश में खाद्य तेल के बीजों का उत्पादन देखें तो यह भी सतत् वृद्धि की दिशा में ही दिखता है–

तेल वर्ष (नवम्बर से अक्टूबर) तेल बीजों  का उत्पादन खाद्य तेलों की घरेलु स्रोतों से उपलब्धता आयात खाद्य तेलों की कुल उपलब्धता
2015-16 252.50 86.30 148.50 234.80
2016-17 312.76 100.99 153.17 254.16
2017-18 314.59 103.80 145.92 249.72
2018-19 315.22 103.52 155.70 259.22
2019-20 332.19 106.55 134.16 240.71
2020-21# 365.65 113.09 74.40** 

# तीसरे पूर्वानुमानों पर (कृषि मंत्रालय की 25.05.2021 की घोषणा से)
**नवंबर से मई 2021 तक
*स्रोत – https://dfpd.gov.in/oil-division.htm

जैसी कि हमने पहले ही चर्चा की है, आयात पर इतनी अधिक निर्भरता का परिणाम यह होता है कि अंतर्राष्ट्रीय मसलों, विदेशों में कहीं आए परिवर्तनों का भारत के खाद्य तेल मूल्यों पर सीधा प्रभाव होता है। उदाहरण के तौर पर यदि इंडोनेशियाई या मलेशियाई पाम तेल प्लांटेशन में मजदूरों की कमी होगी तो भारत में तेल मूल्यों पर प्रभाव होगा।

अर्जेंटीना में सूखा पड़ने से अगर सोयाबीन की पैदावार गिरी, तो भारत पर असर होगा। युक्रेन में सूरजमुखी की फसल के नुकसान से भारत के मूल्यों पर प्रभाव होगा। चीन यदि अधिक तेल खरीदकर इकठ्ठा करना शुरू कर दे, तो भी असर होगा।

सिर्फ प्रति व्यक्ति खाद्य तेल की खपत ही देखें तो 2012-13 में जहाँ भारत में यह 15.8 किलोग्राम प्रति व्यक्ति थी, वहीं 2015-16 तक ही यह लगभग चार किग्रा प्रति व्यक्ति बढ़कर 19.5 किलोग्राम प्रति व्यक्ति पर जा पहुँची थी। स्वास्थ्य का दृष्टिकोण भूल जाएँ तो भी माँग बढ़ना मूल्यों पर तो प्रभाव डालेगा ही।

“साल्वेंट एक्सट्रैक्टर एसोसिएशन” (एसईए) ने लगातार ही सरकार से एमएसपी और दूसरे माध्यमों से खाद्य तेल वाले बीजों की पैदावार बढ़ाने की माँगें जारी रखी हैं। आयात के कारण खाद्य तेलों के मूल्यों पर प्रभाव को बेहतर समझने के लिए खाद्य तेलों की दूसरी संधियाँ देखें। एसएएफटीए समझौते की वजह से नेपाल से आयात होने वाले खाद्य तेलों पर कोई ड्यूटी नहीं लगती।

जब चीन के भंडारण के साथ इस बात को जोड़कर देखेंगे तो यह भी समझ में आ जाता है कि खाद्य तेलों के नेपाल से आयात के लिए एसईए लगातार सार्वजनिक क्षेत्र के माध्यम से नेपाल से खाद्य तेलों के आयात की माँग क्यों करता रहा है। यहाँ से सस्ती दरों पर आयात करके बाज़ार में आई खाद्य तेल मूल्यों में तेज़ी का लाभ उठाया जा सकता है।

हाल में ही बाज़ार में आई तेज़ी से लाभ उठाने वाले शेयर बाज़ार के कारोबारी से प्रधानमंत्री मोदी की भेंट एक महत्वपूर्ण समाचार क्यों हो जाता है, यह भी इससे समझ में आता है। लॉकडाउन के दौरान ही सरकार ने “भंडारण नियंत्रण आदेश, 1977” का प्रयोग करके, खाद्य तेलों के भंडारण को नियंत्रित करने का प्रयास किया था।

बाज़ार के कारोबारियों की मानें तो जनवरी की “फ्यूचर” खरीद पर सोयाबीन के बीजों जैसी कुछ चीज़ों पर अभी के भंडारण की सीमा तय करने का असर हुआ होगा, जिससे कीमतें 2-3 प्रतिशत तक गिरी हैं। अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में खाद्य तेल के बीजों की कीमतों में अभी भी काफी तेज़ी है।

केंद्र सरकार का अभी का निर्णय कितना असर करेगा, यह इस बात पर निर्भर है कि राज्य सरकारें अपने भंडारण की सीमा को कहाँ तय करती हैं। पिछले एक महीने के खुदरा तेलों के बाज़ार पर एक नज़र डाली जाए तो दिखता है कि सोयाबीन, सूरजमुखी और पाम तेल की कीमतें 4 से 7 रुपये गिरी हैं, मगर इसी दौर में सरसों के तेल की कीमतें 1 रुपया बढ़कर 190 रुपये प्रति लीटर पर जा पहुँची है।

पिछले वर्ष की तुलना में मूल्य 50-60 प्रतिशत बढ़ जाने के कारण केंद्र सरकार ने भंडारण को मार्च 2022 तक नियंत्रित रखने के आदेश जारी किए हैं। सिर्फ पैदावार का हिसाब अगर इस वर्ष के पहले पूर्वानुमान के हिसाब से देखेंगे तो मूंगफली के उत्पादन में 3.5 प्रतिशत की कमी आई है।

इसके साथ ही सोयाबीन का उत्पादन भी अंदाजन 1.08 प्रतिशत कम हुआ है। खाद्य तेलों के खुदरा मूल्य में परिवर्तन से जो राजनीतिक प्रभाव होगा, उससे भी इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि तेल के मूल्य सीधे परिवारों के खाने-पीने पर असर डालते हैं।

खाद्य तेलों के बीजों की फ्यूचर खरीद-बिक्री के एनसीडीईएक्स पर 8 अक्टूबर 2021 से बंद होने के साथ ही भंडारण को मार्च 2022 तक नियंत्रित करने के इस निर्णय का प्रभाव खुदरा बाज़ार तक पहुँचने में करीब सप्ताह भर का समय तो लगेगा ही।

इसके साथ ही सरकार को इस बात के लिए भी तैयार रहना होगा कि राज्यों द्वारा भंडारण की सीमा तय किए जाने पर उसके निर्णय का असर निर्भर करेगा। कहीं-न-कहीं ऐसे अवसरों पर कुछ कारोबारी कानूनी पेंचीदगियों का लाभ भी उठाते हैं।

बढ़ते खाद्य तेल मूल्यों से जनता के परेशान होने पर भी क्या सरकार कीमतों में तेज़ी से लाभ उठाने वाले कारोबारियों के सामने हाथ बांधे खड़ी दिखाई देगी? निकट भविष्य में राजनीति से खुद को दूर बताने वाले और राजनीति में रुचि रखने वाले, दोनों ही प्रकार के लोगों के लिए ये एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न होगा।

प्रेमचंद की कहानी की तरह ही खाद्य तेल से शुरू हुई बात आगे बहुत दूर तक जा सकती है। आखिर खाद्य तेलों के बढ़े मूल्य का प्रभाव तो पक्ष-विपक्ष दोनों पर ही होता है!