अर्थव्यवस्था
अनौपचारिक क्षेत्र के कामगारों को वर्ल्ड बैंक के 50 करोड़ डॉलर का लाभ कैसे मिलेगा

कोविड-19 वैश्विक महामारी से प्रभावित भारत के अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिए वर्ल्ड बैंक ने 50 करोड़ डॉलर (लगभग 3,717.28 करोड़ रुपये) की ऋण योजना स्वीकृत की है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रवासी कामगारों और श्रमिकों को राहत पहुँचाने में केंद्र और राज्य सरकारों की विफलता पर फटकार लगाए जाने के एक दिन बाद यह प्रगति हुई है।

मंगलवार (29 जून) को वर्ल्ड बैंक के कार्यकारी निदेशकों के बोर्ड द्वारा स्वीकृत इस योजना का उद्देश्य भारत के विशाल अनौपचारिक क्षेत्र के कार्यबल की सहायता करना और कोविड-19 संकट से निपटने में राज्य सरकारों को लचीलापन प्रदान करने के साथ-साथ भावी जलवायु और आपदा संकटों के लिए भी उन्हें तैयार करना है।

15वें वित्त आयोग के सुझावों के अनुसार बाँटी जाने वाली राशि से राज्य अनुकूल सामाजिक सुरक्षा प्रणाली बना सकेंगे जो परिस्थिति अनुसार आवश्यकताओं को समझकर न सिर्फ महामारी में, बल्कि पर्यावरण संकट या प्राकृतिक आपदा जैसे संकटों में भी अपवर्जित समूहों की सहायता कर सकेंगी। भौगोलिक रूप से भेद्य जिलों के लिए वर्धित आपदा राहत कोष महामारी के वर्तमान चरण और भावी लहरों में राज्यों का सहयोग करेगा।

समन्वित और उत्तरदायी भारतीय सामाजिक सुरक्षा प्रणाली की रचना (सीसीआरआईएसपी) कार्यक्रम 1.15 अरब डॉलर के भारत के गतिवर्धक कोविड-19 सामाजिक सुरक्षा प्रतिक्रिया कार्यक्रम का ही सहयोगी है जो प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के अधीन आने वाली योजनाओं की सहायता करेंगे।

वर्ल्ड बैंक का कहना है कि यह कोष लचीले और समन्वित सामाजिक सुरक्षा प्रणाली के माध्यम से अनौपचारिक क्षेत्र की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भारत की केंद्र और राज्य सरकारों की क्षमताओं में वृद्धि करेगा। महामारी के कारण आई आर्थिक मंदी के कारण अनौपचारिक  क्षेत्र संघर्षरत है जहाँ पिछली दो लहरों में आय का नुकसान हुआ है।

कोविड-19 दैनिक मामलों में दोनों लहरों के शिखर

पिछले कुछ सप्ताहों में सर्वोच्च न्यायालय ने भी सरकार से प्रयास बढ़ाने के लिए कहा है ताकि प्रवासी और अनौपचारिक कामगारों को राहत दी जा सके। अब जाकर सरकार ने नए नगरीय मंचों की घोषणा कर दी है। कार्यक्रम के तहत इन मंचों को सुदृढ़ किया जाएगा ताकि शहरी क्षेत्रों में सामाजिक सुरक्षा की पहुँच गहरी की जा सके।

जबसे महामारी शुरू हुई है, तब से निर्धनों और भेद्य गृहस्थियों की सहायता करने वाले भारत के सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों को बल देने के लिए वर्ल्ड बैंक द्वारा कुल मिलाकर 1.65 अरब डॉलर की राशि दी जा चुकी। पहले दो कार्यक्रमों को पिछले वर्ष ही स्वीकृति मिल गई थी जिसमें 32 करोड़ बैंक खातों में तत्काल सहायता नकद हस्तांतरित किए गए थे और 80 करोड़ लोगों को अतिरिक्त राशन उपलब्ध करवाया गया था।

उपयुक्त सामाजिक सुरक्षा प्रतिक्रियाएँ लागू करने के लिए आपदा प्रतिक्रिया कोष से राज्य अब लचीला वित्तपोषण प्राप्त कर सकते हैं। 2020 में महामारी के आरंभ के साथ दो समस्याएँ खड़ी हई थीं। पहली, भारत के सुरक्षा कार्यक्रमों का केंद्र ग्रामीण क्षेत्र रहा था और लाभ स्थानांतरण प्रक्रियाओं का अभाव था जिसके कारण शहरी और प्रवासी अनौपचारिक कामगारों को पीड़ा सहनी पड़ी थी।

दूसरी, संकट ने विकेंद्रीकरण और भावी राहत प्रयासों व राज्य-विशिष्ट सुरक्षा कार्यक्रमों में अधिक समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया था। सरकार के जारी सुधार प्रयास कर रहे हैं कि केंद्रीकृत और एकरूपी सामाजिक सुरक्षा पहल का विकल्प निकाला जाए। ध्यान इस बात पर दिया जा रहा है कि इन सुधारों का लाभ पहुँचाने की प्रक्रिया को कुशल कैसे बनाया जाए।

“भारत का सामाजिक सुरक्षा वास्तुशिल्प दोराहे पर खड़ा है जहाँ से वह सीमित योजनाओं की जगह यह एक संघीय देश की आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए तैयार हो रहा है। ग्रामीण की जगह प्रणाली को राष्ट्रव्यापी किया जा रहा है जो शहरीकरण, अनौपचारिकता और सबसे महत्त्वपूर्ण प्रवासी श्रमिकों के लिए लाभ स्थानांतरण की समस्या का समाधान करेगी।”, वर्ल्ड बैंक के भारत निदेशक जुनैद अहमद ने बताया।

वर्ल्ड बैंक के भारत निदेशक जुनौद अहमद (मध्य में)

“आर्थिक, महामारी या जलवायु परिवर्तन के थपेड़े देशों को लगातार पड़ रहे हैं और इस संदर्भ में सामाजिक सुरक्षा में निवेश अर्थव्यवस्थाओं और समुदायों की जीविकाओं को लचीला बनाएगा। वर्ल्ड बैंक द्वारा भारत में समर्थित सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों का मुख्य उद्देश्य यही है।”, अहमद ने कहा।

राष्ट्रीय डिजिटल शहरी अभियान के तहत नगर निगमों के स्तर पर निवेश से शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए एक साझा डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाएगा। डिजिटल मंच के माध्यम से शहरी सुरक्षा को बढ़ाया जा सकेगा और अनौपचारिक कामगारों को एक सामाजिक बीमा मिलेगा।

महिला कामगारों और महिला मुखिया वाली गृहस्थियों पर इसमें लिंगवार जानकारी भी होगी। इससे नीति निर्माता लिंग आधारित सेवाओं को पहुँचा सकेंगे और विधवाओं, किशोरियों व जनजातीय महिलाओं जैसे भेद्य वर्गों तक पहुँच बना सकेंगे। भारत की शहरी अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग रेहड़ी-ठेलों वाले लोग भी हैं।

इस कार्यक्रम के तहत उन्हें 10,000 रुपये तक के सस्ते पूँजी ऋण मिल सकेंगे। आईटी आधारित मंच के माध्यम से शहरी स्थानीय निकाय उनकी पहचान कर सकेंगे। इस ऋण योजना का लाभ 50 लाख रेहड़ियों को मिल सकता है।

50 करोड़ डॉलर में से 11.25 करोड़ डॉलर का ऋण अंतर्राष्ट्रीय विकास संघ से मिलेगा जो कि वर्ल्ड बैंक की रियायती ऋणदात्री इकाई है। 38.75 करोड़ डॉलर का ऋण अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक से 18.5 वर्षों की अवधि के लिए मिलेगा जिसमें पाँच वर्षों की अनुग्रह अवधि भी है।

अरुण कुमार दास रेलवे के क्षेत्र में वरिष्ठ पत्रकार हैं। उनसे akdas2005@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।