अर्थव्यवस्था
क्यों उर्जित पटेल की निकासी और भाजपा की हार का बाज़ार पर नहीं पड़ा प्रभाव

उर्जित पटेल के अप्रत्याशित पदत्याग के बाद मात्र 48 घंटे के भीतर शक्तिकांत दास के आरबीआई प्रमुख बनने से बाज़ार जल्द ही स्थिर हो गया। लगातार दो बड़े झटके (उर्जित पटेल के इस्तीफे और भाजपा को मिली 3 हिंदी राज्यों में हार) झेलने के बावजूद बाज़ार अब उत्साहित है। बीते दो दिनों में निफ्टी और सेंसेक्स दोनों ही ऊपर रहे हैं।

2016 में जब रघुराम राजन त्यागपत्र देने की सोच में थे तब भी शक्तिकांत दास अगले आरबीआई प्रमुख की दौड़ में थे। 12 दिसंबर 2018 के दिन उन्होंने पदभार ग्रहण करते हुए कहा कि वे केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता की रक्षा करेंगे। लेकिन यह तो उन्हें किसी भी हाल में कहना ही था।

उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी विवादास्पद विषय को सरकार के साथ बातचीत के माध्यम से सुलझाया जा सकता है। पदभार ग्रहण करते ही मीडिया वार्ता करने के इस कदम से वे शायद यह दिखाना चाहते हैं कि वे अपने अल्पभाषी पूर्वाधिकारी से अलग हैं।

बारंबार मतभेदों के बावजूद अभी तक की सारी सरकारों ने केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता को बरकरार रहने दिया क्योंकि सरकार के लिए कोई तो होना चाहिए जिसके सर पर वो महंगाई का ठीकरा फोड़ सके।

मीडिया यह सोचती है कि जिस व्यक्ति ने एक लंबा समय वित्त मंत्रालय में कार्य किया है वह सरकार का चमचा तो होगा ही। लेकिन ऐसा कहना गलत भी हो सकता है क्योंकि पिछले सात आरबीआई प्रमुखों में से पाँच पहले वित्त मंत्रालय में कार्यभार संभालने के बाद इस पद पर नियुक्त हुए थे। केवल उर्जित पटेल और सी रंगराजन ही शैक्षणिक पृष्ठभूमि से थे।

सी रंगराजन एक शालीन अधिकारी माने जाते हैं और वे बिना किसी घृणा और कटुता के सरकार को समझाने में कामयाब रहते थे। एस वेंकटरमण, विमल जालान, वाइवी रेड्डी और डी सुब्बाराव पूर्व वित्त सचिव भी थे। और रघुराम राजन भी मुख्य वित्तीय सलाहकार थे।

जब कभी भी वित्त मंत्रालय और आरबीआई के मध्य रिश्तों को परखने की बात आती है तब पुराने अधिकारियों को पदभार दिया जाता है ताकि तनाव की स्थिति को दूर किया जा सके। इसलिए शक्तिकांत दास को नया गवर्नर बनाया गया है ताकि शासन और केंद्रीय बैंक के बीच जो गलतियाँ (उर्जित पटेल और उनके उपाधिकारी विरल आचार्य के द्वारा शासन पर विवेकहीन आरोप) हुई हैं उन्हें सुधारा जा सके।

शक्तिकांत दास के विरुद्ध एक बात यह भी है कि वे कोई अर्थशास्त्री नहीं हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। रिज़र्व बैंक के पास बहुत सारे अर्थशास्त्री हैं जो नए गवर्नर को सलाह दे सकते हैं।

वैसे भी गवर्नर का सही काम है कि जब अर्थ व्यवस्था डगमगाने लगे तब सलाहों के आधार पर सही मौद्रिक नीति निर्णयों द्वारा अर्थ व्यवस्था को सुधारे न कि अपनी शिक्षा का ढोल बजाए। जैसे कि आपको दी गई दवाई को समझने के लिए आपको चिकित्सक होना आवश्यक नहीं है, वैसे ही आपको राजनीतिक अर्थ व्यवस्था के संदर्भ में दी गई आर्थिक सलाह को समझने के लिए आपको अर्थशास्त्री होना ज़रूरी नहीं है, और तब तो और ज़रूरी नहीं है जब सलाह अर्थ व्यवस्था से भी परे हो।

इसलिए बाज़ार अभी रूठा नहीं है। जिनका सर आसमान में है उन अर्थशास्त्रियों की तरह नहीं, बाज़ार जानते हैं कि भारतीय तंत्र कैसे काम करता है और उन चीज़ों को नज़रअंदाज़ कर देता है जिसका प्रचार मीडिया द्वारा किया जाता है जैसे कि उच्च-स्तरीय व्यक्तियों जैसे आरबीआई गवर्नर और नरेंद्र मोदी सरकार को अत्यधिक महत्ता देना।

किसी भी गवर्नर के पद से हटने से कभी भी बाज़ार ज्यादा चिढ़ा नहीं है, चाहे वह 2016 में रघुराम राजन का विषय ही क्यों न हो और कुछ राजनीतिक अस्थिरता के दिनों (जैसे 2004 में यूपीए की जीत और इस वर्ष 11 दिसंबर) को छोड़कर बाज़ार हमेशा साधारण रूप में रहता है। ग्राहक को पता है कि आधारभूत आर्थिक नीतियाँ शासन में परिवर्तन होने से नहीं बदलती।

11 दिसंबर को चुनाव परिणामों के बाद एक झटके के बाद बाज़ार फिर अपने सामान्य स्तर पर है। ग्राहक जानते हैं कि 2019 में भी यदि गैर-भाजपा दल की सरकार होती है तो सामान्य गतिरोध के अलावा कोई ख़ास असर नहीं होगा।

असली खतरा देश के अंदर नहीं बल्कि इस बात से है कि न्यूयॉर्क की वॉलस्ट्रीट कैसी चल रही है। बाज़ार का रुख इस बात से सीधा संबंधित है कि अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में क्या चल रहा है।

बाज़ार के वर्तमान तेज़ी से हुए संतुलन का कारण बुधवार को दोहरा सकारात्मक डाटा है जिसके अनुसार अक्टूबर में औद्योगिक उत्पादन में 8.1 प्रतिशत की वृद्धि व इसके साथ ही नवंबर में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) में 2.33 प्रतिशत की गिरावट हुई है।

इस स्तर पर सीपीआई मौद्रिक नीति समिति द्वारा तय किए गए महंगाई अंक से  मुश्किल से 0.33 प्रतिशत अधिक है, जिसका अर्थ है कि दरों में कमी होनी चाहिए अगर समिति नहीं चाहती कि यह अपने शासनादेश में विफल हो। जब दरें गिरेंगी, तब बाज़ार ऊपर उठेगा क्योंकि दर और शेयर बाज़ार विपरीततः संबंधित हैं।

मोदी सरकार की वह गलती जब इसने दास के होते हुए पटेल को चुना था, अब सुधारी जा चुकी है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।