अर्थव्यवस्था
क्यों एनडीए सरकार द्वारा एक पृथक मत्स्य विभाग का गठन महत्त्वपूर्ण है

आशुचित्र- एक अलग विभाग का निर्माण मछुआरों के हितों के संरक्षण और विनियम जैसे उपायों के समन्वय को सुरक्षित करने में मदद कर सकता है।

पिछले महीने अमरीका ने भारत से जाने वाले 26 झींगा के प्रेषित माल को दाखिल होने से मना कर दिया। इस हादसे को मिलाकर अस्वीकरण की सीमा 50 प्रतिशत हो जाएगी, जो केवल 2018 में हुईं हैं। और साथ ही प्रेषित माल में प्रतिबंधित दवाइयाँ भी पाई गईं।

यह अस्वीकरण तब और भी बढ़ गया जब अमरीका ने समुद्री भोजन आयात निगरानी कार्यक्रम (सीम्प) लगा दिया। अमरीका ने सिम्प 1 जनवरी 2018 से लागू किया था, पर तब झींगा आयात पर छूट दी थी।

और कोई नही. पर अमरीका के अधिकारियों को ही स्पष्ट नहीं था कि किस वह किस तरह इस नियम को लागू करेंगे जो बिजाई से कटाई तक का हिसाब रखेगा जो दूर-दराज़ खेतों में होती है। पर इस साल की 1 जनवरी से सिम्प को अनौपचारिक अनुपालन अवधि में झींगा के निर्यात के लिए लगाया गया।

इसका मतलब कि उस झींगा के लदान को अस्वीकार किया जाएगा जिनका 1 मार्च तक का कोई अभिलेख नहीं होगा। हालाँकि ऊपर के प्रेषित माल को प्रतिबंधित दवाइयाँ के मिलने पर खारिज कर दिया है।

भारत अमरीका को 27 प्रतिशत से ज़्यादा झींगा निर्यात करता है। कुल निर्यात में लगभग 41 प्रतिशत फ्रोज़न झींगा होते हैं और 2017-18 के साल में लदान की संख्या 68.5 प्रतिशत के आस-पास थी। एक शोध पत्र क्रिसिल के अनुसार, इस वित्त वर्ष मार्च के अंत तक भारत का समुद्री भोजन का निर्यात आठ अरब डॉलर के तक पहुँच जाएगा, जो कि पिछले वित्त वर्ष 7.08 अरब डॉलर का था।

यह इस संबंध में है कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने त्रिपुरा और तमिलनाडु की जन सभाओं में रविवार (10 फरवरी) को कहा कि इस अंतरिम बजट में उनकी सरकार और वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने मत्स्य पालन विभाग को अलग विभाग बनाने का प्रस्ताव रखा है। उन्होंने कहा कि सरकार मछुआरों के दरवाजों तक सेवाएँ लेकर जाएगी।

अभी तक मत्स्य पालन क्षेत्र पशुपालन और डेरी विभाग का हिस्सा था, जो कि कृषि मंत्रालय के अंतर्गत था। इसी के कारण मछली पालन क्षेत्र जो कि एक सुर्दय उद्योग है, उसे काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा और उसपर उचित ध्यान नहीं दिया गया।

झींगा प्रेषित माल में प्रतिबंधित दवाइयों का मिलना भी एक वजह है, जिसके कारण अमरीका ने प्रेषित माल के लिए मना कर दिया। (यह दवाईयां झींगा को बीमारी से बचने के लिए दी जाती है)

जब से विश्व व्यपार संगठन का गठन हुआ है, तभी से भारत के समुद्री भोजन के निर्यात में काफी अड़चनें आई हैं।

उदहारण के लिए, 1996 में अमरीका ने भारत, पाकिस्तान और थाईलैंड से झींगा आयात पर प्रतिबंध लगा गया दिया था, वह भी इस आधार पर कि भारतीय मछुआरे अपनी नाओं में कछुए को अलग करने वाले उपकरण का उपयोग नहीं करते। अमरीका ने इस प्रतिबंद की पुष्टि करते हुए कहा कि वह दुर्लभ कछुओं की प्रजातियों को महासागर में संरक्षित करना चाहता है। विश्व व्यपार संगठन के एक विवाद पैनल ने इस प्रतिबंद को अनुचित बताया।

यह उस समय था जिस वक़्त मत्स्य पालन विभाग को अलग करने की आवश्यकता महसूस हो रही थी। उस समय कृषि मंत्रालय के सामने इसका प्रस्ताव भी रखा गया, पर वह खारिज कर दिया गया।

तब से एक अलग मत्स्य पालन विभाग की मांग दिन-ब-दिन बढ़ती गई, पर पूरी न हो पाई। इस मांग को पूरे होने में लगभग दो दशक लग गए, अब मत्स्य पालन का विभाग डेढ़ करोड़ मछुआरों की सेवा करेगा।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पहली ऐसी पार्टी है जिसने एक अलग विभाग बनाने का पक्ष रखा, जो छोटे और पारंपरिक मछुआरों की मदद कर सके। पहले के भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने देखा कि 60 प्रतिशत से ज़्यादा मछुआरे गरीबी की रेखा से नीचे हैं और पारंपरिक मछुआरे तो विभिन्न सरकारों से नज़र अंदाज़ किए गए हैं।

भारत में तीन करोड़ से ज़्यादा लोगों का मुख्य पेश मछली पकड़ना है और मछली पालन देश की घरेलू सकल उत्पाद में 0.7 प्रतिशत योगदान हर साल देता है। हालाँकि, ज़्यादा दिक्कतों का सामना करने वाले क्षेत्र का आवंटन हमेशा कम ही होता है।

हालाँकि, केंद्र की भाजपा सरकार को भी सामान्य नौकरशाही का सामना करना पड़ा था, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी आश्वासन दिया कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आई तो, वह भी मत्स्य-पालन के लिए अलग विभाग बनाएंगे। पर गांधी यह भूल गए कि उनकी ही पार्टी 10 साल तक इस प्रस्ताव पर काम नहीं कर पाई।

मत्स्य-पालन के लिए अलग विभाग क्यों ज़रूरी है?

बहुत से कारणों में से एक कारण यह है कि पहले मत्स्य-पालन कृषि मंत्रालय के अंतर्गत पशुपालन और डेरी विभाग का हिस्सा था, जिसे ऐसे कर्मचारी संभालते थे जिन्हें इस क्षेत्र का खास ज्ञान नही था। पशुपालन और डेरी विभाग का हिस्सा होने के कारण नीति निर्माताओं का ध्यान मछुआरों और मत्स्य-पालन पर नहीं गया।

मत्स्य पालन एक ऐसा विभाग है जिसे कोल्ड स्टोरेज, लैंडिंग पॉइंट और कोल्ड चेन सुविधा की अत्यधिक ज़रूरत है। पर अभी तक नीति निर्माताओं का इन पर बहुत कम ध्यान गया है।

इसके अलावा, महिलाओं का मत्स्य पालन में बशुत अहम भूमिका रहती है, खासकर सुखाने और सरंक्षण में। यह महिलाएँ मौसम और नौकरी की अनिश्चितता सहित विभिन्न खतरों के लिए सबसे अधिक असुरक्षित हैं। अब तक इस क्षेत्र पर ध्यान ना देना उनके लिए सबसे दुखद रहा है।

एक अलग विभाग का निर्माण मछुआरों के हितों के संरक्षण और विनियम जैसे उपायों के समन्वय को सुरक्षित करने में मदद कर सकता है।

पहले कच्चे माल से लेकर निर्यात की प्रोत्साहित राशि सभी दूसरे मंत्रालय के लोग संभालते थे। अब यह सभी काम एक ही विभाग संभालेगा और साथ ही समुद्री प्रदूषण और सम्भावित बाज़ार के अवसरों पर भी ध्यान दे पाएगा।

एक अलग विभाग क्षेत्र के लिए वित्त पोषण का भी ख्याल रखेगा। नई नाव खरीदने के लिए मछुआरों को ऋण लेने में दिक्कतें आती थी। यह अलग विभाग इन सभी मुद्दों को हल कर पाएगा।

हालाँकि, अभी भी समुदाय का एक वर्ग ऐसा है जो महसूस करता है कि एक अलग मंत्रालय, जैसा की भाजपा द्वारा ही उठाया गया है, इस क्षेत्र के लिए सही रामबाण है। चूँकि यह अंतरिम बजट था, इसलिए सरकार के हाथ बंधे हो सकते थे, और यह लोकसभा चुनाव के बाद आने वाली चीज़ों के आकार का एक संभावित संकेतक हो सकता है।

एमआर सुब्रमणि स्वराज्य के कार्यकारी संपादक हैं। वे @mrsubramani द्वारा ट्वीट करते हैं।