अर्थव्यवस्था
क्या मोदी की सर्वत्र सफल राजनीति को मज़बूत अर्थशास्त्र का समर्थन है ?
Narendra Modi

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व काल को तीन साल पूरे हो चुके हैं, इस बीच उनकी राजनीति शानदार रही है। जहाँ तक मज़बूत प्रधानमंत्री की बात है तो भारत के प्रधानमंत्रियों में जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गाँधी के बाद वो भारत के सबसे मज़बूत प्रधानमंत्री बनकर उभरे हैं। दिल्ली और बिहार में दो ठोकरें खाने के उपरान्त, उन्होंने अपनी राजनीति में सुधार किया और वह वोटबैंक की कसौटी पर तो खरी उतरी है, जैसाकि हमने हाल के उत्तर प्रदेश चुनावों में देखा।

लेकिन उनके अर्थशास्त्र के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। जबकि आधिकारिक घरेलू उत्पाद संख्या (जी.डी.पी.) भारत को दुनिया की सबसे तेज़ बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक बताती है, अंतर्निहित समस्याओं के सन्दर्भ में—भारी बुरे ऋण, कॉर्पोरेट मुनाफ़े में कमज़ोर वृद्धि, निवेश का घाटा कम होना और ख़पत में कमी की कहानी—हालात बद से बदतर हो रहे हैं।

नहीं, नया जी.डी.पी. डेटा ग़लत नहीं है, वो केवल आर्थिक गतिविधियों को मापने के एक अलग तरीक़े का नतीजा है। जैसेकि ब्रिटिश प्रणाली से नापने के बजाय मीट्रिक सिस्टम से नापने पर दिल्ली की मुम्बई से दूरी बढ़ नहीं जाती, वैसे ही जीडीपी की गणना करने की विधि में बदलाव का ये मतलब नहीं है कि देश पहले की तुलना में काफ़ी तेज़ी से बढ़ रहा है।

आज की आर्थिक नीतियों को देखते हुए कहा जा सकता है, आर्थिक वृद्धि को पुनर्जीवित 2019 तक भी मुश्किल ही है।

जबकि विकास की वैश्विक रफ़्तार से भी कोई ज़्यादा मदद नहीं मिलती, वृद्धि के सजीव न होने के मुख्य कारण हैं मोदी सरकार की आर्थिक नीतियाँ। अगर तीन साल बाद भी आप राष्ट्रीयकृत बैंकों की समस्यायों के कोई समाधान नहीं ढूंढें गए हैं तो निवेश बढ़े भी तो कैसे ? हालाँकि निवेश में आये घाटे को आंशिक रूप से भरने के लिए सार्वजनिक निवेश में वृद्धि हुई है, लेकिन ये निजी व्यवसायों की शक्ति को पुनर्जीवित करने का काम तो क़तई नहीं कर सकती।

कुछ अन्य आलोचकों के अनुसार, मोदी सरकार आर्थिक सुधारों से बचने की कोशिश कर रही है, लेकिन मेरी समस्या इसके बिल्कुल उलट है। प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के माध्यम से सरकार ने सब्सिडी में होने वाले लीकेज को रोकने के लिए सबसे बड़ा सुधार किया है। इसने कई घोटालों को साफ़ कर दिया है, जो संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन का पीछा करते रहे, जोकि कोयला और स्पेक्ट्रम सहित प्राकृतिक संसाधनों को बेचने के लिए नीलामी को ही एक मात्र रास्ता मानकर उससे चिपकी रही। इस सरकार ने भले ही अस्थायी रूप से ही-लेकिन यूडीएवाय (उदय) की योजना अपनाकर बिजली क्षेत्र की समस्याओं का हल निकाल लिया है। इसने दिवालियापन कोड लागू किया है, हालाँकि अभी क़ानून और कार्यान्वयन में इसका परीक्षण किया जाना है। ई-गवर्नेंस के माध्यम से डिजिटल नकदी और पारदर्शिता पर इसका ज़ोर सही दिशा में है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात है भारतीय इतिहास में सबसे बड़ा कर सुधार – गुड्स एंड सर्विसेज़ टैक्स। यह सब हासिल किया गया है जबकि उचित मूल्य स्थिरता और राजकोषीय विवेकपूर्णता को बरक़रार रखा गया। यह इस सरकार के आर्थिक प्रबन्धन कौशल के कारण ही सम्भव हो पाया है।

इसलिए सुधार के लिए उत्साह में कमी या ख़राब राजकोषीय प्रबंधन मोदी सरकार की आलोचना के लिए सही तरीक़ा नहीं हैं। इसके बजाय यह कहना उचित होगा की यह वूडू अर्थशास्त्र है, जो जनता की नैतिकता के प्रति उच्च प्रतिबद्धता और ग़रीबी पर देखने लायक़ प्रभाव बनाने के लिए राज्य संसाधनों और सम्पत्ति का उपयोग करने की राजनीतिक ज़रूरत से प्रेरित है। ये मोदी के राजनीतिक कवच में छेद का काम कर रहे हैं।

काले धन से घृणा ठीक है, टैक्स चोरी करने वालों का पता लगाने और दोषियों को दण्डित करने का प्रयास अच्छा है, और करदाताओं का पैसा ग़रीबों पर ख़र्च करना कभी चलन से बाहर नहीं हो सकता। इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश हमेशा उचित होता है, बशर्ते ट्रॉफी परियोजनाओं में अक्षमता से इसका उपयोग न किया जा रहा हो, जोकि कोई सकारात्मक बाह्य उत्पादन नहीं करते हैं। राष्ट्रीयकृत बैंको का उपयोग करके स्वरोज़गार के लिए ऋण देने या जनधन वित्तीय समावेशन ख़ातों से दीर्घकालीन परिणाम हो सकते हैं, जबकि कोयला ब्लॉक नीलामी से पारदर्शिता और बेहतर राजस्व सुनिश्चित होते हैं। लेकिन मोदी सरकार के अपना स्थान बनाने के प्रयासों में एक महत्त्वपूर्ण “लेकिन” है।

ये सभी प्रयास अंततः विफल हो जायेंगे अगर मज़बूत अर्थशास्त्र की मदद से इन्हें समर्थन न दिया गया। विचार करने लायक़ बिंदु है:

1. बढ़ती क़ीमतों पर स्पेक्ट्रम की नीलामी राजस्व के लिए अच्छी हो सकती है लेकिन ये सोने का अंडा देने वाली मुर्ग़ी को मारने जैसा होगा। रिज़र्व बैंक ने पहले ही दूरसंचार ऋणों में संकट की सम्भावना पर लाल झंडी दिखायी है और बैंकों को ऐसी स्थिति में और अधिक धन उपलब्ध कराने को कहा है।

2. चूँकि सरकारी बैंक टेलीकॉम स्पेक्ट्रम ख़रीद (कोयला ख़ानों के अलावा) को बैंक ऋण द्वारा समर्थन दे रहे हैं तो इसका मतलब ये है कि सरकारी ख़ज़ाने में आ रहा रेवेन्यू आंशिक रूप से अपने बैंकों द्वारा दिये गये ऋण हैं। और अगर बैंकों को पुनर्पूंजीकरण की आवश्यकता है, तो इसका मतलब है कि कुछ स्पेक्ट्रम वापिस बैंकों को फ़ंडिंग के लिए देने होंगे और बैंक टेलीकॉम को फंडिंग देंगे … आप इसका मतलब समझ गये होंगे। कहानी का सबक ये है कि सरकार को राजस्व अंततः टेलीकॉम से होने वाले लाभ और ग्राहकों की स्वस्थ प्रगति से ही मिलेगा, यानी मध्यावधि में उद्योगों को व्यवहार्य होना चाहिए। इसलिए सरकार को स्पेक्ट्रम या स्पेक्ट्रम शेअरिंग से कितना कमाया जाता है, इस बारे में सरकार को अधिक लोभी नहीं होना चाहिए।

टेलीकॉम का ख़राब अर्थशास्त्र कभी भी सरकार को उच्च राजस्व नहीं दे सकता। स्पेक्ट्रम की आधार क़ीमत को स्पष्टतः अधिक उचित होना चाहिए, और जहाँ नीलामी प्रणाली में कुछ भी ग़लत नहीं है, परन्तु अगर इसके परिणामस्वरूप निजी हाथों से सरकार के हाथ में आय आती है तो परिणाम शून्य होगा। सरकार को आज स्पेक्ट्रम से जो भी आय होती है, भविष्य में टेलीकॉम और बैंक्स को बचाने में वो सब खप जाएगा। और याद रखने लायक़ बात तो ये है, कि सरकार हमेशा निजी कम्पनियों की तुलना में अपने पैसे ख़र्च करने में कम कुशल होती है।

3. मोदी सरकार काले धन पर अपनी नैतिक भूमिका में अति कर रही है। कालाधन केवल करदाताओं का छिपा हुआ पैसा है। आर्थिक प्रभाव के नज़रिये ये कोई ख़तरनाक तरह का धन नहीं है। विचार करें, कि मोदी सरकार ने अब तक क्या किया। 2015 की विदेशी सम्पत्ति धारकों को अपनी विदेशी सम्पत्ति कर अधिकारियों के लिए घोषित करने की योजना अपनी कर की दर (60 प्रतिशत कर भुगतान) के कारण असफल साबित हुई। घरेलू काले धन की योजना (2016 आय घोषणा या आईडीएस-1) बेहतर साबित हुई क्योंकि यहाँ कर की दरें 50 प्रतिशत ही रखी गईं। साथ ही काले धन के घरेलू जमाकर्ताओं को ये पता था कि भारतीय न्यायक्षेत्र में क़ानून के लम्बे हाथों से बच पाना मुश्किल होगा। लेकिन तीसरी काले धन की योजना का सपना विमुद्रीकरण के बीच में ही देख लिया गया।यह थी प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण योजना और इसने काले धन की घोषणा करने वालों पर एक बार फिर प्रहार किया गया। 50 प्रतिशत कर (आईडीएस-2) के अतिरिक्त, उन्हें 25 प्रतिशत राशि को चार साल की ब्याज मुक्त राशि के रूप में जमा करने को कहा गया। इससे प्रभावी कर की दर अगर ज़्यादा नहीं तो, असफल विदेशी सम्पत्ति घोषणा योजना जितनी ही बढ़ गयी। यह अनुचित अर्थशास्त्र है। आपको घोषणा करने वालों को लूटने से ज़्यादा राजस्व नहीं मिल जाता, चाहे उनका पैसा कितना ही बुरी तरह से क्यों न इकठ्ठा किया गया हो। कोई आश्चर्य नहीं कि आईडीएस-2 भी असफल हो गयी

कहानी से मिलने वाली शिक्षा ये है कि जब कर और प्रतिशोध की नीति पूरी तरह से नैतिकता से प्रेरित होती है, वहाँ कर चोरी करने वाले अगर अपनी ग़लती मानते भी हैं तो इसके लिए उन्हें इतना कर भरना पड़ेगा कि आँखें बाहर आ जायें। यह धारणा राजनीति के लिए तो अच्छी है, लेकिन बहुत ख़राब अर्थशास्त्र।

इस लेखक का मानना है कि अगर मोदी ने सामान्य कर दरों से सिर्फ़ दस प्रतिशत ज़्यादा जुर्माना लगाया होता तो उनका ख़ज़ाना घोषणाओं से भर जाता। अकेले इन योजनाओं से आय-घोषणाओं के रूप में 300,000-400,000 करोड़ रुपये आये होंगे, जिसमें  45 फ़ीसदी कर-राजस्व होगा। भारतीय किसी भी अन्य व्यक्ति की अपेक्षा ज़्यादा कर से नहीं भागना चाहते। लेकिन सिर्फ़ नैतिकता के लिए कर छुपाने वालों से कर की वसूली तो उन्हें वापिस उनकी अवैध गुफ़ाओं में भेज देगी। ये बुरा और बहुत बुरा अर्थशास्त्र है।

बेनामी सम्पत्तियों पर नये क़ानून का भी यही हाल होना लिखा है। मोदी सरकार के पास बेनामी सम्पत्ति को पर्दे से बाहर लाने के आर्थिक तौर पर दो ही तरीक़े हो सकते हैं, जिनमें से एक है – आईडीएस 1 की तरह घोषित सम्पत्ति पर बाज़ार मूल्य का 40 प्रतिशत कर लगाने की योजना। इससे बहुत अधिक लोग तो सम्पत्ति की घोषणा के लिए प्रेरित नहीं होते लेकिन कुछ छोटे अपराधी ज़रूर अपनी बेनामी सम्पत्तियों पर भुगतान करके उन्हें नियमित करने के लिए प्रेरित होते।

बेहतर होगा कि बेनामी सम्पत्तियों को अलाभकारी बना दिया जाय। ये करने का एकमात्र रास्ता है भूमि की आपूर्ति को बड़ी मात्रा में बढ़ाया जाये। शहरी क्षेत्रों में वर्टिकल स्ट्रक्चर के लिए और ऊँचाई की अनुमति देना – और रेलवे, सार्वजनिक क्षेत्रों की कम्पनियों, बैंकों और सरकारी विभागों के क़ब्ज़े वाली ज़मीनों का मुद्रीकरण करके। सरकारी क़ब्ज़े वाली ज़मीनों को निर्माण कार्य के लिए वाजिब क़ीमतों पर दिया जाना (सौ वर्षों के किराये पर ऊँची दर पर) जिससे शहरी क्षेत्रों में सम्पत्तियों के दाम बड़ी तेज़ी से नीचे आ जायेंगे।

सम्पत्तियों की क़ीमतें गिरने से कुछ अस्थायी समस्यायें पैदा हो सकती हैं – जैसे, कुछ रिअल्टर्स दिवालिये हो जायेंगे, बैंक अपने पहले से ही चल रहे कोलैटरल के बारे में चिंतित हो जायेंगे, लेकिन इसके परिणामस्वरूप घर बनाने सहित, निवेश में जो वृद्धि होगी वो न केवल बाज़ार को बढ़ायेगी, बल्कि लाखों वैध नौकरियाँ पैदा होंगी, साथ ही बढ़ते हुए मध्यम वर्ग में भी उपभोग बढ़ेगा। याद रखने योग्य बात यह भी है, कि सामान्य घर ख़रीदने वाले लोग प्रायः अपने वेतन और नियमित आय से ही सम्पत्ति ख़रीदते हैं।

ज़मीनों की क़ीमत नीचे लाने और ज़मीनों को नेताओं और बदमाशों की लूटपाट से बचाने के लिए अच्छे अर्थशास्त्र की ज़रूरत है। बहुत कठोर क़ानून लाकर बेनामी सम्पत्ति के लिए प्रतिशोध लेकर नहीं, बल्कि ज़मीनों की आपूर्ति बढ़ाकर ज़मीनों की क़ीमतें कम की जा सकें तो नौकरियों और विकास का एक बड़ा मौका भारत के इंतज़ार में होगा।

अच्छे अर्थशास्त्र के लिए तीन बिन्दुओं का सहारा लिया जा सकता है, ये हैं:

एक, कर संग्रह की दक्षता या कर चोरी का उन्मूलन करने वाली नीतियों के बजाय, कर नीतियाँ विकास को बढ़ावा देने वाली हों।

दूसरा, मज़बूत विकास, प्रतियोगिता को बढ़ावा देने और किराये की परम्परा को नष्ट करने से ही प्राप्त होता है। ऊँची क़ीमतों वाली नीलामी से दुर्लभ संसाधनों के दायरे में निजी किराये को तो ख़त्म किया जा सकता है, लेकिन इस किराये को सरकारी जेब में पहुँचाने से कोई दीर्घकालिक फ़ायदा नहीं होगा। किराया किराया है, और एक अर्थव्यवस्था में किराये की माँग के अवसर जितने कम होंगे ये उतनी ही नयी और जीवंत होगी। ध्यान देने लायक़ बात है, 2010-11 में प्रणब मुकर्जी ने स्पेक्ट्रम नीलामियों से 106,000 करोड़ रुपये से भी अधिक कमाई की और तेल सब्सिडी में उसी समय ये सब उड़ा दिया। राजस्व ख़ज़ाने में इस वृद्धि से न तो विकास में कोई प्रगति हुई और न ही यूपीए का चुनावी भाग्योदय ही हुआ। बल्कि 2013-14 में चुनावों के ठीक पहले तेल की क़ीमतों में वृद्धि ने आग में घी का ही काम किया।

तीन, सरकार के व्यापार करने की कोई वजह नहीं है। यहाँ तक कि अगर किसी ऐतिहासिक दुर्घटनावश सरकार कुछ व्यापारों में फँस भी गई हो, तो अंततः इसे इन व्यापारों से सप्रयास बाहर निकल ही जाना चाहिए। कुछ उद्योगों को छोड़कर, जोकि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं, सरकार को निजी क्षेत्रों के साथ किसी भी व्यापार में प्रतिस्पर्धा नहीं करनी चाहिए। यह न केवल सिद्धांततः ग़लत है, बल्कि महँगा भी है। जैसा कि हमने एअर इंडिया, बीएसएनएल/एमटीएनएल, और कई ‘सफ़ेद हाथी’ के उदाहरण में देखा और जिन्हें अब तक हमने सिर्फ़ वित्तीय क्षेत्रों में चराया ही है। यह सफ़ेद हाथी राष्ट्रीयकृत बैंक हैं। मोदी की सबसे बड़ी चुनौती इन्हें उस समय बेचना है, जबकि उनके शाख़ा नेटवर्क, ग्राहक आधार और भौगोलिक पहुँच में कुछ मूल्य बचा है। अगर वह बैंकों का निजीकरण नहीं करते हैं, तो उनकी अपनी डिजिटल नकदी योजना उन्हें पूरी तरह डुबो देगी। डिजिटल लेनदेन की दुनिया में, आपको बड़ी शाखा, एटीएम और क्रेडिट कार्ड नेटवर्क वाले बैंकों की ज़रूरत नहीं है। आपको केवल ग्राहकों की ज़रूरत है, फ़िलहाल, एक बड़ी तादाद में ग्राहक राष्ट्रीयकृत बैंकों से भाग रहे हैं।

हालाँकि कुछ लोगों का मानना है कि सरकारों का कुछ व्यापारों जैसे बुनियादी ढाँचा, स्कूल और अस्पताल जैसे व्यवसायों में शामिल होना ठीक है, यहाँ एक ही सवाल है- अगर सरकार एयर इंडिया की तरह एक साधारण व्यावसायिक उद्यम भी नहीं चला सकती है, तो फिर स्कूल या अस्पताल जैसे सामाजिक क्षेत्रों के उद्यम कैसे चला सकती है जहाँ परिणाम की गणना लगभग असम्भव है ? इसका जवाब देने के लिए केवल एक ही चीज़ देखने लायक़ है कि सरकार के स्वामित्व वाले स्कूलों और अस्पतालों को कैसे चलाया जा रहा है (ग़रीब भी अगर बच सकें तो वहाँ नहीं जाना चाहते हैं)।

सरकार का काम स्कूलों और अस्पताओं को बनाने का काम आसान करना है, उन्हें चलाना नहीं। निजी स्कूलों और अस्पतालों को सरकार द्वारा प्रत्यक्ष निवेश के बजाय उचित लागत पर फ़ंड के लिए नीतियों की आवश्यकता है। बहुत सामान्य सा नियम है: सरकार को केवल उन्हीं क्षेत्रों में प्रवेश करना चाहिए जहाँ जाने से सामान्य व्यवसायियों को भय लगता है। भय ख़त्म होने के बाद सरकार को बाहर निकल जाना चाहिए।

अंतिम बात: यदि मोदी सरकार अच्छे अर्थशास्त्र को दाँव पर लगाकर भलाई की राजनीति करना चाहती है तो, इस सरकार की आर्थिक विफलता तय है। वह 2019 का चुनाव जीत सकते हैं, क्योंकि राजनीतिक सफलता और अच्छे अर्थशास्त्र के बीच के सम्बन्ध को इतने समय में नहीं आँका जा सकता। लेकिन उन्हें अपने दूसरे कार्यकाल मेें समस्याओं के पहाड़ से निपटना होगा, जो अन्यथा उनके सामने नहीं होना चाहिए।