अर्थव्यवस्था
नोटबंदी की विफलता से क्या सबक मिला?

प्रसंग
  • यह मानते हुए कि सारे प्रयास किए जाने चाहिए थे यह समझना ज़्यादा जरूरी है कि नोटबन्दी क्यों विफल रही और यह कैसे अच्छा कर सकती थी

भारतीय रिजर्व बैंक ने इस सप्ताह वर्ष 2017-18 के लिए आपनी सालाना रिपोर्ट जारी कर दी है इससे नोटबंदी को लेकर की जाने वाले बहसें फिर से शुरू हो गई हैं, रिपोर्ट में कहा गया है कि 8 नवंबर 2016 को घोषित नोटबंदी के तहत 15.31 लाख करोड़ रुपये मूल्य के 500 और 1000 रुपये के नोट चलन में वापस आ गए हैं। नोटबंदी के समय सिस्टम में 500 और 1000 रुपये के 15.41 लाख करोड़ रुपये थे।

यह देखना बहुत मुश्किल है कि पिछली सालाना रिपोर्ट (2016-17) में जो खुलासा किया गया था उससे यह संख्या काफी अलग है। उस रिपोर्ट में यह कीमत 15.28 लाख करोड़ रूप ये बताई गई थी। 0.03 लाख करोड़ रूपये का अंतर इसमें कोई बड़ी बात नहीं, यह वह धन भी हो सकता था जिसे अभी तक गिना ही न गया हो या गलती से छूट गया हो।

भले ही नोटबंदी के फायदे और नुकसान को लेकर की जाने वाली नई बहस के बारे में ज्यादा कुछ पता न हो लेकिन फिर भी हमें इस पर एक नजर डालनी चाहिए। हमें नोटबंदी के तर्कों पर ध्यान न देकर इसके नतीजों पर गौर करना चाहिए साथ ही इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि क्या यह लक्ष्य हाथ से निकल जाने के बाद (अर्थव्यवस्था में नकदी की कमी होना) भी नोटबन्दी को अच्छा बताया जा सकता है।

8 नवंबर 2016 को काले धन के जखीरे को कम करने, जाली नोटों को रोकने और आतंकवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने के इरादे से जब नोटबंदी की घोषणा की गई थी, इसमें दो और लक्ष्यों को जोड़ दिया गया था। नवंबर 2016 में वापसी के  लिए जमा होने वाले प्रतिबंधित नोट आधिकारिक उम्मीदों पर खरे उतरे। पहला लक्ष्य, भुगतान के डिजिटल तरीकों के प्रचार और प्रसार के माध्यम से कम नकदी वाली अर्थव्यवस्था को प्राप्त करना और दूसरा लक्ष्य इस बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त करना था कि किसके पास कितना धन है।

अप्रत्यक्ष रूप से यह सुझाव दिया गया था कि नोटबंदी के राजनीतिक उद्देश्य में सिस्टम के बाहर प्रतिबंधित नोटों, जिसने रिजर्व बैंक की देनदारियों को कम किया होगा और सरकार को विशेष लाभांश के रूप में इसका भुगतान किया होगा, के बड़े हिस्से को लपेटना शामिल था। बदले में, नरेंद्र मोदी सरकार ने इस दावे को स्वीकार किया होगा कि उसने अमीरों के काले धन को जब्त करके किसी न किसी रूप में गरीबों मे बाँट दिया। लेकिन सिस्टम में 99.3 प्रतिशत नोट वापसी के साथ यह स्पष्ट है कि यह उद्देश्य 99.3 प्रतिशत विफल था, हालांकि इसको खुले तौर पर कभी कहा नहीं गया ।

यह बतलाने के लिए कोई स्पष्ट संख्या नहीं है कि उपद्रवी घटनाओं को बढ़ावा  देने के लिए आने वाला पैसा काफी प्रभावित हुआ था, लेकिन यह संभावना से परे है कि इतने कम समय में कुछ प्रभाव पड़ा होगा। जाली नोटों के लिए, रिज़र्व बैंक की नवीनतम वार्षिक रिपोर्ट यह बताती है (तालिका VIII.8 देखें) कि उल्लेखनीय गिरावट (31 प्रतिशत से अधिक) के साथ, यह कुछ हद तक उद्देश्यों की पूर्ति कर पाया, लेकिन इसके लिए बड़ी कीमत चुकानी पड़ी।

बड़े पैमाने पर यह बात साफ जाहिर है कि लागत ने लाभ से अधिक मुनाफा कमाया। लागत कुछ तिमाहियों में आर्थिक व्यवधान और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का घाटा थी ऐसे व्यवसायों और उन लोगों के लिए जो नकद अर्थव्यवस्था, विशेष रूप से कृषि, अचल संपत्ति, भवन-निर्माण और अनौपचारिक क्षेत्र का हिस्सा थे, की आय का घाटा थी। केंद्रीय बैंक के लिए उच्च मुद्रा मुद्रण लागत और आर्थिक गतिविधि के रूप में सरकार को राजस्व का घाटा और रिजर्व बैंक द्वारा अपने लाभांश में की जाने वाले कटौती। जब सिस्टम और वसूलियों में बुरे ऋण को पहचानने की बड़ी समस्या को संबोधित करने के बजाय पुराने नोटों की अदला-बदली को प्रबंधन में स्थानांतरित कर दिया गया, तो उन महीनों में बैंकिग प्रणाली को लाभ पर घाटे का सामना करना पड़ा था, इत्यादि।

अब तक दावा किए गए लाभ में कर अनुपालन और राजस्व में वृद्धि, निरपेक्ष संदर्भ में उच्च डिजिटलीकरण स्तर इत्यादि रहे। लेकिन समस्या यह है कि हम स्पष्ट रूप से यह नहीं बता सकते कि ये लाभ नोटबंदी के कारण था, क्योंकि वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) को 1 जुलाई 2017 से काफी प्रोत्साहन मिला। आगे बढ़ते हुए, काले धन और कर अनुपालन को समाप्त करने में अधिकांश लाभ जीएसटी के और अर्थव्यवस्था के बढ़ते औपचारिकरण के कारण होगा,  नोटबंदी के कारण नहीं। रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अधिनियम अचल संपत्ति क्षेत्र के बड़े हिस्सों में वही अनुशासन ला रहा है, जो काले धन का बड़ा उत्पादक है।

वे कंपनियां, विशेष रूप से बैंकों और वित्तीय प्रौद्योगिकी कंपनियां, जिन्होंने डिजिटलीकरण में हुए तीव्र बदलाव का अल्पावधि में अत्यधिक लाभ उठाया, (जिसका सबसे बड़ा उदाहरण पेटीएम है) और इसके अलावा पेट्रोल बंक्स, बिजली कंपनियों और नगर पालिका अधिकारियों ने भी ऐसे ही इसका लाभ उठाया, क्योंकि उन्हें 8 नवंबर के बाद पुरानी नकदी में भुगतान स्वीकार करने के लिए की एक सॉर्ट विंडो मिल गई। यह एक ऐसी विंडो थी जिसका उपयोग करके कई धारकों ने अपने अवैध और काले धन के एक बड़े हिस्से का निपटान किया। इस साल और पिछले साल के अंत में यह प्रक्रिया शुरू होने से पहले बैंकों में पैसों के भारी प्रवाह को देखते हुए 2017 में उधारकर्ताओं के लिए ब्याज लागत कम कर दी गई थी। राजकोष आय से बैंकों को भी लाभ हुए, क्योंकि उच्च ब्याज ने उन्हें मोटा मुनाफा दिया।

विमुद्रीकरण से हुए गुप्त लाभ का दावा करना संभव है, जिसमें अक्सर सुनाई में आता है कि सिस्टम को एक जोरदार झटके की आवश्यकता होती थी; लेकिन एक बार झटका झेलने के बाद, नकदी की मांग को लेकर लोग सजग रहने लगे।

इंसानी प्रवर्ती है कि किसी चीज़ की कमी का डर उसके संग्रहण को बढ़ाता है।

जाहिर है, विमुद्रीकरण का लाभ कम समय के लिए था और इसकी लागत एक लंबे समय के लिए।

कोई भी लागत और लाभ दोनों के वास्तविक अनुमानों को आजमा कर काम कर सकता है। लेकिन यह कहने के लिए पर्याप्त है कि किसी भी चीज को रखने की कोशिश (जो हमेशा ही लड़े जाएंगे )करने से इस बात पर कोई फर्क नहीं पड़ता कि विमुद्रीकरण विफल रहा। यदि ऐसा नहीं था, तो मोदी सरकार अब तक इसके फायदे क्यों गिना रही है। विमुद्रीकरण के मुद्दे पर इसकी चुप्पी से यह पता चलता है कि लागत नहुत ज़्यादा है।

इस प्रकार, यह समझने योग्य है कि विमुद्रीकरण विफल क्यों रहा, और इसे कैसे बेहतर बनाया जा सकता था, या फिर यह मानते हुए कि यह मात्र एक प्रयास था (कोई भी भविष्य में किसी भी इस तरह का प्रयास नहीं करेगा)।

निष्पादन: अगर यह मान लिया जाए कि गोपिनीता को कायम रखने की वजह से बंद किए गए नोटों को बदलने के लिए पर्याप्त नोट नहीं छापे गए थे, लेकिन एकदम ऐसा करने की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि चलन में 86 प्रतिशत नोटों  को रातोंरात बंद कर दिया गया था। कम से कम, विमुद्रीकरण को दो चरणों में लागू किया जाना चाहिए था, पहला, 1000 के नोट को बंद करना और उसके दो महीने बाद जब यह सुनिश्चित हो जाता कि आर्थिक नुकसान कम हो गया है, तब 500 के नोट बंद करने चाहिए थे।

पारिस्थितिकी तंत्र: 2016 में, अधिक डिजिटलीकरण के लिए पारिस्थितिकी तंत्र अस्तित्व में नहीं था, हालांकि डिजिटल पेमेंट (या नकदी रहित तरीके से भुगतान) आरटीजीएस (रीयल-टाइम ग्रॉस सेटेलमेंट),एनईएफटी (नेशनल इलेक्ट्रॉनिक फंडट्रांसफर),आईएमपीएस (इमीडीएटपेमेंट सिस्टम) इंटरनेट और मोबाइल बैंकिंग, और ई-वॉलेट का उपयोग, धीरे-धीरे बढ़ रहा था। विमुद्रीकरण ने लोगों को कुछ समय के लिए भुगतान के इन तरीकों का उपयोग करने के लिए मजबूर किया, लेकिन  समस्या के समाप्त होने के बाद नकदी प्रणाली वापस प्रयोग में आ गयी। बैंक नोट 8 नवंबर 2016 (31 मार्च 2018 तक 18 लाख करोड़ रुपए आरबीआई की वार्षिक रिपोर्ट से तालिका VIII 1 देखें) से अब चलन में ज्यादा हैं। लोग पहले की तरह नकद जमा कर रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लोगों की सुरक्षा के लिए साइबर सुरक्षा तरीकों का उपयोग करना, खासकर उन लोगों के लिए जो कम पढ़े हैं, काफी नहीं होगा।

चुनावी सुधार:  चुनावी वित्त पोषण नकदी की बहुत अधिक मांग करता है। यह जगजाहिर है कि उम्मीदवार बड़े पैमाने पर, भारत के निर्वाचन आयोग के द्वारा निर्धारित अवास्तविक व्यय सीमाओं के भीतर रहने के लिए, मतदाताओं को “रिश्वत” देने और बूथ तक लाने के लिए अपने समर्थकों को नकद भुगतान करते हैं। इसका मतलब यह है कि जब तक चुनावी वित्त पोषण में सुधार नहीं किए जाते तब तक चुनावों के समय नकदी की मांग अधिक रहेगी। यह वही था कि हमने साल की शुरुआत में कर्नाटक विधानसभा चुनावों को होते देखा, जब आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों के सैकड़ों एटीएम की सारी नकदी गायब हो गई और उनके पैसे कुछ लोगों की जेब में चले गए। चुनावी वित्त पोषण में जब तक नकदी का चलन कम नहीं होगा, तब तक नकदी पर निर्भर अर्थव्यवस्था नहीं चल पाएगी।

काले धन को सफेद बनानाः जन धन खाते, जिनका उद्देश्य हर ग्रहस्थ को न्यूनतम बैलेंस बैंकिंग सुविधा प्रदान करना है, नोटबंदी के करीब दो साल पहले खोले गए थे। ऐसे कुछ खाते निष्क्रिय थे या उनमें बहुत कम ही लेन-देन हुआ था। लेकिन जब पुराने नोट निरस्त कर दिए गए, तब अतिरिक्त संपत्ति वाले लोगों ने बेनामी धारकों के खातों में अपने पैसे जमा करने के लिए उनके खातों का उपयोग किया और उनको उस जमा राशि का कमीशन दिया। सैद्धांतिक रूप से, अब जमा की गई बड़ी राशियों के विवरण के आधार पर पैसों को उनके असली मालिकों के पास वापस पहुँचाना संभव होना चाहिए। लेकिन दो कारणों से ऐसा नहीं किया जा सका: पहला, इससे गरीब आदमी को परेशान होना पड़ता; और दूसरा, डर बनाए रखे बिना ऐसे खातों की पड़ताल करने की क्षमता कर विभाग के पास नहीं थी। इस प्रकार जन धन योजना ने टैक्स में टालमटोल करने वालों को बचा लिया और इस सौदे में गरीबों को भी कुछ कमीशन दिलाया। प्रारंभिक महीनों में नोटबंदी के लिए लोकप्रिय समर्थन आंशिक रूप से इस तथ्य से समझाया गया है कि गरीब, जो बैंकों के बाहर लंबी लाइन में लगकर परेशान हुआ, ने अमीर को भी किसी न किसी तरह अपने काले धन को सफेद करने के चक्कर में दौड़-धूप करते हुए देखा। गरीब परेशान हुआ लेकिन उसने अपनी आंखे के सामने ही ‘धन्ना सेठ’ को भी रोते हुए देखा। गरीब को आत्म-संतुष्टि भी मिली।

स्पष्ट रूप से, नोटबंदी के उद्देश्यों को न्यायोचित ठहराया जा सकता है, लेकिन यह सब कुछ अलग तरीकों से भी किया जा सकता था। ये तरीके निम्नलिखित हैं-

पहला, कैशलेस अर्थव्यवस्था उपयुक्त है, लेकिन इससे पहले शक्तिशाली साइबर सुरक्षा और गोपनीयता कानून की व्यवस्था की जानी चाहिए, और डिजिटलीकरण का प्रयास भौगोलिक रूप से शहर-दर-शहर और जिला-दर-जिला किया जाना चाहिए। यह केवल तभी होता है जब भौगोलिक पारिस्थितिक तंत्र में धनी, मध्यम वर्गीय और गरीब लोग एक-दूसरे के साथ डिजिटल रूप से लेन-देन करते हैं तो हम कैशलेस अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ सकते हैं। जब तक कि सभी को ऐसा नहीं लगता है कि वे कैशलेस व्यवस्था के साथ लेनदेन कर सकते हैं तब तक कैश या नकदी की माँग में महत्वपूर्ण कमी नहीं आ सकती। कार्ड या वॉलेट के माध्यम से भुगतान करने के रूप में पूरी तरह से ऐसा नहीं किया जा सकता। सभी मामलो में, खुदरा भुगतान की गैर-नकदी प्रणाली का विकास हो रहा है। 2015-16, 2016-17 (नोटबंदी वर्ष) और 2017-18 के बीच, एक वर्ष में खुदरा इलेक्ट्रॉनिक भुगतान 45 प्रतिशत बढ़ गया, और उसी अनुपात से अंतिम वित्तीय वर्ष में भी यह बढ़ा। खुदरा इलेक्ट्रॉनिक भुगतानों में एनईएफटी, आईएमपीएस, वॉलेट, यूपीआई भुगतान, इलेक्ट्रॉनिक बिल और ईएमआई डेबिट, और क्रेडिट तथा डेबिट कार्ड द्वारा भुगतान शामिल हैं (आरबीआई वार्षिक रिपोर्ट की तालिका IX.1 देखें)।

जहाँ वर्ष 2015-16 और 2017-18 के बीच चेक भुगतान 81-82 लाख करोड़ रुपये पर स्थिर हो गए थे, वहीं खुदरा इलेक्ट्रॉनिक भुगतान प्रभावी रूप से दोगुना होकर 193 लाख करोड़ रुपये हो गया – जो औपचारिक खुदरा भुगतान के सभी रूपों के दो तिहाई हिस्से के लिए जिम्मेदार है। इसमें नोटबंदी का भी योगदान हो सकता है, लेकिन गैर-नकद/डिजिटल भुगतान से व्यवस्था तेजी से सुविधाजनक हो गई है।

दूसरा, सभी के लिए छोटे मोटे लेनदेन के नकद भुगतान को कम करने के लिए सरकार को व्यवस्थित रूप से 500 तथा 2,000 रुपये के नोट (उनके लिए गैर कानूनी प्रस्ताव बनाए बिना) वापस लेने चाहिए और उनके स्थान पर 100, 200 और कम कीमतों के नोट छापने चाहिए। इसमें लागत शामिल होगी, क्योंकि एक दूसरी परेशानी से बचने के लिए इन ऊँची कीमत वाले नोटों के स्थान पर कम कीमत के नोटों की एक बड़ी मात्रा का निर्माण करना होगा। लेकिन लेनदेन, जिसमें पहले नकदी भुगतान और बिलों का बिना निजी भुगतान शामिल था, उसे में हतोत्साहित किया जाएगा।  कोई भी 100-200 के नोटों वाला पुलिंदा नहीं रखना चाहता।

तीसरा, अगर हम सिस्टम में नकदी को करना कम चाहते हैं तो निर्वाचक और कर सुधार महत्वपूर्ण हैं। व्यय की सीमा अधिक याथार्थवादी होनी चाहिए, राज्य द्वारा उम्मीदवारों को निधि देना चाहिए, और राजनीतिक दलों के कॉर्पोरेट वित्त पोषण को और अधिक पारदर्शी बनाया जाना चाहिए। जीएसटी और आयकर दरों को कम करने से छोटी कंपनियों और किरना स्टोरों को नकद लेनदेन में मदद मिलेगी।

चौथा, सरकार के हर स्तर पर कम से कम मंत्रियों और नौकरशाहों की विवेकपूर्ण शक्तियों का अनुमोदन, तथा सरकार और नागरिकों के बीच संपर्क होना चाहिए। इससे रिश्वत और नकद लेन-देन अपने आप खत्म हो जाएगा।

केवल नकद आपूर्ति को सीमित करना – जो विमुद्रीकरण ने किया – इससे ज्यादा समय तक नकदी की मांग में फर्क नहीं पड़ता। लंबी अवधि के लिए, आपको भी मांग से समझौता करना होगा। यह विमुद्रीकरण के विफल होने से यह एक बड़ा कारण है।

जगन्नाथ स्वराज के संपादकीय निदेशक हैं। वह @TheJaggi पर ट्वीट करते हैं।