अर्थव्यवस्था
एटीएम क्यों सूख रहे हैं: मुद्रा के नये चेहरे के रूप में गाँधी की जगह लेते अम्बेडकर
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नोटबंदी कुछ हिस्से तक ही सही लेकिन स्थायी है – मीडिया और सामान्य जनता को ये बात समझने में अभी भी मुश्किल हो रही है। पिछले कुछ समय से, अख़बारों और टी.वी. चैनलों की सुर्ख़ियों से बार-बार ये बात सामने लायी जा रही है, कि ए.टी.एम. में फिर सूखा पड़ गया है, लेकिन ताज्जुब की बात तो ये है कि उन्हें ये ख़याल कहाँ से आया कि 8 नवम्बर को विमुद्रीकृत किये गये सभी नोटों को नये नोटों से बदला जायेगा।

भारतीय नगद अर्थव्यवस्था अपनी पराकाष्ठा को कब का पार कर चुकी है, अब वर्तमान और भविष्य दोनों ही डिजिटल करेंसी में हैं। सरकार नोटों का उत्पादन सोच-समझकर कम कर रही है, ताकि दबाव में ही सही पर लोगों में डिजिटल लेन-देन का इस्तेमाल बढ़े। नये भारत में कम से कम नगद और अधिक से अधिक डिजिटल लेन-देन एक सामान्य बात होगी।

मीडिया के आश्चर्य से पता चलता है कि सरकार की घोषणाओं पर मीडिया का कितना कम ध्यान रहता है। दिसम्बर 2016 के मध्य में सरकार का उद्देश्य पूरी तरह से नगदी के मुद्रण और उसको बाज़ार में पहुँचाने पर था, ताकि अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का पतन रोका जा सके; तभी वित्त मंत्री अरुण जेटली ने साफ़-साफ़ कह दिया था कि सरकार का इरादा 15.44 लाख करोड़ रुपये की विमुद्रीकृत समस्त नगदी को दोबारा से पूरी तरह मुद्रित करने का क़तई नहीं है। सरकार चाहती थी कि नगद की एक ‘महत्त्वपूर्ण और पर्याप्त’ मात्रा डिजिटल कैश से बदल जाये। यही कारण है ए.टी.एम. में सूखा चल रहा है।

रिज़र्व बैंक से एक और संकेत तब मिला, जब मार्च में नगद निकासी की समस्त सीमाओं की समाप्ति की घोषणा के बाद, रिज़र्व बैंक ने नोटों की छपाई भी कम करना शुरू कर दी। साथ ही यह भी पता चला है कि नोटों की छपाई वाले प्रेस में भी छपाई का कई पारियों में और ओवरटाइम होने वाला काम अब कम समय में ख़त्म किया जाने लगा है, और एक बैंकर का कहना है, ‘मुद्रा उत्पादन में भारी गिरावट आई है। इससे पहले, अगर प्रेस प्रतिदिन सभी मूल्यवर्गाें के पन्द्रह करोड़ नोट्स छाप रहे थे तो अब ये संख्या केवल 11 करोड़ नोट्स तक गिर गई है। वहीं कर्मचारी भी नवम्बर, दिसम्बर और जनवरी के संकट के महीनों की तरह अब 12 घंटे की पारियों में काम नहीं कर रहे हैं।’

संक्षेप में, नगदी की ये हल्की कमी सोच समझकर की गई है, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों को छोड़कर बाक़ी जगहों पर ग़ैरनगद लेन-देन की प्रक्रिया को स्वीकार करने में ये एक तेज़ उत्प्रेरक का काम कर सके।

अम्बेडकर आधुनिक भारत की नई मुद्रा के रूप में गाँधी की जगह ले रहे हैं। बाबासाहेब का चेहरा कभी नोट का हिस्सा नहीं रहा, लेकिन भारत के नए डिजिटल पेमंट ऐप, भारत इंटरफ़ेस फॉर मनी, पर भीम लिखा हुआ है। इसलिए 14 अप्रेल को अम्बेडकर जयंती पर लगने वाले डिजि धन मेला की अध्यक्षता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अकारण ही नहीं करी।

छह महीने से भी कम के समय में, हम भारत के वित्तीय क्षेत्र में एक निर्णायक संरचनात्मक बदलाव की शुरुआत देख रहे हैं, जिसके व्यापक प्रभाव होंगे। ये बदलाव वित्त से जुड़े कई व्यवसायों को प्रभावित करेंगे।

#1 ए.टी.एम. विस्तार का युग समाप्त हो गया है। ए.टी.एम. एक्सटेंशन अब भविष्य के बैंकिंग विकास का हिस्सा नहीं होंगे, और भविष्य में ए.टी.एम. मोबाइल कैश डिलीवरी का काम करते नज़र आ सकते हैं, जिनका कार्यक्षेत्र ग्रामीण क्षेत्रों में केंद्रित होगा। लेकिन यहाँ भी विकास सीमित ही होगा। भविष्य में केवल ए.टी.एम. पर केंद्रित कम्पनियों का भविष्य हो सकता है, लेकिन सिर्फ़ इसलिए क्योंकि बैंक अपने मौजूदा नेटवर्क को आउटसोर्स करने की राह चुन सकते हैं, ताकि वे ख़ुद को डिजिटल व्यवसाय में विकसित करने पर ध्यान केंद्रित कर सकें।

#2 पत्राचार द्वारा कारोबार मेें थोड़े समय के लिए वृद्धि होगी, लेकिन जल्द ही ग्रामीण और बिना बैंक वाले क्षेत्रों में भी पैसों के हस्तांतरण के लिए डिजिटल कैश का इस्तेमाल शुरू होते ही इसका पतन होगा। लेकिन ग्रामीण या सुदूर इलाक़ों में डिजिटल कैश के इस्तेमाल की भी अपनी सीमायें होंगी क्योंकि सुदूर क्षेत्रों में बिजली की विश्वसनीय आपूर्ति की कमी तो है ही, साथ ही ग़रीबों तक मोबाइल फ़ोन्स की पहुँच भी अभी तक पूरी तरह सम्भव नहीं हो पायी है। अगले पाँच वर्षों में इन कमियों को दूर करने का प्रयास किया जायेगा।

#3 एक बार एटीएम और कैश की महत्ता गिरने लगेगी तो नगद रसद व्यापार भी मजबूरन ही लेकिन कम होने लगेगा। विमुद्रीकरण के ठीक बाद के कुछ सप्ताह की अच्छे प्रदर्शन के बाद ये पहले से ही मुश्किल में है।

#4 कई बैंकिंग सेवायें आउटसोर्स हो सकती हैं। एटीएम कम होने के साथ ही शाख़ाओं में भी कमी एक सामान्य बात होगी। बैंक एक बार ग्राहक अधिग्रहण के संचालन को आउटसोर्स कर सकते हैं और अपना ग्राहक आधार बढ़ाने के लिए ‘आधार’-आधारित ई-केवायसी का प्रयोग कर सकते हैं, जैसेकि कोटक महिंद्रा बैंक अपने 811 अकाउंट में करने की कोशिश कर रही है। नियमित और पेमंट दोनों तरह के बैंकों के लिए ई-केवायसी जल्द ही नये ग्राहकों को प्राप्त करने का मानक तरीक़ा बन जायेगा।

#5 साइबर सुरक्षा में एक उछाल आयेगा। जैसे ही डिजिटल नगदी सामान्य होती है, वित्तीय क्षेत्र की नौकरियों में असली विकास साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में होगा, क्योंकि डिजिटल मुद्रा प्रणाली में हैकिंग और धोखाधड़ी का ख़तरा ज़्यादा है। उदाहरण के लिए, एकीकृत भुगतान इंटरफ़ेस यू.पी.आई., जोकि मोबाइल फ़ोन नंबरों का इस्तेमाल करते हुए पिअर-टू-पिअर भुगतान की अनुमति देता है, ये ऐसे ठगों के लिए आसान शिकार हो सकता है जो सिमकार्ड आसानी से क्लोन कर सकते हैं। पहले भी इस तरह के ठग एटीम की मैग्नेटिक स्ट्रिप्स को क्लोन कर चुके हैं, इसके बार वो सिम को निशाना बनायेंगे, क्योंकि स्मार्टफ़ोन ही आपका मूल डिजिटल बैंकिंग इंटरफ़ेस होगा, फ़ोन के खोने पर आपको नुक़सान से बचाने वाली तकनीक़ों का उपयोग बहुत महत्त्वपूर्ण हो जायेगा।

#6 क्रेडिट कार्ड और अन्य भुगतान के तरीक़े भौतिक श्रेणी से बाहर निकलकर आभासी हो जायेंगे। भविष्य में आपके फ़ोन में क्रेडिट और डेबिट कार्ड एम्बेड किये जा सकेंगे, जैसा कि सैमसंग के नये पे प्रोडक्ट ने दिखाया है। सैमसंग पे किसी भी कार्ड को स्वाइप किये बग़ैर उँगलियों के निशान और पिन का उपयोग कर किसी भी व्यापारी नोड पर भुगतान करता है। कोटक की 811 ऐप आधारित बैंक अकाउंट सेवा में भी आभासी क्रेडिट कार्ड और स्कैन-ऐण्ड-पे के विकल्प उपलब्ध हैं। एक बार भारत क्यू.आर कोड व्यापारियों द्वारा व्यापक रूप से अपना लिया जाता है, तो विभिन्न बैंकों द्वारा अभी दिये गये क्रेडिट कार्ड की ही तरह ई-पर्स भी इस्तेमाल किये जा सकेंगे।

#7 ठगी और धोखाधड़ी का बीमा बड़ा व्यवसाय बन जायेगा। एक बार आपका मोबाइल फ़ोन आपका वॉलेट बन गया, तो आपको धोखाधड़ी की सम्भावना के खिलाफ़ ख़ुद को सुरक्षित करने के लिए बीमा ख़रीदना पड़ेगा। क्रेडिट कार्ड धोखाधड़ी बीमा भारत में अभी बहुत बड़ा व्यापार नहीं है, लेकिन डिजिटल कैश को कार्ड्स की अपेक्षा बेहतर इंश्योरेंस की ज़रूरत होती है।

#8 इन सभी में सबसे बड़ा व्यापार होगा डेटा एनैलिटिक्स। जैसे ही बैंक के चार्जेज़ और भुगतान उपयोग शुल्क विनियमन और अधिक मात्रा में उपयोग के कारण कम होते जाते हैं, बैंकों, आभासी बैंकों, कार्ड कम्पनियों और ई-वॉलेट्स, सभी को अपने ग्राहकों के डेटा से पैसे कमाने होंगे, जैसा कि ‘आधारमैन’ नंदन नीलकेणी ने बार-बार ज़ोर दिया है। इसका मतलब है कि वित्तीय कम्पनियों को अपने ग्राहकों की भुगतान और ख़र्च की आदतों को बेहतर समझना होगा।

#9 बैंक की नौकरियाँ घटेंगी, क्योंकि बुनियादी ढाँचे के मामले में बैंक खोखले होंगे, और कुछ नौकरियाँ आउटसोर्स होंगी। लेकिन वे तकनीक़ी काम के लिए ‘टेकीज़’ को ज़्यादा से ज़्यादा पैसे देंगी, क्योंकि तकनीक़ द्वारा बैंक का अधिग्रहण किया जा रहा है।

भारत अपने वित्तीय क्षेत्र में एक विशाल बदलाव के शिखर पर है। पुरानी निश्चिततायें समाप्त हो गयी हैं। नौकरियों का बाज़ार बदल रहा है।

नोटों पर गाँधी का आश्वस्ति भरा चेहरा, अपनी सारी निश्चितताओं के साथ, मोदी सरकार की डिजिटल करंसी के शुभंकर, अम्बेडकर के अपनी सारी रोमांचक अनिश्चितताओं भरे चेहरे के साथ बदला जायेगा।