अर्थव्यवस्था
मेक-इन-इंडिया को सफल होने के लिए क्या चाहिए?

प्रसंग
  • शोध कार्यों को बिक्री योग्य प्रौद्योगिकी में ले जाने के लिए वैज्ञानिक अलग-अलग काम नहीं कर सकते हैं। उद्योग और सरकार को गंभीर भागीदारों के रूप में सहयोजित होना चाहिए।

हाल के महीनों में मेक-इन-इंडिया के बारे में बहुत चर्चाएं हुई हैं। यह एक स्वागत नारा है जो शीर्ष से आया है और इसे कई नवप्रवर्तनकर्ताओं, शोधकर्ताओं और वैज्ञानिक / प्रौद्योगिकीविद् समुदाय द्वारा बल मिलने की संभावना है। अब यह अनुभूति है कि आखिरकार भारत में निर्माण के लिए कुछ उत्साह है, खासकर जब संदेश सत्ता के ऊंचे विभागों से आता है, जो जश्न मनाने का एक कारण है।

अंत में, अगला इंटेल, अगला सिस्को (या क्या मुझे हुवाई कहना चाहिए), या अगला माइक्रोसॉफ़्ट हो सकता है, जो हमारे बीच से आ सकता है। या ऐसा हमने सोचा था। हालांकि, वास्तविकता अलग है। मेक-इन-इंडिया या स्वदेशी, ये सिर्फ अच्छे नारे हैं लेकिन किसी भी प्रमुख प्रौद्योगिकी संचालित क्षेत्र में ऐसे नारे को लागू करना मुश्किल अभ्यास है। आइये समझते हैं क्यों?

उद्योग के लिए अनुसंधान और विकास

किसी भी मेक-इन-द-कंट्री विकल्प का पहला कदम मजबूत अनुसंधान और विकास (आरएंडडी) से निपटना है। हमारे पास दुनिया के कुछ सबसे तीव्रबुद्धि वैज्ञानिक हैं जो यहाँ हमारी सरकारी प्रयोगशालाओं में, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान में, भारतीय विज्ञान संस्थान में और अन्य संस्थानों में बैठे हुए हैं और हम नियमित रूप से अत्याधुनिक शोध करते हैं, जो कि अक्सर हमारे पश्चिमी समकक्षों से तुलनीय होता है।

हालांकि, इन शोधों में बहुत सारे शोध उद्योग से इतर हैं। और, उद्योग बड़े पैमाने पर इसके लिए जिम्मेदार है – वे अल्पकालिक सोचना चाहते हैं, सुरक्षित रहना चाहते हैं और हानिकारक प्रौद्योगिकियों का जोखिम उठाने के बजाय तिमाही व्यापार नवाचार पर ध्यान केन्द्रित करना चाहते हैं।

उद्योग इस शोध का उपयोग नहीं करना चाहता, भले ही इस शोध को लगभग उत्पादक बना दिया गया हो। छोटे और मध्यम उद्यम (एसएमई) कभी-कभी इसका उपयोग कर सकते हैं लेकिन उनके स्तर से वैश्विक प्रभाव नहीं पड़ता है। बड़े उद्यमों में एक ठेठ व्यापार मानसिकता होती है – वे कोई जोखिम नहीं लेना चाहते हैं। विनिर्माण आसान है – किसी ने पहले से मेहनत करी होगी।

विकास करना मुश्किल है, लेकिन इसमें प्रतिफल ज्यादा है। क्रोनिज़्म (प्रिय परंतु अयोग्य व्यक्तियों की नियुक्ति) यह सुनिश्चित करता है कि बड़े उद्यम जो व्यापार इकाइयां हैं, छोटी अनुसंधान एवं विकास उन्मुख इकाइयों से प्रतिस्पर्धा से सफलतापूर्वक बच सकते हैं। इस व्यापार केंद्रित दृष्टिकोण का नतीजा यह है कि उद्योग प्रयोगशालाओं से रेडीमेड आरएंडडी को आत्मसात नहीं करता है। न तो इस आरएंडडी के लिए कोई आवश्यकता महसूस की गयी है और न ही उत्पाद स्टार्टअप्स की इक्विटि-फंडिंग के लिए कोई पारिस्थितिक तंत्र है। भारत में उद्यम समुदाय अविकसित है, इसका ध्यान सेवाओं पर केन्द्रित है और बाज़ार में उत्पादों पर ज़ोर देने के बजाय ब्रोकर जैसे बड़े उद्यमों के समुदाय में रूचि रखता है। भारत में आरएंडडी वैज्ञानिक उत्पादों और प्रौद्योगिकी के साथ व्यापार समुदाय में पैठ बनाने के रास्ते तलाशते-तलाशते थक जाएंगे।

ऐसे में ये वैज्ञानिक बेसिक रिसर्च को अपनाना ज्यादा उचित समझते हैं और यह रिसर्च संभावित रूप से बेहद स्व-पुरुस्कृत करने वाली हो सकती है लेकिन इसका उत्पाद और प्रौद्योगिकी से कोई नाता नहीं होता। समाज और डिसीज़न मेकर्स इस नाते के न होने के कारण को समझने और आरएंडडी के स्थानीय उपयोग के माध्यम से मदद करने के बजाय वैज्ञानिक कम-काज और पेशे का तिरस्कार करते हैं और उपहास उड़ाते हैं।

सरकार

यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि किसी भी देश में सरकार सबसे बड़े उपभोक्ताओं में से एक होती है। अमेरिका में अधिकांश प्रमुख प्रौद्योगिकियां डीएआरपीए परियोजनाओं के रूप में शुरू हुईं, उन्हें मेसर्स बोइंग, लॉकहीड और अन्य में स्थानांतरित कर दिया गया और अंततः वापस सरकारी उपयोग में ले ली गईं। भारत में, सरकार कुछ भी स्वदेशी मुश्किल से ही खरीदती है, खासकर उच्च प्रौद्योगिकियों में – यह कोई शिकायत नहीं है बल्कि तथ्य का केवल एक प्रस्तुतीकरण है।

आश्चर्य है कि सरकार द्वारा आरएंडडी में बहुत सारा निवेश (आरएंडडी परिव्यय) किए जाने के बावजूद इसके परिणाम बहुत ही निम्न हैं। कुछ आउटपुट है और यह विभिन्न कारणों की वजह से है जैसे – सुरक्षा, अकादमिक और शोध प्रयोगशाला राजनीति इत्यादि, लेकिन जब आउटकम (परिणाम) की बात आती है तो यह लगभग शून्य है। कभी-कभी इसरो (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन) में सफलता मिलती है, लेकिन बड़े पैमाने पर स्वदेशी प्रौद्योगिकी उपयोग में नहीं है। तो सरकार अपनी खुद की उपज क्यों नहीं खरीदती? ऐसे कई कारण हैं जो इसे ऐसा करने से रोकते हैं।

नौकरशाही की विरासत अकेला सबसे प्रभावशाली कारण है। नौकरशाही – ब्रिटिश राज का एक अवशेष शासन के लिए उपयुक्त है, स्वदेशी प्रौद्योगिकियों को सुविधाजनक बनाने के लिए नहीं। ब्रिटिश प्रत्येक स्वदेशी वस्तु को खत्म करना चाहते थे और नौकरशाही उनके कई हथियारों में से एक थी। यह सामान्य बोध है कि एक प्रद्योगिकी या उत्पादों को बड़े पैमाने पर अंगीकार करना नौकरशाही-राजनेता के मेल-जोल और वैज्ञानिकों के बीच असंतुलन पैदा करेगा। स्वदेशी तकनीक से भ्रष्टाचार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इसलिए भारत में डिसीज़न मेकिंग प्रक्रिया का शीर्ष स्तर स्वदेशी तकनीकों को नष्ट करने के मार्गों और माध्यमों की खोज करता है। विश्व व्यापार संगठन (डबल्यूटीओ) के नियमों, जिसमें व्याख्या का विशाल दायरा हो सकता है, को दिखाने से लेकर एक एल1 गणना दिखाने तक, को किसी भी तरफ दिखाया जा सकता है।

जैसा कि किसी ने कहा है, जहां चाह वहां राह, और यहाँ, इस देश के नौकरशाहों की गहरी इच्छा है कि बाजार में स्वदेशी तकनीक को बल देने के प्रति कोई चाह न रखो क्योंकि इसका एक सीधा खतरा है कि यह उनके वजूद पर असर डालेगी। नौकरशाही में आपको अपवाद मिल सकते हैं लेकिन मोटे तौर पर पूरा कुनबा भ्रष्ट है। जब तकनीक की बात आती है तो नौकरशाह बड़े पैमाने पर सीधी-सीधी गूगल खोजों को वरीयता देते हैं और फर्जी तकनीक वाले आधे-अधूरे विवरणों को प्राप्त करते हैं, जिनका उपयोग एक वास्तविक मामले को बिगाड़ने के लिए तथा किसी चर्चा में वर्चस्व के लिए किया जा सकता है, या उन वैज्ञानिकों द्वारा शिक्षित होने के लिए किया जा सकता है जो वर्षों तक बचे रहने के कारण अब तत्परता से नौकरशाहों में परिवर्तित हो गए हैं।

इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि आज सरकारी प्रयोगशालाओं के प्रमुखों में से कोई भी शायद ही शोध में सक्रिय हो – वे हो भी कैसे सकते हैं – वे तो नौकरशाही प्रक्रिया का उत्पाद हैं। नौकरशाह विदेशी प्रौद्योगिकियों को वरीयता देते हैं – सामान्य भत्तों के अलावा, विदेशी उत्पादों के साथ परिचितता और स्थिरता की समझ होती है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि इस समझ को अक्सर गलत स्थान दिया जाता है, उदाहरण के लिए – भारत में मूल नेटवर्क चलाने वाले अधिकांश वाणिज्यिक दूरसंचार राउटर्स मानक स्तर से कम होते हैं। तो क्या हुआ, वही राउटर्स तीसरी दुनिया को चलाते हैं!

नौकरशाहों को उन विदेशी सलाहकारों द्वारा जानकारी दी जाती है जो विक्रेता-संचालित निकाय होते हैं और जिनका एक ही एजेंडा होता है कॉर्पोरेट की कमाई को आगे बढ़ाना। स्थानीय उद्योग जिसमें  आयत-उसे इक्कठा करना और फिर एकीकृत करने जैसी सुविधाए, शामिल है, कभी भी बड़े पैमाने पर स्वदेशी पर जोर नहीं देता है, और इसलिए स्वदेशी प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देने की नौकरशाहों की इच्छा का कोई सवाल ही नहीं उठता।

यहां तक कि उन क्षेत्रों में जहां स्थानीय उपस्थिति है, वहाँ नौकरशाह स्थानीय कंपनियों को सफल होने में मदद करने के लिए कोई प्रयास नहीं करेंगे। यह निष्पक्षता के बारे में नहीं है बल्कि स्व-हित और उनके हित के बारे में है जो विदेशों को लाभ पहुंचाते हैं। नियमों में विनिर्माण, विकास और परिनियोजन की प्रक्रिया में भारतीय बौद्धिक संपदा का उपयोग शामिल होना चाहिए। भारत में बना उत्पाद थोड़ी बहुत बचत देता है लेकिन भारत में डिज़ाइन किया हुआ, विकसित और उत्पादित उत्पाद बहुत कुछ बचत देता है। दरअसल, कई हाइ प्रोफ़ाइल क्षेत्रों में विनिर्माण के मुक़ाबले डिजाइन और विकास करना ज्यादा बेहतर है। आखिरकर हम वैल्यू चेन को आगे बढ़ाना चाहते हैं।

सरकार अपने नौकरशाहों के माध्यम से आसानी से प्रस्ताव के लिए अनुरोधों (आरएफ़पी) को डिज़ाइन कर सकती है, आरएफ़पी उलझाव की फिक्र किए बिना स्थानीय उत्पादों के प्रति अनुकूल होते हैं – आखिरकार राष्ट्रीय प्रभाव स्वयं में ही सबसे बड़ी तर्कसंगति है। यदि वैज्ञानिक उत्पाद विकसित करते हैं और उद्योग इन्हें बाज़ार में पहुँचाने के लिए इच्छुक होते हैं तो नौकरशाह स्वदेशी को बढ़ावा देने में एक मजबूत भूमिका निभाएंगे – बस यह सिर्फ ऐसा करने की उनकी इच्छा का सवाल है।

वेंचर कम्यूनिटी

भारत में स्टार्ट-अप्स, उत्पाद विकास के विपरीत व्यापार प्रक्रिया नवाचार के प्रति अनुकूल होते हैं। यह मुख्य रूप से वेंचर कैपिटलिस्ट्स (वीसी) और संभावित अधिग्रहणकर्ताओं के फीडर (प्रदायक) सेक्टर की प्रकृति के कारण है। भारत में वीसी एक अंधानुकरण वाले दृष्टिकोण का अनुसरण करते हैं – बिग डाटा, क्लाउड, आईटी, रिन्यूवेबल एनर्जी ये सभी ध्यानाकर्षित करने वाले शब्द फंडिंग की चाभी हैं, लेकिन वीसी के लिए सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित करने वाला शब्द है – सेवाएँ।

जबकि ओला या फ्लिपकार्ट एक आदर्श सेवा उदाहरण हैं वहीं एक वास्तविक उत्पाद कंपनी इक्विटि बाज़ार का हिस्सा हो इसकी संभावना नहीं है – क्योंकि जोखिम को बहुत अधिक माना जाता है। इसका बड़ा हिस्सा भारत में प्रचलित मूल्यांकन संरचना के कारण भी है। उत्पाद स्टार्टअप्स को सेवा कंपनियों के समान बाज़ार पूंजीकरण, ब्याज से पहले आय, ह्रास, करों, ऋणमुक्ति (ईबीआईडीटीए) और जोखिम के आधार पर मूल्यांकन प्राप्त होता है जो कि पहले इस तथ्य से मापा जाता था कि उत्पाद का बाजार पर क्या प्रभाव किस प्रकार है। नतीजा यह है कि उद्यमी वित्त पोषण आकर्षित करने के लिए संघर्ष करते हैं , और जिनको ऐसे वीसी मिल जाते है उन्हें यह डर है कि कहीं उनकी कंपनी वीसी के हिसाब से ना चलने लग जाए।

बाजार

चिंता का एक आम कारण खुद बाजार ही है। हमारे बीच धारणा है कि विदेशी है तो अच्छा है। यह आंशिक रूप से हमारे औपनिवेशिक युग की विरासत कारण है और आंशिक रूप से हमारे बंदरगाहों पर वर्षों से विदेशी विक्रेताओ के प्रभुत्व के कारण है। यह केवल आदर्शों और समय के साथ बदल सकता है। सरकार अपनी स्वयं की स्वदेशी तकनीकियों को खरीदकर एक आदर्श स्थापित कर सकती है – और डेवलपर्स के एक बड़े आधार की अनुपस्थिति में इस नियंत्रित दृष्टिकोण के सफल होने की संभावना है जो अन्यथा वितरित दृष्टिकोण का समर्थन करेगा।

शिक्षा का क्षेत्र (एकेडेमिया)

एक आदर्श स्थिति में, अकादमिक शोध को ही उत्पादों को संचालित करना होगा। सिलिकॉन घाटी नवाचार प्रणाली के निर्माता अमेरिका भर में इसके पोषक विश्वविद्यालय है जो नियमित रूप से उत्पादों, विचारों और उद्यमियों को अग्रणी बनाते हैं। सरकारी व्यवस्था में भारतीय शिक्षा और अनुसंधान प्रयोगशालाएं उत्पाद वितरण की दिशा में तैयार नहीं हैं। बुनियादी ढाँचे और व्यवस्थित समर्थन की कमी के बावजूद, इन प्रयोगशालाओं में नियमित रूप से नई खोज होती हैं। केवल बिक्री के पारिस्थितिकी तंत्र की कमी है। कुछ हद तक महत्वपूर्ण अनुप्लब्ध समाधान बाजार में उत्पादों की स्वीकार्यता है।

आगे बढ़ने का रास्ता: उपरोक्त को देखते हुए, केवल सरकार ही यह सुनिश्चित कर सकती है कि मेक-इन-इंडिया एक सफलता बने। इन्हें अपनी प्रयोगशालाओं या अनुसंधान के संस्थानों के माध्यम से तकनीति विकासकर्ता बनना चाहिए; इन्हें पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स (पीएसयू) के माध्यम से या स्टार्टअप कार्यक्रमों के माध्यम से प्रौद्योगिकी का निर्माता होना है; जिन्हें पेशेवर आधार पर चलाना है (जिसमें हमारे उत्कृष्ट प्रशासक-अधिकारी एक मजबूत भूमिका निभा सकते हैं) और अंत में,  इसे अपने विभिन्न विभागों के माध्यम से प्रौद्योगिकी का उपभोग करना है।

एक बार ऐसा होने के बाद, स्वदेशी उत्पादों के बारे में जागरूकता होगी और इन चीजों को सफल बनाने का मौका होगा। ऐसी एक सफलता स्वयं की रक्षा करने वाले अधिकारियों को मुक्त कर देगी। नौकरशाही को बाजार द्वारा संचालित सफलता के साथ प्रोत्साहित किया जा सकता है, जैसे कि वैज्ञानिक कुछ रॉयल्टी साझा करते हैं।

जहाँ पीएसयू मार्ग कई मामलों में इष्टतम नहीं हो सकता है, तो सरकार के पास निजी उद्योग को विकास अनुबंध देने का दूसरा मार्ग है। ऐसे अनुबंधों में सरकार को जोर देना चाहिए कि बौद्धिक संपदा और जानकारियों को भारत में विकसित किया जाना चाहिए और विदेशों से इनका अधिग्रहण नहीं किया जाना चाहिए। विदेशों से अधिग्रहण की इस तरह की तकनीकि भारत को सिर्फ एक बिक्री बाजार या सबसे अच्छे मामले में, निजी खिलाड़ियों के बस विदेशी प्रौद्योगिकी के साझेदार के लिए एक अग्र भाग बनने के साथ उत्पाद खाद्य श्रृंखला के निचले स्तर का एक खिलाड़ी बनाती है।

यह लंबे समय से टल रही 10-15 साल की एक प्रक्रिया है, लेकिन यह वह प्रक्रिया है जिसे हमें शामिल करना चाहिए, और वह भी जल्द से जल्द। हमें चार-पाँच बार सोचना चाहिए और इन्हें तैयार करना चाहिए, उपयोगकर्ता की पहचान करनी चाहिए, निर्माता की पहचान करनी चाहिए और उस प्रयोगशाला की पहचान करनी चाहिए जो इन्हें विकसित करेगी। प्रयोगशाला के प्रमुख महत्वपूर्ण नहीं हैं, महत्वपूर्ण हैं  श्रमिक और शोधकर्ता- इसलिए हमें उन लोगों को चुनना होगा जिन्होंने देश के लाभ के लिए अपनी तकनीकों को चुना और उन्हें वितरित किया है। हमने पहले कभी यह कोशिश नहीं की है, लेकिन परिणाम के बारे में चिंता किए बिना और विफलता के बारे में चिंता किए बिना यह कोशिश करने लायक है। यह कोशिश शीर्ष लोगों द्वारा भी की जा