अर्थव्यवस्था
भारत से क्या चाहती है चौथी औद्योगिक क्रांति
भारत से क्या चाहती है चौथी औद्योगिक क्रांति

प्रसंग
  • इसका सीधा जवाब है – चपल राजनीति।

सन् 1780 से मनुष्य के कामकाजी माहौल में जो अहम बदलाव आया है उसने नौकरियों के उतार-चढ़ाव को निर्धारित किया है जैसा कि आज यह समझा जाता है। पहली औद्योगिक क्रान्ति ब्रिटेन से शुरू हुई और फिर यूरोप के बाकी हिस्सों तक फैल गई, जिससे लोगों के घरों में होने वाला विनिर्माण कार्य कारखानों में होना शुरू हो गया। यहाँ से इन कारखानों के पदानुक्रमिक संगठन की शुरूआत भी हुई। बुनकरों, चर्मकारों और लोहारों, जो तब तक किसी उत्पाद को अकेले तैयार किया करते थे, को श्रमिकों द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया, जो किसी उत्पाद को खुद पूरा तैयार करने के बजाय टीम के साथ मिलकर केवल अपने निर्धारित कामों को पूरा करते थे। मानव इतिहास में पहली बार श्रमिकों की उत्पादकता एक ही पीढ़ी के भीतर बढ़नी शुरू हो गयी क्योंकि प्रत्येक नयी मशीन ने अतिसूक्ष्म रूप से बढ़ने के बजाय असंतत परिवर्तन किये।

बंदरगाहों से दूर छोटे शहरी केन्द्र उभरने लगे और ग्रामीण इलाकों पर हावी होना शुरू हो गए। परिवर्तन का स्तर इतना उग्र था कि कई बार यह हिंसक तक हो गया, जैसे कि उन्नीसवीं शताब्दी की शुरूआत में ब्रिटेन में औद्योगिकीकरण का विरोध करने वाले दंगे हुए। इसने उन जगहों को भी बदल दिया जहाँ पर काम उपलब्ध था जिससे ग्रामीण इलाकों के लोगों को मजबूरन औद्योगिक क्षेत्रों की तरफ पलायन करना पड़ा। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि इसी समय श्रमिक आंदोलन भी उभरने लगे थे।

विद्युतीकरण से दूसरी औद्योगिक क्रांति की शुरूआत हुई, जिससे बड़े पैमाने पर उत्पादन के दायरे का विस्तार हुआ। परिवहन और संचार तंत्रों में विद्युत आधारित नई प्रौद्योगिकियों का उद्भव हुआ। इन प्रौद्योगिकियों ने बदले में कर्मचारियों की संख्या को समूहों में बांटना शुरू किया। कर्मचारी अपने समूहों में अपनी नौकरी को स्थायी समझने लगे परन्तु उनसे अलग थे जो समूह में नहीं थे I

इस तरह से इंजीनियरिंग, बैंकिंग और एकाउंटेंट जैसे नए पेशों और शिक्षकों की संख्या बढ़ी, जो खुद को एक अलग समूह मानते थे और बेहद जागरूक थे। इससे कस्बों में बड़े पैमाने पर मध्यम वर्ग का उदय हुआ जिसने कई देशों में शासन को प्रभावित करना शुरू कर दिया।

इन महत्वपूर्ण परिवर्तनों की तुलना में तीसरी औद्योगिक क्रांति का असर शुरूआत में बहुत ज्यादा और जल्द लाभ देने वाला प्रतीत हुआ। जो बदल जा सकता है। इस क्रान्ति में उत्पादन के लिए इलेक्ट्रानिक्स के उपयोग की और उसके बाद सूचना प्रौद्योगिकी की अहम भूमिका थी। कंप्यूटर के आगमन से परिवर्तन का सबसे बड़ा चेहरा सामने आया, जिससे मजदूर वर्ग सहज नहीं था क्योंकि उनका मानना था कि जहाँ भी कंप्यूटरों का इस्तेमाल किया जायेगा वहां रोजगार तबाह हो जाएँगे। केवल रेलवे ही नहीं बल्कि बैंकिंग जैसे बड़े क्षेत्रों के लिए भी यह एक करारा झटका था, जो अब हास्यास्पद लगता है।

जब हम एक गहरे वैचारिक स्तर पर बदलावों की जांच करते हैं, तो तीसरी औद्योगिक क्रान्ति को इस रूप में पाते हैं जहाँ मानव नौकरियों ने विनिर्माण के बजाय सेवाओं में जाना शुरू कर दिया। पहली औद्योगिक क्रान्ति ने शहरों में स्थित कारखानों में काम करने के लिये ग्रामीण इलाकों से श्रमिकों को अपनी खींचा था। दूसरे चरण में यह प्रक्रिया और ज्यादा गहरी हो गई, जब बड़े पैमाने पर पंक्तिबद्ध रूप से होने वाली विनिर्माण प्रक्रिया ने विनिर्माण के स्तर को बढ़ा दिया था। श्रमिकों के सेवाओं में विस्थापन से, न केवल उत्पादकता में तीव्र वृद्धि हुई बल्कि इसने उस स्थान को भी बदल दिया जहाँ से श्रमिक काम कर सकते थे। कारखानों और कार्यालयों में कर्मियों के शारीरिक रूप से उपस्थित होने के जो कड़े नियम बने थे, समाप्त होने शुरू हो गए। दरअसल, इसी समय पहली बार अवकाश की अवधारणा को पेश किया गया था।

जाहिर है, औद्योगिक क्रान्ति के प्रत्येक चरण से जो सबक मिला वह इसमें व्यवधान का सबक है। इस बात की भी काफी सम्भावना है कि, चौथी औद्योगिक क्रान्ति भी विघटनकारी होगी। इसका पहला बदलाव तो यह है कि आज काम कारखानों जैसे विनिर्माण संगठनों के बजाय घर से किया जाने लगा है। दरअसल कई नौकरियों के लिए मानवों और मशीनों के बीच का अंतर गायब हो जाएगा। इन सबके संयुक्त प्रभाव से स्व-नियोजित श्रमिकों का उदय होगा। यह भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं में बहुत ही तेजी से होगा, क्योंकि इसके पास शुरुआती औद्योगिक क्रान्ति से छुटकारा पाने के लिए बहुत ही कम वैचारिक अवरोध हैं। लोग अधिक उत्पादकता के साथ काम करेंगे लेकिन उनके काम को मापना मुश्किल होगा क्योंकि वे अपने परिणाम देने के लिए एक ही स्थान पर एकत्र नहीं होंगे।

आगे इसकी अपनी उलझनें हैं। शुरुआत करने वालों के लिए, हमें कौशल की स्थापना और तीव्र गति से उनके अद्यतन पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता होगी। यह लगभग वैसा है जैसे कि एक दुकान का दौरा करने में श्रमिकों को बाजार तलाशने की आवश्यकता होती है जहाँ वे विशिष्ट नौकरियों के लिए वक्त की जरूरत के अनुरूप कुशलता अर्जित कर सकें। इससे दीर्घकालिक नौकरियों से संबंधित कौशल समाप्त होगा। तब, कौशल को एक बेहद विकसित उद्योग बनाने की जरूरत है। अगर हम यह निर्धारित कर सकते हैं कि हमें किस तरीके के कौशल की आवश्यकता होगी, तो हम श्रमिकों को आवश्यक कौशल चुनने के लिए और अवसर प्रदान करने के लिए प्रशिक्षण केंद्र भी स्थापित कर सकते हैं। मानव संसाधन उद्योग, शैक्षिक संस्थानों और सरकारों की भूमिका की परिभाषा औद्योगिक क्रांति के इस चरण के लिए मूल रूप से बदलनी होगी।

ऐसा होने पर, कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए राह निकालना आवश्यक हो जाएगा जो समय-समय पर प्रौद्योगिकी द्वारा विस्थापित होने के कारण असहाय हो जाएंगे। जैसे-जैसे विघटन का स्तर बढ़ता है, लोगों को विश्वास करना चाहिए कि आगे उनका एक भविष्य है। ब्रिटेन के वित्तीय सेवा प्राधिकरण के पूर्व अध्यक्ष, एडैयर टर्नर लिखते हैं कि “आधुनिक अर्थव्यवस्था की आश्चर्यजनक विशेषता यह है कि आर्थिक गतिविधि के महत्वपूर्ण क्षेत्रों के संचालन के लिए कितने कम कुशल लोगों की आवश्यकता होती है।” यह प्रवृत्ति गहन हो जाएगी।

इसका मतलब व्यापार और मानव समाज के साथ सरकारों को विचार करने की आवश्यकता होगी कि एक प्रतिक्रियाशील प्रतिनिधि होने के बजाय नई औद्योगिक क्रांति का उपयोग कैसे किया जाए। परिणामस्वरूप राजनीति परिवर्तन की गति निर्धारित करेगी न कि अनिवार्य रूप से प्रद्योगिकी। यह आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि पहले की क्रांतियों में भी ऐसा हो चुका है।

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में इसका मतलब है कि नीतियों को विनियामक ढांचे का पालन करना होता है जो प्रायः और आवश्यक सुधारों के साथ बदलता रहता है। यह हर क्षेत्र में आवश्यक होगा, इसलिए अधिक कानून का निर्माण या अधिक संभवतः पूरक नियम हो सकते हैं जो परिवर्तनात्मक मॉडल को स्वीकार करने के लिए प्रोत्साहित करेंगे। चुनने के लिए पहले से ही कई विकल्प हैं। श्रम के क्षेत्र में, शुरुआत करने वालों में से एक डेनमार्क की फ्लेक्सीक्यूरिटी प्रणाली थी जो अब लगभग एक दशक पुरानी हो चुकी है, जहां एक लचीला श्रम बाजार सभी नागरिकों के लिए पुनः-कौशल सेवाओं के साथ एक मजबूत सामाजिक सुरक्षा जाल के साथ जोड़ा गया है। और भी रूपांतर होंगे क्योंकि आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस वाले तकनीकी बदलाव प्रभाव डालते हैं। प्रत्येक एक अनुकूलित समाधान की मांग करेगा।

इस क्रांति में भाग लेने की भारत सरकार की योजनायें एक चतुर सोच है। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरा उत्साह दिखाया है कि उनकी “सरकार चौथी औद्योगिक क्रांति से लाभ प्राप्त करने के लिए नीतियों को बदलने की इच्छुक है।” लेकिन प्रायः चतुर सोच के होते हुए, हमने पिछले समय से दूसरों को पहल करने का अवसर दिया है। विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र की अवधारणा बनाने में भारत सरकार ने एशिया में सबसे पहले पहल की थी, स्वर्ण विनिमय पर भी सबसे पहले भारत ने ही गौर किया।

इसलिए, जब तक इसका निर्माण नहीं किया जाता है, तब तक यह तर्क देना आसान होगा कि अर्थव्यवस्था में नई नौकरियों का सृजन होगा। लेकिन यह उस क्षेत्र में हो सकता है जहाँ पर बड़े पैमाने पर अवसर बन सकते हैं, जहां मनुष्य वे जवाब दे सकते हैं जो मशीनें नहीं दे सकतीं। संक्षिप्त बात यह है कि प्रौद्योगिकी में एक तीव्र गति से उन्नति होगी लेकिन परिणामी परिवर्तन एक समय में तेजी से न होकर कई दशकों में होंगे। यह व्यक्तियों, कंपनियों और यहां तक कि सामाजिक जीवन को भी समायोजित करने के लिए समय देगा। लेकिन यह सब करने के लिए अब देर करना अच्छी बात नहीं है।