अर्थव्यवस्था
राजस्थान और मध्य प्रदेश में यूरिया की कमी का क्या कारण रहा

आशुचित्र- केंद्र द्वारा पर्याप्त मात्र में राज्यों को यूरिया उपलब्ध करवाई गई। किसानों का कहना है कि नई राज्य सरकारों द्वारा खराब योजना और वितरण के कारण यूरिया की कमी हुई है।

मध्य प्रदेश तथा राजस्थान में यूरिया की कमी खत्म होते नहीं दिख रही है। मध्य प्रदेश में कमल नाथ और राजस्थान में अशोक गहलोत सत्ता में आते ही यूरिया की कमी की समस्या में उलझ गए हैं। हालाँकि दोनों राज्य सरकारों ने कहा है कि कमी खत्म हो चुकी है लेकिन प्रतिदिन उर्वरक की नई समस्या पैदा हो जाती है।

मुख्यत: मध्य प्रदेश में यूरिया वितरण में क्या गलत हुआ? पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 10 दिन पहले मीडिया में बयान दिया था कि उनकी सरकार ने बोई गई रबी फसल के लिए यूरिया के वितरण हेतु पर्याप्त बंदोबस्त किए थे।

चौहान के अनुसार, 15 दिसंबर तक राज्य को केंद्र से 4.52 लाख टन यूरिया प्राप्त हुआ था जो पिछले वर्ष प्राप्त हुए 3.51 लाख टन की तुलना में अधिक है। पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि कांग्रेस सरकार बहाने ढूंढने की बजाय समस्या का निवारण करे।

उर्वरक मंत्रालय के अनुसार, दिसंबर में 3.70 लाख टन यूरिया दी गई थी वहीं आवश्यकता 3.50 लाख टन की ही थी। जितना यूरिया दी गई थी उसमें से 1.80 लाख टन बेची जा चुकी है।

वहीं राजस्थान में 2.70 लाख टन की आवश्यकता की तुलना में मंत्रालय ने 2.89 लाख टन यूरिया दी थी तथा 2.31 लाख टन यूरिया किसानों द्वारा खरीदी जा चुकी है।

एक प्रेस विज्ञप्ति में मंत्रालय ने कहा, “दोनों राज्यों को आवश्यकता से अधिक यूरिया दी गई थी। राज्य के अंदर उसका वितरण राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी है।”

मध्य प्रदेश सरकार ने कहा कि उसके पास पर्याप्त मात्रा में यूरिया है और उर्वरक के 24 रेक उपलब्ध हैं, वहीं इतने ही और आने हैं।

जब दोनों राज्यों के पास आवश्यकता से अधिक यूरिया है ऐसे में केंद्र द्वारा उसके वितरण की बात तर्कसंगत दिखती है। भिंड, मुरैना और ग्वालियर के किसानों के अनुसार यह समस्या खराब वितरण और योजना के कारण हुई है।

किसान यूरिया को आवश्यकता से अधिक नहीं रखते। उन्हें गेहूँ की फसल में दो बार यूरिया डालनी होती है। पहली बार तो बीज बोने के 15 दिनों बाद और दूसरी बार बीज बोने के डेढ़ महीने बाद।

यदि किसानों को अगले दिन यूरिया डालनी होती है तो वे नज़दीकी सहकारी समिति अथवा सरकारी आउटलेट से खरीद कर ले आते हैं। अत: आवश्यकता के समय ही उसे खरीदा जाता है।

दूसरा कि मध्य प्रदेश में चुनावों के परिणाम आने तक 11 दिसंबर तक चुनाव का दौर चला था। इस कारण जिन अधिकारियों को यूरिया के वितरण की जिम्मेदारी थी वे सभी चुनावों में लगे हुए थे।

केंद्र द्वारा यूरिया पहुँचाए जाने के बाद क्षेत्रीय भंडार गृहों तक उसके पहुँचने की और ग्रामीणों को वितरण की बात सुनिश्चित करने के लिए अधिक अधिकारी नहीं थे तथा जब किसान उर्वरक के लिए आए तो सरकार तथा उसके अधिकारी सोए हुए पाए गए।

मालवा क्षेत्र के एक किसान के अनुसार उन्होंने भंडार में आवश्यकता से अधिक यूरिया देखी है। हो सकता है उसका इशारा वितरण प्रणाली में गड़बड़ी की ओर हो। उसने यह भी कहा कि सरकारी अधिकारियों ने इस बात की परवाह नहीं कि किस क्षेत्र में अधिक मात्रा की आवश्यकता है और किसमें कम।

उदाहरण के तौर पर, पश्चिमी मध्य प्रदेश के कुछ किसानों ने कम बारिश की आशंका के चलते इस वर्ष चने की फसल बोई। एक किसान ने कहा, “हमने मानसून के दौरान और मानसून के बाद भी कम बारिश झेली है। इससे धरती के नीचे का जल स्तर प्रभावित हुआ है।”

यह जानते हुए कि इस वर्ष भी उन्हें खराब बारिश का सामना करना पड़ सकता है इसी कारण उन्होंने गेहूँ छोड़कर चने की फसल बोई है। मंदसौर के एक किसान ने कहा, “गेहूँ को बोए जाने के बाद प्रत्येक 15 दिनों में तीन बार पानी की आवश्यकता होती है वहीं चने को बोए जाने के बाद केवल एक बार पानी की आवश्यकता होती है।”

चने को गेहूँ जितनी यूरिया की आवश्यकता नहीं होती। वहीं गेहूँ को एक एकड़ में 15 किलो से 20 किलो की यूरिया की आवश्यकता होती है लेकिन किसान अच्छी उपज के लिए 50 किलो तक डाल देते हैं। मंदसौर के किसान ने कहा, “ये सारी बातें ध्यान में नहीं रखी गईं। इसी कारण अधिक समस्याएँ हुईं।”

उत्तरी मध्य प्रदेश के क्षेत्र मुख्यत: राजस्थान की सीमा से लगे क्षेत्रों में किसानों ने बहुत समस्या झेली। ग्वालियर के एक किसान ने कहा, “मैं अधिकारियों को इसका जिम्मेदार ठहराता हूँ।” आगे उसने कहा कि सरकारी आउटलेट में कमी की वजह से निजी व्यापार बहुत बढ़ा है।

वहीं यूरिया की समस्या के साथ अन्य मुद्दे भी सामने आए हैं।

दैनिक भास्कर  की रिपोर्ट के अनुसार राज्य सरकार पुरानी यूरिया का वितरण कर रही है वहीं नई को भंडार गृहों में रखा गया है। कुछ किसानों का कहना है कि उन्हें मिली यूरिया मिट्टी में नहीं मिल रही है।

मध्य प्रदेश की तुलना में राजस्थान में समस्याएँ थोड़ा अधिक नियंत्रण में हैं।

पूरे देश के लिए, मानसून के बाद अक्टूबर से दिसंबर तक होने वाली बारिश इस बार 43 प्रतिशत कम हुई है। वहीं मानसून के दौरान जून से सितंबर तक होने वाली बारिश भी कम ही हुई है जिसके कारण 91 प्रमुख जलाशयों में जल का स्तर पिछले 10 सालों में सबसे कम है। वर्तमान में औसत जल 89.159 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) है जबकि इसकी क्षमता 161.993 बीसीएम की है।

28 दिसंबर तक 277.37 लाख हेक्टेयर (एलएच) क्षेत्र में गेहूँ बोया जा चुका था जो कि पिछले वर्ष की तुलना में 274.16 एलएच से अधिक है। सामान्यत: गेहूँ का क्षेत्र इस समय तक 284.77 एलएच होता है। वहीं चने का क्षेत्र भी कम हुआ है। अभी तक यह 91.64 एलएच था और पिछले वर्ष 102.54 एलएच था। सामान्यत: यह 88.91 एलएच होता है।

वहीं रबी फसल का क्षेत्र 28 दिसंबर तक 20 एलएच कम पाया गया। फिर यूरिया की कमी असमय नहीं आ सकती थी।