अर्थव्यवस्था
पश्चिम बंगाल का रोजगार, शिक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे आर्थिक सूचकों पर कैसा रहा है प्रदर्शन
करण भसीन - 30th March 2021

राज्यों की तुलना करना कठिन होता है क्योंकि हर राज्य की अपनी अलग-अलग चुनौतियाँ होती हैं, विशेषकर भारत जैसे विविधता वाले देश में। हालाँकि, फिर भी ऐसी तुलनाएँ यह समझने के लिए आवश्यक हैं कि कौन-सी नीतियाँ काम करती हैं और किन नीतियों की अब आवश्यकता नहीं है।

प्रतिस्पर्धात्मक राजनीति का ही एक परिणाम है प्रतिस्पर्धात्मक अर्थव्यवस्था और इसलिए शासन परिणामों की तुलना की जाती है। इसलिए आवश्यक है कि हम तथ्यों और मनगढ़ंत बातों को अलग करके कई सामाजिक-आर्थिक सूचकों के आधार पर पश्चिम बंगाल का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन करें।

अवश्य ही राज्य ने पिछले कई वर्षों में काफी प्रगति की है लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यह प्रगति राष्ट्रीय औसत से बेहतर है या नहीं। इस प्रकार की तुलनाओं में पहला सूचक वृद्धि दर रहता है और इसलिए राज्य के सरल घरेलू उत्पादन (जीएसडीपी) की वृद्धि दर की तुलना राष्ट्रीय औसत से करना आवश्यक है।

2012-13 से 2017-18 की पाँच वर्षों की अवधि में राज्य की औसत वृद्धि दर 5.5 प्रतिशत है जबकि देश भर के राज्यों में औसत रूप से यह वृद्धि दर इसी अवधि में 7.1 प्रतिशत की रही। अब प्रश्न उठता है कि क्यों पश्चिम बंगाल की वृद्धि दर राष्ट्रीय औसत से कम है?

इसका एक प्रमुख कारण हो सकता है कि इस काल में राज्य में बहुत ही सीमित निजी पूँजी निवेश हुआ। 2018-19 में राज्य ने राष्ट्रीय औसत से अधिक वृद्धि दर्ज की। अब देखने वाली बात यह है कि यह मात्र एक संयोग था या यह एक ट्रेंड है जो भविष्य में भी देखने को मिल सकता है।

ऋण को सामान्य स्तर पर बनाए रखने के लिए राज्य के लिए वृद्धि दर की अधिकता और आवश्यक हो जाती है क्योंकि वर्तमान में जीएसीपी का 34.8 प्रतिशत ऋण है। यदि हम मुद्रास्फीति को काटकर राज्य की वृद्धि दर देखें तो यह बहुत कम बचती है और ऋण की अधिकता भी चिंता का विषय है।

इस प्रकार पश्चिम बंगाल ऐसी स्थिति में पहुँच सकता है जहाँ ऋण का भार राज्य के वित्तीय गणित को बिगाड़ सके। ऐसे में राज्य के लिए आवश्यक महत्त्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च करने के लिए सरकार के पास सीमित संसाधन ही रह जाएँगे।

2020-21 के बजट में राज्य ने इंफ्रास्ट्रक्चर विकास पर मात्र 2.3 प्रतिशत भाग आवंटित किया है जो कि राष्ट्रीय औसत के 4.2 प्रतिशत भाग से काफी कम है। इसलिए आवश्यक हो जाता है यह देखना कि राज्य खर्च कहाँ करता है और वर्तमान के कुछ कार्यक्रम इसके व्यय का कितना भाग बनाते हैं।

उदाहरण स्वरूप, पीएम-किसान की तरह किसानों को सीधे नकद देने की योजना के तहत 5,000 रुपये दिए जाते हैं लेकिन वास्तविकता में यह प्रयासों की आवृत्ति है जिसे बचाया जा सकता है। इसके लिए सिर्फ पीएम-किसान योजना के तहत किसानों को 6,000 रुपये मिलने का द्वार खोलना होगा।

यदि राज्य सरकार केंद्र के पैसे किसानों को मिलने दे तो राज्य के पास इन कल्याणकारी योजनाओं से बची राशि को महत्त्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर विकास पर खर्च करने का अवसर होगा। ऐसी और भी कई राज्य की योजनाएँ हैं जिन्हें केंद्र के साथ मिलकार अतिरिक्त संसाधनों का बचाया जा सकता है।

सार्वजनिक वस्तुओं के प्रावधानों में कमी के साथ यदि सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने का प्रयास किया जाए तो परिणाम ऐसा देखने को मिलता है जहाँ कई सारे कारक एक तीव्र वृद्धि दर को पीछे खींच रहे हों।

भारत जैसे श्रम की अधिकता वाले देश में उच्चतर वृद्धि दर और सुगठित श्रम बाज़ार से अधिक सामाजिक सुरक्षा कोई प्रदान नहीं कर सकता तथा किसी भी नीति को उद्देश्य भी यही होना चाहिए। राज्य एक बात में सही प्रदर्शन करता है- वह है शिक्षा पर व्यय।

राज्य के कुल व्यय का 17.6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च होता है। राष्ट्रीय औसत 16 प्रतिशत के आसपास है। यह एक निवेश है मानव पूँजी में जिसके फल स्वरूप कौशल युक्त कर्मचारी मिलत हैं। हालाँकि इसके बाद महत्त्वपूर्ण हो जाता है इस कौशल को रोजगार उपलब्ध करवाना।

राज्य के भीतर ही प्रतिभाओं को रखने के लिए आवश्यक है उन्हें अच्छे वेतन वाली नौकरियाँ देना। यदि राजगार सृजन की बात करें तो सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग ऑफ़ इंडियन इकॉनोमी (सीएमआईई) के अनुसार राज्य में बेरोजगारी दर लगातार 6 प्रतिशत से अधिक रही है।

कोविड-19 के बाद बेरोजगारी दर से तुलना एक अच्छा सूचक नहीं है क्योंकि वैश्विक महामारी का श्रम बल प्रतिभागिता दर और बेरोजगारी दर पर काफी प्रभाव पड़ा है। हालाँकि 2011 के एनएसएसओ सर्वेक्षण के आधार पर पश्चिम बंगाल की गरीबी दर 20 प्रतिशत की थी।

2004 से 2011 के बीच पश्चिम बंगाल में गरीबी 14.3 पीपीपी से गिरी जबकि गरीबी गिरने का राष्ट्रीय औसत 15.3 पीपीपी था। सिक्कीम और त्रिपुरा जैसे पूर्वोत्तर राज्यों में 20 से भी अधिक बिंदुओं से गरीबी में गिरावट आई। वहीं, ओडिशा, महाराष्ट्र, बिहार और आंध्र प्रदेश ने भी गरीबी में भारी गिरावट दर्ज की।

ये सारी गणनाएँ तेंदुलकर गरीबी रेखा का उपयोग करने वाले मिश्रित संदर्भ काल का उपयोग करके की गईं हैं जिनका संबंध वर्ल्ड बैंक की 1.9 डॉलर पीपीपी गरीबी रेखा से है।

उपरोक्त विचार लेखक के अपने हैं व उनसे जुड़ी किसी संस्था का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं।