अर्थव्यवस्था
महिला रोजगार संकट के लिए केवल नोटबंदी को दोष देना उचित नहीं
महिला रोजगार संकट

आशुचित्र-
  • महिला श्रम बल भागीदारी की कम दर के लिए विमुद्रीकरण को दोष देना क्यों है गलत।

मेरी प्रशंसा के पात्र दो अर्थशास्त्री, पहले, प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद् के अंशकालीन सदस्य सुरजीत भल्ला और दूसरे, सेण्टर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी महेश व्यास एक तीखी बहस में शामिल हुए हैं कि क्या भारतीय अर्थव्यवस्था नौकरियों का सृजन कर रही है या फिर उन्हें नष्ट कर रही है। पिछले हफ्ते उन्होंने डाटा के विभिन्न स्रोतों (राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय का अनुमान (2011-12), श्रम ब्यूरो रोजगार सर्वेक्षण (2014 और 2015 से संबंधित) और सीएमआईई का स्वयं का उपभोक्ता पिरामिड घरेलू सर्वेक्षण (सीपीएचएस), जो 2016 में शुरू हुआ था और यह हर चार महीने में आयोजित होता है) के आधार पर एक-दूसरे के अनुमानों पर संदेह जताते हुए महिला श्रम बल भागीदारी दर (एफएलएफपीआर) में गिरावट पर बहस की थी।

महिला श्रम बल भागीदारी दर एक वह समग्र संख्या है जो, पहले से ही नियोजित महिलाओं की संख्या के साथ सक्रिय रूप से काम की तलाश कर रही महिलाओं की संख्या को जोड़कर तथा परिणामी संख्या को 15+ वर्ष आयु आबादी में कार्यरत कुल महिला श्रम बल के एक प्रतिशत के रूप में व्यक्त करते हुए निकाली जाती है। एक निम्न या गिरता हुआ एफएलएफपीआर इशारा करता है कि महिलाएं विभिन्न कारणों से काम छोड़ रही हैं। ये कारण उच्च शिक्षा प्राप्त करना, गृहस्थी बनाना या कार्यस्थल पर भेदभाव के चलते औपचारिक कार्य को छोड़ना, या ये तीनों कारण हो सकते हैं। (आप इंडियन एक्सप्रेस में यहां और यहां भल्ला और व्यास के तर्कों के मूल को पढ़ सकते हैं)

जबकि व्यास मई-अगस्त 2017 में अपने स्वयं के सीपीएचएस सर्वेक्षण में 12 प्रतिशत से नीचे की दर को देखते हुए एफएलएफपीआर पर निराशावादी हैं, वहीं भल्ला आशावादी हैं और दावा करते हैं कि यदि 2017 में एफएलएफपीआर सात साल पहले के एनएसएसओ सर्वेक्षण से मेल खाता था तो व्यास के अनुमान की तुलना में नियोजित महिलाओं की संख्या दोगुनी से अधिक हो सकती है। वह लिखते हैं: “यदि 2017-18 में 12 प्रतिशत का सीएमआईई अनुमान 2011-12 में 23.3 प्रतिशत के एनएसएसओ अनुमान के बराबर (अधिक नहीं) लगाया गया है, तो 2017-18 में महिला रोजगार का अनुमान सीएमआईई द्वारा बताए गए 49 मिलियन (4 करोड़ 90 लाख) रोजगार के अनुमान का लगभग दोगुना है। निश्चित रूप से, 23.3 प्रतिशत एफएलएफपीआर 95 मिलियन (9 करोड़ 50 लाख) महिला रोजगार का सृजन करेगा; 2011-12 में महिलाओं के लिए सीडीएस (वर्तमान दैनिक स्थिति) रोजगार 82 मिलियन था।”

इस सूत्रीकरण के साथ समस्या यह है कि हम 2011-12 के किसी अन्य पुराने डेटा स्रोत के साथ 2017 में एफएलएफपीआर अनुमानों को तय नहीं कर सकते हैं। मध्यवर्ती वर्षों में बहुत कुछ बदल गया होगा। इसलिए, जबकि किसी को भल्ला के दावे को पूरी तरह से अप्रासंगिक घोषित करने की आवश्यकता नहीं है, वहीं इस दशक के अधिकांश और 2004-05 के बाद की अवधि के लिए एफएलएफपीआर में गिरावट की दिशा में समग्र प्रवृत्ति के संदर्भ में इसके सही होने की संभावना नहीं है।

जैसा कि व्यास बताते हैं, एफएलएफपीआर (एनएसएसओ के अनुसार) 2004-05 में 31.1 प्रतिशत से घटकर 2011-12 में 23.3 प्रतिशत हो गया था, जो प्रतिवर्ष 1.1 प्रतिशत की धीमी गिरावट है। फिर जब आप एनएसएसओ आंकड़े की तुलना सीएमआईई की मई-अगस्त 2016 की एफएलएफपीआर, जो 16.37 प्रतिशत है, से करते हैं तो पाएंगे कि इन पांच वर्षों में गिरावट की दर 1.39 प्रतिशत तक पहुंच गई है। 2017 में, सीपीएचएस की दर में 4.93 प्रतिशत की एक अन्य गिरावट हुई जो 11.44 प्रतिशत तक पहुंच गई- जो संभवतः पिछले वर्ष में विमुद्रीकरण का अतिरिक्त प्रभाव प्रदर्शित करती है। यह दर उस दर से दोगुनी थी जिस दर पर उस वर्ष पुरुष एलएफपीआर में गिरावट हुई थी, अर्थात यह मई-अगस्त 2016 और एक साल बाद के बीच के समय में 2.5 प्रतिशत की गिरावट थी।

व्यास लिखते हैं: “किसी भी देश ने स्वयं को नोटबंदी का झटका नहीं दिया है जैसा हमने स्वयं को दिया है और इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं है कि जैसा हमने नोटबंदी के बाद गौर किया उसी प्रकार किसी भी देश ने कभी श्रम बाजारों से श्रमिकों की वापसी के तरीके पर गौर नहीं किया। नोटबंदी के इस विशाल झटके को देखते हुए, और श्रम बाजारों पर इसके स्पष्ट प्रभाव को देखते हुए, यह कल्पना करना न्यायसंगत नहीं है कि 2011-12 से श्रम भागीदारी दर स्थिर बनी हुई है। लेकिन भल्ला बिना किसी स्पष्टीकरण के ही अपने अनुमान लगा रहे हैं और एक बार फिर से चमत्कारिक रूप से (या साधारण तौर पर) नियोजित महिलाओं की संख्या को दोगुना कर रहे हैं!”

यहाँ पर ध्यान देने योग्य दो बिन्दु हैं।

पहला, इस बात में कोई संदेह नहीं है कि नोटबंदी एक करारा झटका था जिसने महिलाओं और पुरूषों दोनों के लिये रोजगार को प्रभावित किया। इसलिए, दोनों लिंगो के लिए एलएफपीआर में गिरावट की उम्मीद होना वाजिब है, भले ही इस तथ्य को स्वीकार करते हुए कि विभिन्न सर्वेक्षणों से प्राप्त होने वाले डेटा में विभिन्न तरीकों का उपयोग किया जाता है।

लेकिन व्यास ने इन सबके लिए नोटबंदी को पूरी तरह से दोषी ठहराते हुए अपने मामले को बढ़ाचढ़ा कर पेश किया। नौकरियों और विकास पर नोटबंदी के नकारात्मक प्रभाव शायद तीन तिमाहियों तक ही चले, लेकिन महिला एलएफपीआर में गिरावट नोटबंदी के पहले भी थी और बाद में भी थी। जिससे यही मतलब निकलता है कि यह नोटबंदी नहीं है जिसे इस प्रवृत्ति के लिए सबसे ज्यादा दोषी ठहराया जाना चाहिए। भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में गिरावट भी नोटबंदी से कम से कम दो तिमाही पहले आई थी (सकल घरेलू उत्पाद में जनवरी-मार्च 2016 की तिमाही में बढ़ोत्तरी हुई थी और 2016-17 की तीसरी तिमाही के मध्य में नोटबंदी लागू होने से पहले दो तिमाहियों में इसमें गिरावट आई थी)। इसलिए, चाहे महिला के साथ हो या पुरूष के साथ, नौकरियों के संकट पर असल जवाब कहीं और जाकर मांगा जाना चाहिए।

दूसरा बिन्दु यह है कि नौकरियों और विकास में सिकुड़न 2011 के बाद शुरू हुई, जब संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) को खर्च पर रोक लगानी पड़ी क्योंकि मुद्रा स्फीति और राजकोषीय घाटे नियंत्रण के बाहर हो गए थे।

राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सत्ता में आने के बाद, हमको दो साल तक एक के बाद एक सूखे का सामना करना पड़ा, और यह दो अन्य अपस्फीतिकर दबावों के साथ घटित हुआ: बहुत अधिक ऋण के तले दबे कॉर्पोरेट्स की दोहरी बैलेंस-शीट की समस्या और बैंकों के लिए बुरे ऋणों की बढ़ती हुई संख्या का भार। इसलिए, कोई भी नए कर्ज नहीं दिए जा सके।

राजकोष को ठीक करने हेतु, वित्त मंत्री ने अर्थव्यवस्था को पुनः संतुलित करने के लिए तेल की कीमतों में गिरावट की अनुमति नहीं दी, उन्होंने करों में अधिकांश गिरावट को अवशोषित कर लिया और राज्यों ने भी ऐसा ही किया, इस तरह से सरकार की बैलेंस-शीट में सुधार हुआ जिसने सार्वजनिक कार्यों (सड़कों, रेलवे) और कल्याण पर राज्य व्यय को सुगमता दी, जबकि निजी निवेश की वसूली नहीं हुई।

फिर आई नोटबंदी, लेकिन यह वस्तु और सेवाकर था जो सबसे बड़ा बाधक था, क्योंकि इसने अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को या तो सिकुड़ने या बदलने के लिए मजबूर करते हुए इस पर अपना प्रभाव डाला था। यह प्रवृत्ति कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) सदस्यता में वृद्धि में दिखाई दे रही है, लेकिन कोई नौकरियों में रैखिक वृद्धि की कल्पना नहीं कर सकता है। नौकरियां केवल अनौपचारिक से औपचारिक क्षेत्र में स्थानांतरित हुई हो सकती हैं।

तब हमारे पास एक और बड़ा व्यवधान था: इन्सॉल्वेंसी और बैंकरप्सी कोड (आईबीसी)। संपार्श्विक संपत्तियों के मूल्य में गिरावटों को देखते हुए बैंकों को अंततः दिवालियापन वाले मामलों पर कार्यवाही करनी होगी। इसने नौकरियों में वृद्धि को और ज्यादा प्रभावित किया है।

दूसरी तरफ, इसमें कोई संदेह नहीं है कि पिछले तीन वर्षों में, 2015 में अपरेंटिस अधिनियम में उदारीकरण के साथ, एनडीए सरकार का ध्यान रोजगार पर स्थानांतरित हुआ है। और औपचारिकरण, भले ही इसने थोड़े से समय के लिए रोजगार पर नकारात्मक प्रभाव डाला हो, लेकिन यह महिला भागीदारी की दरों में लाभ देगा क्योंकि महिलाएं आमतौर पर अनौपचारिक कार्यस्थल, जो अक्सर कानून के दायरे के बाहर काम करता है के बजाय औपचारिक कार्यस्थल को पसंद करेगी।

पिछले बजट में, वित्त मंत्री अरूण जेटली ने नौकरी सृजन पर अपनी प्रतिबद्धता पर पुनः जोर दिया था और विशेष रूप से महिलाओं के रोजगार को बढ़ावा देने के लिए और ज्यादा रियायतों की घोषणा की थी। उनकी घोषणा के बिंदु इस प्रकार थे –

“नौकरी के अवसर पैदा करना और रोजगार सृजन को सुगम बनाना हमारी नीति-निर्माण के केंद्र में रहे हैं। पिछले तीन वर्षों के दौरान, हमने देश में रोजगार सृजन को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए हैं। इन उपायों में शामिल हैं: –

  • नए कर्मचारियों के लिए सरकार द्वारा तीन साल तक कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) का 8.33 प्रतिशत योगदान।
  • कपड़ा, चमड़ा तथा फुटवियर जैसे बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार देने वाले क्षेत्रों में नए कर्मचारियों को सरकार द्वारा तीन साल तक कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) का 12 प्रतिशत योगदान।
  • आयकर अधिनियम के अंतर्गत नए कर्मचारियों के वेतन में से 30 प्रतिशत अतिरिक्त की कटौती।
  • 2020 तक 50 लाख युवाओं को प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए सरकार द्वारा बुनियादी प्रशिक्षण की लागत को साझा करने और वेतन की मदद के साथ राष्ट्रीय अपरेंटिसशिप योजना का शुभारंभ।
  • कपड़ा और फुटवियर क्षेत्र के लिए निश्चित अवधि के रोजगार की एक प्रणाली का आरंभ।
  • शिशुगृह के प्रावधान के साथ, भुगतान योग्य प्रसूति अवकाश को 12 हफ्तों से बढ़ाकर 26 हफ्ते करना।

“इस गति को आगे बढ़ाने के लिए, मुझे यह घोषणा करने में बहुत ही प्रसन्नता हो रही है कि सरकार अगले तीन वर्षों के लिए सभी क्षेत्रों के लिए ईपीएफ में नए कर्मचारियों की मजदूरी का 12 प्रतिशत योगदान देगी। इसके साथ ही, सभी क्षेत्रों में निश्चित अवधि के रोजगार की सुविधा दी जाएगी।”

“औपचारिक क्षेत्र में अधिक महिलाओं के रोजगार को प्रोत्साहित करने तथा शुद्ध वेतन में वृद्धि हेतु, नियोक्ता के योगदान में कोई बदलाव किए बिना, मौजूदा 12 प्रतिशत या 10 प्रतिशत की दर के विपरीत महिलाओं के रोजगार के पहले तीन सालों के लिए महिला कर्मचारियों के योगदान को 8 प्रतिशत तक कम करने के लिए, मैं कर्मचारी भविष्य निधि और विविध प्रावधान अधिनियम, 1952 में संसोधन का प्रस्ताव रखता हूँ।”

इसलिए, व्यास को स्वयं को यह पूरा यकीन दिलाना कि “बेरोजगारी की एक बड़ी समस्या नई सरकार द्वारा विरासत में मिलेगी” जल्दबाजी है, जब तक वह यह नहीं मान लेते कि सभी व्यवधान (जीएटी, आईबीसी आदि) बेकार थे और रोजगार सृजन के लिए प्रोत्साहन व्यर्थ थे।

कोई हमेशा यह मान सकता है कि बताए गए कुछ लाभ कुछ समय के लिए कागज पर ही रह सकते हैं, लेकिन इस बात से इंकार करने का कोई मतलब नहीं है कि नोटबंदी के बाद की अवधि के उपरांत रोजगार बाजार की बाधाओं के बाद इस सरकार ने बड़े पैमाने पर नौकरियों पर ध्यान केंद्रित किया है।

इन नीतियों के जमीन पर एक बार प्रभावी रूप से लागू होने के बाद कोई इस संभावना को खारिज नहीं कर सकता कि महिला और पुरूष दोनों की एलएफपीआर दरें एक धीमी वृद्धि के बाद तेजी से बढ़ सकती हैं।

हालांकि, कोई इस बात से इंकार नहीं कर सकता कि इन उपायों में से एक – उच्च प्रसूति लाभ – महिलाओं के लिए औपचारिक नौकरियों की संभावनाओं को और खराब कर सकता है क्योंकि छोटे नियोक्ता इसको एक अतिरिक्त अनावश्यक लागत मान सकते हैं।

कुल मिलाकर, व्यास बहुत ही निराशावादी होते हैं जब वह कम एफएलएफपीआर के लिए नोटबंदी को बहुत ज्यादा दोषी ठहराते हैं, जब अन्य व्यवधान एक अंतराल के बाद मूल्य प्रदान कर सकते हैं, जिसमें स्वस्थ बैलेंस शीट और अर्थव्यवस्था में अधिक औपचारिकरण शामिल है। रोजगार सृजन की नीतियों में किया गया परिवर्तन केवल बैलेंस शीट की समस्याओं को हल करने के बाद ही अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर सकता है।

हमेशा की तरह, सच्चाई भल्ला के अति आशावाद और व्यास के अति निराशावाद के बीच कहीं पर भी हो सकती है। 2017-18 से संबंधित एनएसएसओ सर्वेक्षण का अगला दौर कुछ ही महीनों में आने वाला है, जिसके बाद हमारे पास बेहतर जानकारी होगी।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।