अर्थव्यवस्था / भारती
वी (वोडाफोन-आइडिया) को राहत देना भारत के दूरसंचार क्षेत्र के हित में होगा या नहीं

सिर्फ दो दूरसंचार सेवा प्रदाताओं का होना भारत के लिए “दुखद होगा”, भारती एयरटेल के अध्यक्ष सुनील मित्तल ने हाल ही में कहा था और उनका संकेत था अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे वोडाफोन-आइिया (जो विलय के बाद वी हो गया) की ओर।

जनवरी-मार्च तिमाही में वी को 7,023 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था जो इससे पूर्ववर्ती तिमाही में 4,540 करोड़ रुपये के घाटे के डेढ़ गुना से भी अधिक है। इन घाटों से उबरने के लिए वी के पास संसाधन नहीं हैं और विश्लेषकों का अनुमान है कि इसे कम-से-कम 70,000 करोड़ रुपये के वित्तपोषण की आवश्यकता है।

मित्तल की तरह ही अन्य विशेषज्ञों का भी मानना है कि भारतीय दूरसंचार के लिए द्वयधिकार सही नहीं होगा जहाँ सिर्फ रिलायंस जियो एवं भारती एयरटेल- मात्र दो ही निजी दूरसंचार सेवा प्रदाता रह जाएँगे लेकिन सरकार ने अभी तक वी को राहत देने के लिए कोई नर्मी नहीं दिखाई है।

अक्टूबर 2019 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय में समायोजित सकल राजस्व (एजीआर) की परिभाषा में दूरसंचार कंपनियों को कोई राहत नहीं मिली थी लेकिन नवंबर 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्रीय कैबिनेट ने दो वर्षों की राहत देने का निर्णय लिया था।

इसके तहत दूरसंचार कंपनियों को लगभग 42,000 करोड़ रुपये का बकाया स्पेक्ट्रम शुल्क चुकाने के लिए दो वर्षों का अतिरिक्त समय दिया गया था और किश्तों की संख्या को भी 16 से बढ़ाकर 18 कर दिया गया था।

सभी दूरसंचार कंपनियों में से 23,920 करोड़ रुपये की सर्वाधिक राशि वोडाफोन-आइडिया को ही चुकानी थी लेकिन अब उसने दूरसंचार विभाग (डॉट) को पत्र लिखकर एक और अतिरिक्त वर्ष माँगा है। इसपर विभाग वित्त मंत्रालय के विचार जानने के बाद ही कोई कदम उठाएगा।

कंपनी का कहना है कि स्पेक्ट्रम शुल्क देने के लिए इसके पास पर्याप्त राशि नहीं है और जो पैसे जुटाए गए हैं, वे बकाया एजीआर के भुगतान में खर्च हो जाएँगे। अपेक्षा यह भी है कि वी के सीईओ और प्रबंध निदेशक रविंदर टक्कर डॉट के सचिव अंशु प्रकाश से भेंट करके उन्हें मनाने का प्रयास करेंगे।

रविंदर टक्कर

लेकिन अधिकारियों का मानना है कि यदि अवधि बढ़ाई जाती है तो वह एक कंपनी के लिए नहीं होगी एवं पूरे उद्योग के लिए अवधि बढ़ानी होगी। इस निर्णय का प्रभाव राजस्व संग्रह पर भी पड़ेगा इसलिए वित्त मंत्रालय की राय महत्त्वपूर्ण हो जाती है।

यदि अवधि नहीं बढ़ाई जाती है तो 9 अप्रैल 2022 तक वी को 8,292 करोड़ रुपये का भुगतान करना होगा। पत्र में वी ने दूरसंचार क्षेत्र में शुल्क युद्ध का भी उल्लेख किया है जो 2016 में जियो के प्रवेश से शुरू हुआ था और इसके कारण कंपनियाँ ग्राहकों से अधिक राजस्व नहीं वसूल पा रही हैं।

पिछले सप्ताह मित्तल ने भी कहा था कि एयरटेल शुल्क वृद्धि में संकोच नहीं करेगी लेकिन वह चाहती है कि अन्य कंपनियाँ भी इसमें साथ आएँ। आखिरी बार दिसंबर 2019 में शुल्क वृद्धि हुई थी लेकिन दूरसंचार कंपनियों को उबारने के लिए और शुल्क वृद्धि आवश्यक है।

ड्यूश बैंक की रिपोर्ट में भी कहा गया था कि वी को उबरने के लिए प्रति उपभोक्ता औसत राजस्व (एआरपीयू) 200 रुपये करना होगा और एयरटेल की ओर से भी 200 रुपये के आँकड़े को समर्थन मिला है। वर्तमान में वी का एआरपीयू 121 रुपये से घटकर 107 रुपये पर आ गया है।

वहीं मित्तल का कहना है कि वे अधिक शुल्क वृद्धि नहीं करना चाहते लेकिन उन्हें बाज़ार को भी देखना है। कुछ विशेषज्ञ इस बात की भी वकालत करते हैं कि सरकार को न्यूनतम शुल्क की सीमा तय करनी चाहिए ताकि दूरसंचार उद्योग स्वस्थ और शोधनक्षम रहे।

पिछले दो दशकों में वोडाफोन ने भारत में अरबों डॉलर का निवेश किया है लेकिन घाटे के बाद उसे आदित्य बिड़ला समूह के आइडिया के साथ विलय करना पड़ा था। वित्तीय वर्ष 2021 की पहली, दूसरी, तीसरी और चौथी तिमाही में इसने क्रमशः 1.13 करोड़, 80 लाख और 20-20 लाख ग्राहकों को खोया है।

अपेक्षा थी कि विलय से वी की समस्याएँ घट जाएँगी क्योंकि विलय होने पर यह कुल उपभोक्ताओं की दृष्टि से देश की सबसे बड़ी दूरसंचार सेवा प्रदाता बन गई थी। अक्टूबर 2019 में जहाँ वी के 37.2 करोड़ उपभोक्ता थे, वहीं एयरटेल और जियो के क्रमशः 32.5 करोड़ और 36.2 करोड़।

लेकिन अपेक्षा के अनुसार नहीं हुआ और भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) द्वारा जारी डाटा के अनुसार मार्च 2021 तक एयरटेल का ग्राहक आधार बढ़कर 35.23 करोड़ हो गया, जियो का 42.29 करोड़ और 28.37 करोड़ ग्राहकों के साथ वी सबसे पीछे रह गई।

यदि वी को सरकार से राहत भी मिलती है, तो भी वह मुश्किल से अपनी सेवाओं का परिचालन कर पाएगी और उन्नतीकरण व गुणवत्ता बढ़ाने के लिए उसके पास पर्याप्त पूँजी नहीं होगी। इसके लिए आवश्यकता होगी अधिक ग्राहक राजस्व की।

इसके अलावा अपनी परिसंपत्तियों को बेचकर भी वी कुछ राशि जुटाने का प्रयास कर रही है। अक्टूबर 2020 में कंपनी ने 25,000 करोड़ रुपये की वित्त एकत्रीकरण अभियान की घोषणा की थी जिसके तहत दो-तीन माहों में यह राशि जुटानी थी।

हालाँकि कंपनी को इसमें अधिक सफलता नहीं मिली है। डाटा केंद्रों के लिए रखी गई भूमि की बिक्री और कर वापसी से कंपनी को लगभग 3,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि जुटाने की अपेक्षा है लेकिन दिसंबर 2021 से अप्रैल 2022 तक उसका अनुमानित खर्च भी 22,500 करोड़ रुपये का है।

यदि अगले कुछ माहों में कंपनी पूँजी और वित्तपोषण प्राप्त नहीं कर पाती तो हो सकता है वह दिवालिया हो जाए। ऐसे में दूरसंचार क्षेत्र पर द्वयधिकार ही होगा क्योंकि सरकारी एमटीएनएल और बीएसएनएल अब प्रासंगिक नहीं बचे हैं।

जिस प्रतिस्पर्धा ने भारत के भीतरी क्षेत्रों को भी कम मूल्य पर दूरसंचार नेटवर्क से जोड़ दिया, उसका न होना उपभोक्ताओं के हित में नहीं होगा। वह भी उस समय जब भारती 5जी की चौखट पर खड़ा है, यह द्वयधिकार देश हित में भी नहीं होगा।

साथ ही यदि अंततः वी बंद ही हो जाए तो सहस्रों लोगों के रोजगार के नुकसान के साथ-साथ सरकार के लिए कंपनी पर जो ऋण है, उसकी वसूली करना भी कठिन हो जाएगा। वी को बंद होने की कगार पर खड़ा करने से बेहतर विकल्प है कि सरकार उसे राहत दे।

यह राहत सरकार पर अधिक बोझ नहीं डालेगी और जब दूरसंचार क्षेत्र उभरेगा तो सरकार इसकी भरपाई भी कर सकेगी। हालाँकि, एक उपभोक्ता मंच वी का फॉरेन्सिक ऑडिट करवाने की भी माँग कर रहा है जिससे पुष्टि हो सके कि कंपनी को सच में राहत प्राप्ति के योग्य है या नहीं।

इस एनजीओ ने सरकार को पत्र लिखकर राहत और न्यूनतम शुल्क की माँगों को अस्वीकार करने के लिए कहा है। उनका मानना है कि परिचालन और वित्तीय प्रबंधन में कमी के कारण आज वी पिछड़ा है। हालाँकि, किसी भी राहत के पहले सरकार अपनी ओर से पूरी जाँच तो करेगी ही कि वह पात्र है या नहीं।

एक और विकल्प हो सकता है कि सरकार वी का अधिग्रहण करके बीएसएनएल-एमटीएनएल के साथ उसका विलय करके उसे सरकारी कंपनी बना दे। लेकिन जो भी हो, कई कदम तो उठाना ही होगा क्योंकि बढ़ते सायबर क्षेत्र में दूरसंचार अर्थव्यवस्था के लिए एक गुणक की भूमिका निभाता है।

निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में वरिष्ठ उप-संपादक हैं। वे @nishthaanushree के माध्यम से ट्वीट करती हैं।