अर्थव्यवस्था
टीका मूल्य पर नवीनतम नीति सभी हितधारकों को कैसे साधती है

आदर्श रूप से भारत में सभी का निःशुल्क कोविड टीकाकरण किया जाना चाहिए क्योंकि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य का विषय है। वास्तव में, एक ऐसी वैश्विक महामारी जो कोई सीमा नहीं जानती, के बीच हर समृद्ध देश को, विशेषकर वे देश जिन्होंने पूर्वादेशों से टीका का भंडारण कर लिया, उन देशों की सहायता करनी चाहिए जिनके पास टीके की कमी है क्योंकि समृद्ध देश अपने अधिकांश लोगों का टीकाकरण कर चुके हैं या बचे लोगों का टीकाकरण करने के लिए उनके पास पर्याप्त टीके उपलब्ध हैं।

दूसरे शब्दों में कहा जाए तो बचे हुए टीकों का दान करके समृद्ध देश कम-से-कम दूसरे तरीके से परोपकार तो कर सकते हैं। कोविड के बदले हुए रूपों को आदत है कि वे कपट से किसी क्षेत्र में घुस जाएँ और संक्रमण फैलाएँ। अब जो है सो है। दुर्भाग्यवश भारत एक ऐसी परिस्थिति में है जहाँ वह अपनी पूरी योग्य जनसंख्या को तुलनात्मक रूप से कम समय में टीकाकृत नहीं कर सकता, जनसंख्या के कारण जोकि यूएस से चार गुना अधिक है।

भारत के विनर्माता उत्पादन बढ़ा रहे हैं जिसे शिखर पर पहुँचने में अभी भी कुछ महीने लगेंगे। इसी बीच सरकार ने नई टीका नीति जारी करके सही निर्णय लिया है। इसके तहत केंद्र सरकार घरेलू उत्पादन का 75 प्रतिशत (150 रुपये प्रति खुराक की दर पर) खरीदेगी और मुफ्त में इसे राज्यों को वितरित करेगी। वहीं, निजी अस्पतालों के पास स्वतंत्रता है कि वे बचे हुए 25 प्रतिशत टीके खरीद सकें।

निजी अस्पतालों को उस मूल्य पर टीका खरीदना होगा जिस दर की माँग विनिर्माता करते हैं। यहाँ विनिर्माताओं का उद्देश्य लाभ कमाना नहीं होगा, बल्कि उस नुकसान की भरपाई करना होगा जो केंद्र सरकार को कम मूल्य पर टीके उपलब्ध करवाकर उन्हें हो रहा है। इस प्रकार पहली दृष्टि में देखने पर हम पाते हैं कि सीरम इंस्टीट्यूट का प्रति खुराक 600 रुपये और भारत बायोटेक का 1,200 रुपये मूल्य सही है।

भारत बायोटेक अधिक मूल्य की माँग इसलिए कर रहा है क्योंकि उसकी कम उत्पादन क्षमता के कारण कंपनी की लागत अधिक है। मूल्य निर्धारण अंततः उत्पादन मात्रा पर आधारित होता है। वे अर्थशास्त्री जो विपरीत साक्ष्य देखने पर भी अपने विचार नहीं बदलते, उनके लिए यहाँ दो बातें हैं- निर्धनों के लिए क्रॉस-सब्सिडी (निजी क्षेत्र से अधिक मूल्य वसूली और सरकार के लिए सस्ते दर) की जा रही है।

दूसरी यह कि सरकार घरेलू विनिर्माताओं, विशेषकर भारत बायोटेक को प्रोत्साहित कर रही है जो अपने आविष्कार के साथ-साथ आईसीएमआर के साथ व्यावसायिक उत्पादन पर काम कर रहा है। किसी भी सरकार को निर्धनों और घरेलू विनिर्माताओं के बीच हितों के टकराव को संतुलित करना होगा। ऐसा सरकार राज्य सरकारों के माध्यम से 75 प्रतिशत टीके निःशुल्क करके कर रही है।

साथ ही 25 प्रतिशत टीके निजी अस्पतालों को दिए जा रहे हैं जिससे घरेलू विनिर्माता केंद्र सरकार को कम मूल्य पर देने वाले टीकों के नुकसान की भरपाई कर सकें। इस प्रक्रिया में तीनों हितधारकों का ध्यान रखा गया है- 1) निःशुल्क टीकों से निर्धनों को, 2) संपन्न और शीघ्र टीका लगवाने को इच्छुक लोगों का और 3) घरेलू विनिर्माताओं का।

निजी अस्पताल न सिर्फ टीके खरीदने में जो खर्च हुए, उसे पुनः कमा लेंगे बल्कि अपने कर्मचारियों को वेतन एवं अन्य खर्चों के लिए भी राशि निकाल सकेंगे क्योंकि केंद्र सरकार ने उन्हें प्रति खुराक अधिकतम 150 रुपये का सेवा शुल्क लेने की अनुमति दे दी है। हालाँकि कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसपर भी निशाना साध दिया है।

कुल मिलाकर हमारा विश्लेषण इसपर पहुँचता है कि जो लोग निजी केंद्रों पर कोविशील्ड की एक खुराक के लिए 750 रुपये या कोवैक्सीन की एक खुराक के लिए 1,350 रुपये खर्च करेंगे, वे उन लोगों को क्रॉस-सब्सिडी दे रहे हैं जो सरकारी सुविधाओं पर निःशुल्क टीका लगवा रहे हैं। इस प्रकार वे मुफ्त टीका न लेकर देश के हित में तो काम कर ही रहे हैं परंतु यह उनके हित में भी है क्योंकि उन्हें शीघ्र टीका मिल जाएगा जिससे उनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाएगी।

यह कुछ इसी प्रकार का अभियान है जिसमें संपन्न लोगों से निवेदन किया गया था कि वे अपनी एलपीजी सब्सिडी त्याग दें और भारतीय रेलवे में वरिष्ठ नागरिकों को मिलने वाली सब्सिडी के लिए भी ऐसा ही आह्वान था। यह एक हिताकारी चक्र है- संपन्न लोगों द्वारा दिया गया अधिक मूल्य निर्धन के लिए राशि प्रदान करता है और टीका विनिर्माताओं को उनका उत्पादन जारी रखने के लिए प्रोत्साहित करता है।

यह एक छोटा-सा योगदान है जो कई लोग सहर्ष देने के लिए तैयार है। क्रॉस-सब्सिडी हर जगह देखने को मिलती है। यूएस के विश्वविद्यालय अपने नागरिकों को 25 प्रतिशत शुल्क पर शिक्षा देते हैं और विदेशी छात्रों से पूरा शुल्क वसूलते हैं। एयरलाइन बिज़नेस क्लास यात्रियों के लिए एक अलग स्थान रखती हैं और उनसे शुल्क लेकर वे इकॉनोमी श्रेणी के यात्रियों को सस्ती यात्राएँ करवाती हैं।

आयकर भी क्रॉस-सब्सिडी का एक उदाहरण है- यह उनसे वसूला जाता है जो समर्थ हैं और खर्च किया जाता है जन कल्याणकारी योजनाओं पर जिनका केंद्र निर्धन होते हैं। हालाँकि कई बार यह उल्टा भी पड़ जाता है जैसे ईंधन पर कर से हो रहा है, कल्याणकारी योजना चलाने के लिए जुटाया जा रहा पैसा उनको भी परेशान करता है जिनके लिए यह जुटाया जा रहाहै, यानी निर्धनों को क्योंकि इससे सामान्य मूल्य भी बढ़ते हैं। हालाँकि, क्रॉस-सब्सिडी कुल मिलाकर हितकारी हैं।