अर्थव्यवस्था
मध्यप्रदेश की कृषि क्रांति: एक अनुकरणीय कथानक
मध्यप्रदेश कृषि क्रांति

मध्यप्रदेश में 2004-05 से 2014-15 के दशक में कृषि में वृद्धि की दर 4.5 प्रतिशत रही। पिछले पाँच वर्ष तो और भी अधिक शानदार रहे जबकि कृषि दर में वृद्धि 14.2 प्रतिशत प्रति वर्ष रही है।

कुछ दिनों पहले बिज़नेस स्टैण्डर्ड ने बताया कि मध्य प्रदेश में किसानों को पिछले एक वर्ष में ३२ प्रतिशत की संचयी आय वृद्धि हुई है। जिसके मुख्य कारण हैं कृषि गतिविधियों में अनाज वाली फ़सल से उच्च मूल्यों वाली फ़सलों के उत्पादन की ओर परिवर्तन और आवागमन के लिए बेहतर सड़कों का होना।

कृषि के क्षेत्र में इस बड़े परिवर्तन की वजह से सम्पूर्ण राज्य की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिल रहा है, जिससे कि 2004-05 में जो प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद 15,400 रुपये था वह अंततः 2014-15 में 50,000 रुपये हो गया है।

इस ज़बर्दस्त रिकॉर्ड को देखते हुए, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान को हाल ही में आयोजित राष्ट्रीय उद्योग परिषद् की गवर्निंग काउंसिल की बैठक के दौरान एक प्रस्तुति देने को कहा गया था। उन्होंने 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने के प्रधानमंत्री मोदी के लक्ष्य को हासिल करने के लिए रोडमैप प्रस्तुत किया।

अपनी प्रस्तुति में, चैहान ने पाँच क्षेत्रों का उल्लेख किया जहाँ सरकारों को ध्यान देने की ज़रूरत है: खेती की लागत में कमी; उत्पादकता में वृद्धि, उच्च मूल्य वाली फ़सलों के लिए कृषि गतिविधियों में बदलाव, कृषि उत्पादों के लिए बेहतर मूल्य, और बीमा की एक व्यापक प्रणाली और समय पर मुआवज़े के माध्यम से जोखिम को कम करना।

भारत के प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक श्री अशोक गुलाटी और उनकी टीम द्वारा लिखे गये एक उत्कृष्ट पत्र से मध्य प्रदेश के कृषि विकास के कारकों को समझने में मदद मिलती है। यह पत्र मध्य प्रदेश जैसी ही विशेषताओं वाले कुछ अन्य भारतीय राज्यों के लिए भी निश्चित ही सहायक होगा।

विविधता

अनाज और दलहन के बजाय उच्च मूल्य वाली फ़सलों, पशुधन और मत्स्य पालन में परिवर्तन मध्यप्रदेश के कृषि विकास के प्रमुख कारकों में से एक है। केवल पिछले पाँच वर्षों में ही, पशुपालन में राज्य का सकल राज्य घरेलू उत्पाद 8,976 करोड़ रुपये से 33,751 करोड़ रुपये और मत्स्य पालन में 650 करोड़ रुपये से 1,805 करोड़ रुपये हो गया है।

इसके अलावा दुग्ध उत्पादन 2006-07 में 6.4 मिलियन टन से बढ़कर 2014-15 में 10.8 मिलियन टन हो गया। वर्ष 2010-11 में सब्ज़ी उत्पादन 3.6 लाख टन से बढ़कर 2013-14 में 14.2 मिलियन टन हो गया, जो राज्य को सब्ज़ी उत्पादन में तेरहवें स्थान से चैथे स्थान पर ले गया। माँस उत्पादन 20,000 टन से 60,000 टन यानी तीन गुना बढ़ा है।

आई.सी.आर.ई.आर पेपर के निम्नलिखित चार्ट में कृषि उत्पादन में विविधता लाने में मध्य प्रदेश की सफलता का वर्णन किया गया है-

फल और सब्ज़ियाँ

कृषि और सम्बद्ध गतिविधियों से उत्पादन के सकल मूल्य के प्रतिशत के रूप में फल और सब्ज़ियों से उत्पादन का मूल्य

कृषि और सम्बद्ध गतिविधियों से उत्पादन के सकल मूल्य के प्रतिशत के रूप में फल और सब्ज़ियों से उत्पादन का मूल्य

दुग्ध उत्पादन

मध्यप्रदेश में दुग्ध उत्पादन

मध्यप्रदेश में दुग्ध उत्पादन

मछली पालन

मध्य प्रदेश में मछली पालन

मध्य प्रदेश में मछली पालन

माँस उत्पादन

 

मध्य प्रदेश में माँस उत्पादन

मध्य प्रदेश में माँस उत्पादन

सिंचाई

राज्य में कृषि की शानदार सफलता की कहानी लिखने में सिंचाई ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्ष 2000-01 में सकल सिंचित क्षेत्र में मात्र 4.3 मिलियन हेक्टेयर भूमि थी। यह 2014-15 में प्रभावशाली रूप से 10.3 मिलियन हेक्टेयर तक बढ़ गयी। 2000-01 में, मध्य प्रदेश में सिंचाई अनुपात 24 प्रतिशत था, जोकि पूरे भारत के औसत से 17.2 प्रतीशतता अंक कम था। 2013-14 तक, ये अनुपात नाटकीय रूप से बढ़कर 41.2 प्रतिशत हो गया, जोकि भारत के कुल औसत से केवल 6.2 प्रतिशत ही कम है। यही राज्य द्वारा विकसित किये गये प्रभावशाली सिंचाई ढाँचे का संकेत है। 2014-15 तक, मध्य प्रदेश में सिंचाई अनुपात 42.8 प्रतिशत तक पहुँच गया।

सकल फ़सली क्षेत्र के प्रतिशत के रूप में सकल सिंचित क्षेत्र

सकल फ़सली क्षेत्र के प्रतिशत के रूप में सकल सिंचित क्षेत्र

मुख्यमंत्री शिवराज चैहान के समय में मध्य प्रदेश सरकार ने सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के निवेश के माध्यम से कुँओं, टूब वेल, टंकियों/तालाबों और सरकारी नहरों के द्वारा सिंचाई के बुनियादी ढाँचे का एक प्रभावशाली नेटवर्क स्थापित करने में कामयाबी हासिल की है। वर्ष 1994 में 0.9 मिलियन हेक्टेयर के क्षेत्र में टूब वेल द्वारा सिंचाई की जाती थी, जबकि 2013-14 में ये बढ़कर 3.2 मिलियन हेक्टेयर हो गया। कुँओं द्वारा सिंचित क्षेत्र 1.9 मिलियन हेक्टेयर से बढ़कर 3.3 मिलियन हेक्टेयर हो गया, जबकि सरकारी नहरों द्वारा सिंचाई की सुविधा 2000-01 में 0.9 मिलियन हेक्टेयर से बढ़कर 2013-14 में 1.8 मिलियन हेक्टेयर हो गयी, और टंकियों द्वारा सिंचाई की सुविधा 0.1 मिलियन हेक्टेयर से बढ़कर 0.3 मिलियन हेक्टेयर हो गयी।

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स्रोत-वार सकल सिंचित क्षेत्र

स्रोत-वार सकल सिंचित क्षेत्र

बिजली

राज्य में कृषि उपयोग के लिए बिजली की स्थिति में सुधार के लिए चौहान सरकार ने निम्नलिखित हस्तक्षेप किये:

—राज्य में 24 घंटे बिजली आपूर्ति सुरक्षित की गई, जिसमें से आठ घंटे केवल कृषिकार्यों के लिए ही थे।

—दो किश्तों में भुगतान के प्राविधान के साथ प्रतिवर्ष 1,200 रुपये मात्र के रेट पर कृषि कार्यों के लिए बिजली दी गई।

—कृषि के लिए विशेष ग्रामीण फ़ीडर दिये गये, 43,517 गाँवों को 11 किलोवाट के 71,688 किमी लाइन वाले फ़ीडर दिये गये, जिनमें 21 किलोवाट के 1,516 ट्रांसफार्मर शामिल हैं।

—केंद्र द्वारा प्रायोजित दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना का आक्रामक कार्यान्वयन, जोकि 2014 में कृषि और ग़ैर कृषि उपभोक्ताओं के लिए फ़ीडर को अलग-अलग करने के लिए शुरू की गयी थी।

मध्य प्रदेश में कुल बिजली खपत में कृषि का क़रीब 33.7 प्रतिशत है, जोकि राष्ट्रीय औसत 20.8 प्रतिशत और पंजाब (30 प्रतिशत), गुजरात (23.6 प्रतिशत) और महाराष्ट्र (22 प्रतिशत) से अधिक है।

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कुल बिजली खपत में कृषि का हिस्सा 2012-13

कुल बिजली खपत में कृषि का हिस्सा 2012-13

सड़कें

तीसरा महत्वपूर्ण कारक जिसने कृषि विकास में योगदान दिया है, वह सभी मौसम में चलने वाली सड़कों का निर्माण था। मध्य प्रदेश में सड़क घनत्व 2000-01 में प्रति हज़ार वर्ग कि.मी. पर 526.8  कि.मी. था। यह संख्या 2012-13 में 742.3 थी।

इस बीच समतल सड़कों का प्रतिशत कुल सड़कों के 49 प्रतिशत से बढ़कर 68 प्रतिशत हो गया है। इसने किसानों को एक बड़े क्षेत्र के बाज़ारों तक पहुँचने में सक्षम बनाया और इस तरह से उनके बाज़ार जोख़िम को कम किया।

मध्यप्रदेश में सड़कों का विकास

मध्यप्रदेश में सड़कों का विकास

ख़रीद

बेहतर सड़कों, अधिक बिजली और बढ़ी हुई सिंचाई की उपलब्धता के कारण, खेतों की उत्पादकता में वृद्धि हुई है। गेहूँ के उत्पादन के लिए तो ये विशेषतया सही है जैसा कि नीचे दिये गये चार्ट में दिखाया गया है। इसका मुख्य कारण यह भी है कि राज्य सरकार ने 2007-08 और 2012-13 के बीच प्रति क्विंटल गेहूँ के लिए केंद्र के न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सौ रुपये और 2013-14 और 2014-15 में 150 रुपये बोनस दिये।

मध्य प्रदेश में गेहूँ, सोयाबीन और चने का उत्पादन

मध्य प्रदेश में गेहूँ, सोयाबीन और चने का उत्पादन

इसका नतीजा ये हुआ कि पहले ख़रीद पूल में नाममात्र का योगदान करने वाला प्रदेश मात्र दस वर्षों ही दूसरा सबसे बड़ा योगदान कर्ता बन गया।

हालाँकि, यह सफलता सरकार द्वारा उठाये गये विभिन्न क़दमों से प्राप्त की गई।

1. गेहूँ ख़रीद पूल के दो अन्य बड़े योगदानकर्ताओं से तुलना की जाय तो मध्य प्रदेश ने न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कर कम रखा, नतीजतन निजी क्षेत्र ने हरियाणा और पंजाब की अपेक्षा मध्य प्रदेश से ज़्यादा ख़रीद की।

2. हरियाणा और पंजाब के विपरीत, मध्य प्रदेश ने अपनी ख़रीद प्रक्रिया विकेन्द्रीकृत की। मध्य प्रदेश ने आढ़तियों के बजाय, सहकारी समितियों के माध्यम से ख़रीद करने का फ़ैसला किया।

3. अधिक उत्पादन का अर्थ था कि अधिक गेहूँ मण्डियों में आने लगा। इस उपज की खरीद की प्रक्रिया धीमी और भ्रष्ट थी। मध्य प्रदेश ने ख़रीद की प्रक्रिया को सरल और सहज बनाने के लिए ‘ई-उपार्जन की डिजिटल व्यवस्था की पहल की।

4. उत्पादन और ख़रीद में वृद्धि का अर्थ हुआ कि राज्य को भंडारण के लिए अधिक सुविधाओं की ज़रूरत है। राज्य ने अपनी भंडारण क्षमता बढ़ाई है। साथ ही सरकार और अधिक कोल्ड स्टोरेज खोलने पर ध्यान केंद्रित कर रही है ताकि उत्पादन का नुक़सान होने से बचाया जा सके।

मध्य प्रदेश में गेहूँ का उत्पादन और ख़रीद

मध्य प्रदेश में गेहूँ का उत्पादन और ख़रीद

 

राज्यवार गेहूँ की ख़रीद प्रतिशत में

राज्यवार गेहूँ की ख़रीद प्रतिशत में

मशीनीकरण और कृषि ऋण

मशीनीकरण से उत्पादकता बढ़ती है। हालाँकि, यंत्रीकरण के सार्वभौमीकरण में छोटी भूमि होल्डिंग्स एक बड़ी समस्या साबित हुई है। छोटे किसानों के लिए मशीनीकरण को और किफ़ायती बनाने के लिए मध्य प्रदेश ने यंत्रदूत योजना का आरम्भ किया, जिसके तहत किसान उन्हें ख़रीदने के लिए मोटी रकम इकठ्ठा करने के बजाय कृषि उपकरण किराये पर ले सकते हैं। सरकार ने युवाओं को सब्सिडी और आकर्षक बैंक ऋण देकर किराये पर मशीनें देने के लिए केंद्र खोलने के लिए भी प्रोत्साहित किया। सरकार ने किसानों को बिना मूल्य के कुछ छोटे उपकरण भी प्रदान किये हैं।

इसके परिणामस्वरूप कृषि मशीनरी के इस्तेमाल मंे तेज़ी आई है, जैसाकि नीचे चार्ट में दिखाया गया है।

मध्य प्रदेश में ट्रैक्टर की बिक्री

मध्य प्रदेश में ट्रैक्टर की बिक्री

मध्य प्रदेश में कृषि मशीनरी का संचित उपयोग

मध्य प्रदेश में कृषि मशीनरी का संचित उपयोग

किसानों के लिए ऋण की अनुपलब्धता एक बड़ी समस्या है, वर्ष 2012-13 में 2006-07 की 16-17 फ़ीसदी ब्याज दर को शून्य तक लाने के लिए मध्य प्रदेश ने राज्य के स्वामित्व वाले सहकारी बैंकों के माध्यम से एक नई ऋण योजना आरम्भ की। परिणामस्वरूप, ऋण अदायगी 2006-07 में 3.33 अरब रुपये से बढ़कर 2013-14 में 12.1 अरब रुपये हो गयी।

अल्पावधि कृषि ऋण

अल्पावधि कृषि ऋण

मध्य प्रदेश में कृषि की सफलता की यह कहानी भारत के कई राज्यों के लिए सीखने लायक़ सबक़ है जो अपने यहाँ कृषि को आगे बढ़ाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। भारत के बिल्कुल मध्य में स्थित इस प्रदेश में ऐसे कई उदाहरण हैं जो इक्कीसवीं सदी में देश की कृषि की सफलता के केंद्र साबित हो सकते हैं।