अर्थव्यवस्था
कपड़ा मंत्रालय ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लिए क्या कर रहा है, केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी से जानें

केंद्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी ने वेदांता के सहयोग से स्वराज्य द्वारा आयोजित ‘रोड टू आत्मनिर्भर भारत’ वेबिनार शृंखला के गुरुवार (8 अप्रैल) को आयोजित सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लाए गए कृषि कानूनों का समर्थन करते हुए कहा कि आत्मनिर्भरता की शुरुआत रोटी-कपड़ा-मकान से होनी चाहिए जो कि हो रही है।

कोविड काल में विभिन्न मंत्रालयों ने मिलकर कैसे पीपीई किट व अन्य सुविधाओं के लिए काम किया, यह बताते हुए उन्होंने कपड़ा मंत्रालय को विदेश मंत्रालय और नागरिक उड्डयन मंत्रालय से मिले सहयोग की बात कही। “चुनौती के समय भी हम अपने विनिर्माण क्षेत्र को सही दिशा में परिवर्तित कर सके”, उन्होंने कहा।

कपड़ा उद्योग में आत्मनिर्भरता का एक आवश्यक पहलू हैं कपड़ा बनाने वाली मशीनें जो भारत में बहुत कम बनती हैं। इसके लिए विजय राघवन के मार्गदर्शन में कई भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मशीनों को भारत में बनाने के लिए काम कर रहे हैं, किस प्रकार की मशीनों की आवश्यकता होती है, यह उन्हें बता दिया गया है।

इस दिशा में उन्हें चुनौती का सामना करना पड़ रहा है कि अभियांत्रिकी संबंधित चीज़ें कपड़ा मंत्रालय के अधीन नहीं आती हैं लेकिन प्रधानमंत्री का सहयोग उन्हें मिल रहा है। कपड़ा मशीनों को बनाने के लिए जो सब्सिडी सहयोग उपलब्ध है, उसकी जानकारी भी कई अभियांत्रिक संस्थानों को दे दी गई है, ईरानी ने बताया।

उन्होंने एक उदाहरण दिया कि सूरत में लॉकडाउन के बाद दक्षिण गुजरात के चैंबर ऑफ कॉमर्स ने उन्हें कुछ अभियंताओं से मिलाया जिन्होंने लॉकडाउन के दौरान अपने गैराज में एक मशीन की प्रतिकृति बनाई जो विदेशी मशीनों से सस्ती और अधिक उत्पादकता वाली है, अब इसका व्यावसायीकरण चुनौती है।

“केंद्रीय रेशम बोर्ड के लिए हमने 75 मशीनों को वित्तपोषित किया है और 25 अतिरिक्त मशीनों को भी उपलब्ध करवाया जाएगा ताकि रेशम उद्योग आगे बढ़ सके लेकिन ये मशीनें भारत में निर्मित होंगी या नहीं, यह अभी देखना होगा।”, स्मृति ईरानी ने साझेदारियों की सहायता से मशीन बनाने पर आशा व्यक्त की।

मशीनों के घरेलू विनिर्माण के लिए तकनीक अपग्रेडेशन फंड की आवश्यकता उन्होंने बताई। हथकरघा क्षेत्र को बल देने के लिए डाटा एकत्रित किया जा रहा है और सभी कारीगरों को नेशनल हैंडलूम से जोड़ने के लिए पहचान-पत्र दिया जा रहा है। ईरानी चाहती हैं कि डिज़ाइन के मामले में हथकरघा उद्योग को सहयोग मिले।

पावरलूम की बेहतर गति, सरलता और कुशलता के कारण कई कारीगर इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं क्योंकि ग्राहक हैंडलूम को भी पावरलूम के मूल्य पर खरीदना चाहते हैं जो कारीगरों के लिए संभव नहीं है। मुद्रा योजना और संवर्धन योजना के माध्यम से कारीगरों की वित्तीय सहायता की जा रही है।

हथकरघा समुदाय के युवा भी दूसरे रोजगार करना चाहते हैं और उनकी शिक्षा के लिए सरकार काम कर रही है। जेम मंच पर 1.5 लाख कारीगरों को लाया गया है ताकि उनसे सीधे उत्पाद खरीदे जा सकें। उन्होंने यह बताया कि कई मंत्रालय हथकरघा उद्योग को बढ़ावा देने के लिए काम कर रहे हैं।

इन उत्पादों के बाज़ारीकरण के लिए ऐसे लोगों को ढूंढा जा रहा है जिन्हें पहले किसी योजना का लाभ नहीं मिला है। “जब हमने आई लव हैंडलूम शुरू किया तो समस्या आई कि उत्पाद पर रंग नहीं टिक पा रहा था, अब हमने 70 से अधिक प्राकृतिक रंगों को हथकरघा के लिए चुना है जो टिकता है।”, ईरानी ने बताया।

बाज़ारीकरण के लिए वे नहीं चाहते कि सरकार हस्तक्षेप करे बल्कि यह काम निजी कंपनियाँ स्वयं करें। वे मात्र जो लोग बाज़ारों तक पहुँच नहीं पा रहे हैं, उनकी सहायता कर रहे हैं। विश्व अधिकांश मानव-निर्मित सूत का कपड़ा पहनता है जबकि भारत में प्राकृतिक सूत अधिक प्रचलित है जिससे निर्यात के मामले में हम पीछे रह जाते हैं।

इसके लिए 6,000 करोड़ रुपये का पैकेज लाया गया था लेकिन कोविड आ गया जिससे काम नहीं हो पाया। अब टेक्निकल और मानव-निर्मित सूत से बने कपड़ों के प्रोत्साहन के लिए 10,000 करोड़ रुपये की पीएलआई  योजना लाने पर विचार चल रहा है। इसपर उद्योग से पाँच बार वार्ता हो चुकी है।

ईरानी नहीं चाहतीं कि बांग्लादेश या किसी अन्य स्थान पर बना कपड़ा भारत आए और यहाँ सिर्फ सिला जाए और उसी में कंपनियाँ सब्सिडी का लाभ भी उठा लें। वे चाहती हैं कि पूरे उद्योग को पीएलआई योजना का लाभ मिले और इन बिंदुओं पर विचार करने के बाद ही योजना को अंतिम रूप दिया जाएगा।

जब उनसे पूछा गया कि कपड़ा मंत्रालय की वर्तमान प्राथमिकताएँ क्या हैं तो उन्होंने दो बिंदु बताए। पहला, पीएलआई योजना को लाना जिसपर ज़मीनी काम हो चुका है और दूसरा मित्रा जिसके तहत 7 मेगाटेक्सटाइल पार्क बनाए जाएँगे।

वे कहती हैं कि ये मेगापार्क इसलिए संभव हो पा रहे हैं क्योंकि श्रम सुधार आ चुके हैं। पहले श्रम कानूनों के कारण कंपनियाँ छोटी-छोटी इकाइयों के रूप में अलग-अलग राज्यों में काम करती थीं लेकिन अब एक छत के नीचे शुरू से अंत तक का काम हो सकेगा।

हालाँकि इसके लिए वे राज्यों की प्रतिबद्धता, विशेषकर भूमि और श्रम सुधारों, ऋण देने में एकरूपता, कर लाभ और विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करना चाहती हैं। टेक्निकल टेक्सटाइल एक उभरता हुआ क्षेत्र है जिसमें संभावनाएँ अधिक हैं लेकिन राज्य इससे परिचित नहीं हैं, ईरानी कहती हैं कि राज्यों को समझाया जाएगा।

जब पूछा गया कि कपड़ा उद्योग के लिए कच्चा माल कम मूल्य पर मिले, इसके लिए क्या किया जा रहा है तो उन्होंने बताया कि भारतीय कपास निगम अपनी प्रणाली पर काम कर रहा है। कपास एमएसपी पर ही खरीदा जा रहा है लेकिन पारदर्शिता बढ़ी है, किसानों को प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरित किया जा रहा है।

छोटे किसानों को प्राथमिकता दी जा रही है और फिंगर प्रिंट जैसी तकनीकों का उपयोग हो रहा है ताकि किसान के बदले कोई बिचौलिया उत्पाद न बेचे। ईरानी के अनुसार यह सब दो साल पहले पंजाब में हुआ है, भले ही आज कुछ राजनीतिक विरोधी आढ़तियों के माध्यम से भुगतान पर ज़ोर दे रहे हों।

वहीं, कच्चा माल बेचने के लिए भी निगम छोटे उद्योगों को प्राथमिकता देता है। हालाँकि ईरानी का मानना है कि मूल्य में हस्तक्षेप के परिणाम विनाशकारी होते हैं इसलिए वे चाहती हैं कि मूल्य स्वाभाविक रूप से उद्योग के अनुकूल बने। अंत में वे कहती हैं कि मंत्रालय काफी तेज़ी से काम कर रहा है, अब उद्योग को साथ आना होगा।