अर्थव्यवस्था
स्वराज्य द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का साक्षात्कार – भाग 1: भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति
मोदी साक्षात्कार

प्रसंग
  • प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘स्वराज्य’ को एक विशेष साक्षात्कार दिया, जिसमें चिदंबरम की बजट चालबाजियाँ, रोजगार सृजन, कृषि क्षेत्र की पहलें, निजीकरण पर जोर, जीएसटी की प्रगति और न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन पर विचार शामिल हैं।

30 जून को स्वराज्य द्वारा लिए गए एक स्वतंत्र और बेबाक साक्षात्कार में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2014 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के हाथों से सत्ता प्राप्त करने के बाद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार द्वारा सामना की गई चुनौतियों, आर्थिक सुधारों को लेकर उनका रवैया, विशेष रूप से सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों का निजीकरण, भारतीय बैंकिंग को पटरी पर लाने में किए गए प्रयास, 2019 में एनडीए के खिलाफ महागठबंधन की राजनीतिक चुनौतियों, एनडीए के अपने सहयोगियों की समस्याएं, कश्मीर संकट, प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में सत्ता का तथाकथिक केन्द्रीकरण और भारतीय जनता पार्टी में काबिल लोगों की कमी सहित कई मुद्दों पर बात की।

साक्षात्कार में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी निम्नलिखित बिन्दुओं पर चर्चा करते हैं:

पहला, अर्थव्यवस्था की हालत उनकी कल्पना से भी बहुत बदतर थी और बजट के कुछ आंकड़े काफी संदिग्ध थे। सीधे शब्दों में कहें तो, उन्होंने बताया कि पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम द्वारा वर्णित बजट के आँकड़ों में सरकार के वित्त का सही विवरण नहीं था। लेकिन मोदी ने फैसला लिया कि वह इन आँकड़ों के साथ राजनीति नहीं करेंगें, क्योंकि देश इस संकट को और बढ़ाने का जोखिम नहीं उठा सकता था।

दूसरा, नौकरियों की कमी पर उन्होंने कहा कि, ”नौकरियों की कमी की अपेक्षा, नौकरियों पर डेटा की कमी एक मुद्दा है”। पहले इसे ठीक करने की जरूरत है। इसके अलावा, कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) द्वारा जारी आंकड़े औपचारिक क्षेत्र की नौकरियों में वृद्धि दर्शाते हैं, अनौपचारिक क्षेत्र की नौकरियों में भी वृद्धि हुई होगी, और साथ ही मुद्रा ऋण द्वारा पैदा हुए रोजगार में भी। उन्होंने आगे कहा, “नौकरियों को मापने का हमारा पारंपरिक तरीका नए भारत की नई अर्थव्यवस्था में नई नौकरियों को मापने के लिए पर्याप्त नहीं है।”

तीसरा, कृषि संकट का मुद्दा और किसानों की आय दोगुनी करने वाले वादे पर चार स्तरीय रणनीति के तहत चर्चा हो रही है, जिसमें लागत में कटौती, उपज की कीमतें बढ़ाना, कटाई और उसके बाद होने वाले नुकसान को कम करना तथा आय उत्पन्न करने के अधिक अवसरों का निर्माण करना शामिल है। उन्होंने ‘स्वराज्य’ को बताया, “अगर आप हमारी नीतियों पर करीब से ध्यान दें, तो इनका (नीतियों का) हर उद्देश्य किसानों की सहायता करना है यानि– बीज से बाजार तक।“

‘स्वराज्य’ के संपादकीय निदेशक आर. जगन्नाथ, सीईओ प्रसन्ना विश्वनाथन और प्रकाशक अमर गोविंदराजन को दिए गए साक्षात्कार का पहला खंड निम्नलिखित है। वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) पर मोदी के विचारों से संबंधित साक्षात्कार का एक भाग 1 जुलाई को प्रकाशित किया गया था क्योंकि इसी दिन भारतीय इतिहास के सबसे बड़े कर सुधार की पहली सालगिरह थी।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2014 में चिदंबरम के बजट की चालबाजियों को उजागर क्यों नहीं किया    

स्वराज्यः 2014 में, हमने सोचा था कि मोदी सरकार भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति पर एक श्वेत पत्र जारी करेगी। हालांकि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। आपने ऐसा क्यों नहीं किया?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः जब आप कहते हैं कि विभिन्न विशेषज्ञों और राजनीतिक पंडितों की यह राय थी कि देश की आर्थिक स्थिति पर एक श्वेत पत्र जारी किया जाना चाहिए तो आप बिलकुल सही हैं।

2014 में भाजपा के चुनाव प्रचार के प्रमुख एजेंडे में से एक एजेंडा भारतीय अर्थव्यवस्था के निराशाजनक प्रबंधन पर प्रकाश डाल रहा था जिसको एक “अर्थशास्त्री” प्रधानमंत्री और “सब कुछ जानने” वाले वित्त मंत्री संभाल रहे थे।

हम सभी जानते थे कि अर्थव्यवस्था मंदी में थी लेकिन चूँकि हम सरकार में नहीं थे इसलिए स्वाभाविक रूप से हमारे पास अर्थव्यवस्था की पूरी स्थिति का विवरण नहीं था। लेकिन जब हमने सरकार बनाई तो हमने जो देखा उससे हम चौंक गए!

अर्थव्यवस्था की हालत इतनी बदतर थी कि कल्पना भी नहीं की जा सकती। चीजें बहुत ही भयानक थीं। यहाँ तक कि बजट के आँकड़े भी संदिग्ध थे।

स्वराज्य: आपको जिन चीजों पर शक था उन्हें उजागर क्यों नहीं किया?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः जब यह सब प्रकाश में आया, तब हमारे पास दो विकल्प थे – क्या हमें राजनीति द्वारा संचालित होना चाहिए (राजनीतिक विचारधारा) या राष्ट्रनीति द्वारा निर्देशित होना चाहिए (भारत के हितों को पहले रखना)।

जैसा कि आपको याद होगा, मैंने अभियान के दौरान स्पष्ट रूप से कहा था कि ‘सौगंध मुझे इस मिट्टी की, मैं देश नहीं झुकने दूँगा’। हमारी सरकार ने इस वादे को निभाया है।

राजनीति, या 2014 में अर्थव्यवस्था की स्थिति पर राजनीति करना, हमारे लिए अत्यंत सरल और राजनीतिक रूप से फायदेमंद होता। हमने एक ऐतिहासिक चुनाव जीता था इसलिए जाहिर तौर पर उन्माद एक अलग स्तर पर था। कांग्रेस पार्टी और उनके सहयोगी बड़े संकट में थे। यहाँ तक मीडिया के लिए भी यह महीनों तक ख़बरों में रहता।

दूसरी ओर राष्ट्रनीति थी, जहां राजनीति और मौके का फायदा उठाकर खुद को श्रेष्ठ साबित करने से ज्यादा सुधार की आवश्यकता थी।

कहने की आवश्यकता नहीं है कि हमने पहले राजनीति को वरीयता देने के बजाय ‘इंडिया फर्स्ट’ को वरीयता देना पसंद किया। हम गुप्त तरीके से मुद्दों को आगे बढ़ाना नहीं चाहते थे, लेकिन हम मुद्दे पर चर्चा करने में अधिक रुचि रखते थे। हमने भारतीय अर्थव्यवस्था को सुधारने, दृढ़ बनाने और परिवर्तित करने पर अपना ध्यान केंद्रित किया।

स्वराज्य: क्या चीजों को उजागर करना स्थिति को और खराब करता ?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः भारतीय अर्थव्यवस्था में क्षय के बारे में विवरण अविश्वसनीय था। यह क्षय एक बड़े संकट का कारण बनने में सक्षम था।

2014 में, उद्योग भारत से पलायन कर रहे थे। भारत पांच कमजोर देशों की श्रेणी में था। विशेषज्ञों का मानना था कि ब्रिक्स में से ‘आई’ का पतन हो जाएगा। सार्वजनिक भावनाओं में निराशावाद था।

अब, इस सब के बीच में, कल्पना कीजिए कि एक श्वेत पत्र गलतियों का विवरण देते हुए सबके सामने आता है। संकट के लिए शमनकारी होने के बजाय यह संकट को बढ़ाने में एक गुणक का कार्य करता।

विभिन्न क्षेत्रों में स्थिति विध्वंसक थी। हमने इस असहज सत्य को स्वीकार कर लिया और चीजों को स्थिर करने के लिए पहले ही दिन से तेज प्रयास करने शुरू कर दिए ताकि भारतीय अर्थव्यवस्था को एक लंबे सफ़र के लिए मजबूत किया जा सके।

हमने कई राजनीतिक आरोपों को सहन करते हुए राजनीतिक क्षति को भी स्वीकार किया सुनिश्चित किया कि हमारे देश को कोई नुकसान न पहुंचे।

हमारे दृष्टिकोण के सकारात्मक परिणाम सभी के सामने हैं। आज, भारत वृद्धि के मजबूत बुनियादी सिद्धांतों के साथ दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई एक विशाल अर्थव्यवस्था वाला देश है। विदेशी निवेश उच्चतम स्तर पर है, जीएसटी ने कर व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव किया है, व्यवसाय करने के लिए भारत पहले से कहीं ज्यादा सुगम स्थान और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम विश्वास और आशावाद के अभूतपूर्व स्तरों  को देख रहे हैं।

यदि राज्य लाखों में नौकरियों का निर्माण कर रहे हैं, तो क्या केंद्र बेरोजगारी उत्पन्न कर सकता है?

स्वराज्य: हम इन मुद्दों में से कुछ पर विचार-विमर्श करेंगे। लेकिन सबसे पहली चुनौती है रोजगार। नौकरियां कहां हैं? विपक्ष को यह सवाल पूछने में काफी हद तक बल मिल रहा है …

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः इस मुद्दे पर, नौकरियों की कमी से कहीं ज्यादा, नौकरियों पर डेटा की कमी है। हमारे विरोधी स्वाभाविक रूप से अपनी पसंद की एक छवि बनायेंगे और हम पर आरोप लगाते हुए इस अवसर का फायदा उठाएंगे। रोजगार के मुद्दे पर हम पर आरोप लगाने के लिए मैं अपने विरोधियों को दोषी नहीं ठहराता हूं, आखिरकार किसी के पास नौकरियों पर कोई सटीक डेटा नहीं है। नौकरियों को मापने का हमारा पारंपरिक तरीका नए भारत की नई अर्थव्यवस्था में नई नौकरियों को मापने के लिए पर्याप्त नहीं है।

स्वराज्यः तो हम नौकरियों का मापन कैसे करें? हम यहाँ से कहाँ जाएँ?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः जब हम अपने देश में रोजगार के रुझानों को देखते हैं, तो हमें यह ध्यान रखना होता है कि आज, हमारे युवाओं की दिलचस्पी और आकांक्षाएं विविध हैं। उदाहरण के लिए, देश में सामान्य सेवा केंद्रों को चलाने वाले ग्रामीण स्तर पर तीन लाख उद्यमी हैं तथा ये और रोजगार पैदा कर रहे हैं। पीएम मोदी ने कहा कि स्टार्ट-अप नौकरियों की संख्या बढ़ रही है और यहां लगभग 15,000 स्टार्ट-अप्स हैं, जिसे सरकार ने मदद दी है और कई का संचालन शुरू होने वाला है। विभिन्न प्रकार के एग्रीगेटर हजारों युवाओं को रोजगार देते हैं।

प्रधानमंत्री ने कहा कि अगर हम रोजगार के आंकड़ों को देखें तो ईपीएफओ के पेरोल डेटा के अनुसार, सितंबर 2017 से अप्रैल 2018 तक 41 लाख औपचारिक नौकरियों का सृजन हुआ है। ईपीएफओ के डेटा पर अध्ययन के अनुसार, पिछले वर्ष औपचारिक क्षेत्र में 70 लाख नौकरियों का सृजन हुआ था।

अब, आप जानते हैं कि अनौपचारिक क्षेत्र सभी नौकरियों का लगभग 80 प्रतिशत सृजन करता है। हम यह भी जानते हैं कि औपचारिक क्षेत्र में नौकरियों के सृजन से अनौपचारिक क्षेत्र में भी अतिरिक्त उत्पाद प्रभाव (स्पिन ऑफ इफेक्ट) पैदा हो सकता है। अगर औपचारिक क्षेत्र में आठ महीने में 41 लाख नौकरियां पैदा हुई हैं, तो कुल औपचारिक और अनौपचारिक क्षेत्र की नौकरियां कितनी होंगी?

स्वराज्यः लेकिन विशेषज्ञ अभी भी आपके नौकरियों को मापने के इस तरीके पर संदेह करते हैं …

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः आजादी से लेकर पिछले साल जुलाई तक भारत में लगभग 66 लाख पंजीकृत उद्यम थे। केवल एक वर्ष में, 48 लाख नए उद्यम पंजीकृत हुए हैं। क्या इसका परिणाम अधिक औपचारिकीकरण और बेहतर नौकरियां नहीं होगा?

मुद्रा योजना के तहत 12 करोड़ से अधिक ऋण प्रदान किए गए हैं। क्या यह उम्मीद करना अनुचित है कि एक ऋण, कम से कम एक व्यक्ति के लिए आजीविका के साधनों का निर्माण या इसके लिए मदद करेगा?

पिछले एक साल में लगभग एक करोड से अधिक घरों का निर्माण किया गया है; इसने कितने प्रतिशत रोजगार पैदा किया होगा? यदि सड़क निर्माण प्रति माह दोगुने से अधिक है, यदि रेलवे, राजमार्ग, एयरलाइंस आदि में जबरदस्त बढ़ोत्तरी हुई है, तो यह क्या इशारा करता है? क्या समान अनुपात में अधिक रोजगार के बिना यह संभव है?

हाल ही में एक अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्ट से पता चला कि भारत में गरीबी का प्रतिशत कितनी तेजी से कम हो रहा है। क्या आपको लगता है कि रोजगार के बिना यह संभव है?

स्वराज्यः लेकिन आपके विरोधी डेटा पर संदेह करते हैं …

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः रोजगार सृजन के विषय पर राजनीतिक बहस में निरंतरता की कमी है। हमारे पास रोजगार पर राज्य सरकारों द्वारा प्राप्त डेटा मौजूद है। उदाहरण के लिए, पिछली कर्नाटक सरकार ने 53 लाख नौकरियों का सृजन करने का दावा किया था। पश्चिम बंगाल सरकार ने कहा कि था इसने पिछले कार्यकाल में 68 लाख नौकरियां सृजित की थीं। अब, अगर राज्य अच्छी संख्या में रोजगार पैदा कर रहे हैं तो क्या यह संभव है कि देश नौकरियां सृजित नहीं कर रहा है? क्या यह संभव है कि राज्य नौकरियां सृजित कर रहे हैं मगर केंद्र बेरोजगारी पैदा कर रहा है?

2022 तक किसानों की दोगुनी आय के लिए चार-स्तरीय योजना

 स्वराज्यः आइए किसानों के बारे में बात करें, जहां बहुत गुस्सा है … हर सरकार नियमित रूप से दावा करती है कि वह किसानों के लिए प्रतिबद्ध है। आप ऐसा क्या कर रहे हैं हो जो पिछली सरकार से अलग है?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः हमारे किसान भाइयों को समृद्ध और कृषि को लाभप्रद बनाने के लिए 2022 तक किसानों की आमदनी को दोगुना करने का हमारा एक निर्दिष्ट उद्देश्य है।

अपने किसान भाइयों को समृद्ध बनाने के लिए, हमें आय के स्रोतों को बढ़ाने और उनके सामने आने वाले जोखिमों को कम करने की आवश्यकता है।

किसानों की आमदनी को दोगुना करने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए हम चार-स्तरीय योजना का पालन कर रहे हैं: निवेश लागत को कम करना, उत्पादन के लिए उचित मूल्य का आश्वासन, कटाई एवं कटाई के बाद के नुकसान को कम करना और आय अर्जन के लिए और अधिक मार्ग पैदा करना। अगर आप हमारी नीतियों पर करीब से ध्यान दें, तो इनका (नीतियों का) हर उद्देश्य है किसानों की सहायता करना – बीज से बाजार तक।

पिछली सरकार ने कृषि को 1.21 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए थे, जबकि हमने पांच साल की अवधि में 2.12 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए हैं। लेकिन उनके विपरीत, हमारी पहल फाइलों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि धरातल पर भी उतरी है।

स्वराज्यः क्या आप उदाहरण दे सकते हैं…..?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः यदि आप जानना चाहते हैं कि मोदी सरकार के शासन में क्या बदलाव हुआ तो बस आप उन वर्षों के दौरान किसानों के हालातों को याद करें। वे अवैज्ञानिक खेती करने के लिए मजबूर थे, उन्हें यूरिया प्राप्त करने के लिए अक्सर लाठियों का शिकार होना पड़ता था, उनके पास उचित फसल बीमा कवर नहीं था और न ही उन्हें उनकी उपज का उचित मूल्य मिलता था।

कृषि को वैज्ञानिक रूप देने के लिए, किसानों के पास अब मृदा स्वास्थ्य कार्ड हैं। यूरिया की कमी और तंगी अब एक बीती बात हो गई है और नीम-लेपित यूरिया से उत्पादकता में सुधार हो रहा है। अब किसान के पास प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के रूप में एक समग्र फसल बीमा कवर है।

स्वराज्य: न्यूनतम समर्थन मूल्यों के बारे में क्या कहना चाहेंगे?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः किसानों को न केवल उनकी लागत का 1.5 गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) मिलेगा, बल्कि ई-एनएएम (इलेक्ट्रॉनिक राष्ट्रीय कृषि बाजार जो कि किसानों को मूल्य, उत्पादन और बाजार की जानकारी प्रदान करता है) की मदद से वह उचित कीमत भी पा सकते हैं।

मैं कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ाने के लिए निजी क्षेत्र से आग्रह करना चाहूँगा। भारत में, निजी क्षेत्र का निवेश कृषि में कुल निवेश का केवल 1.75 प्रतिशत है। प्रौद्योगिकी से लेकर खाद्य संसाधन तक और आधुनिक मशीनरी से अनुसंधान तक, निजी क्षेत्र के लिए यहाँ बहुत बड़ा अवसर है। यदि निजी क्षेत्र की बाजार सशक्तता और सर्वोत्तम वैश्विक व्यवसाय नीति हमारे किसानों की कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प के साथ मिल जाए, तो यह किसानों और निजी क्षेत्र दोनों के लिए फायदे का सौदा है।

निजीकरण के मुद्दे पर मुखरता

स्वराज्य: आपने हाल ही में अपने मुद्दों पर चर्चा के लिए इंडिया इंक (सरकारी और कॉर्पोरेट) के नेताओं से मुलाकात की। आपने उन्हें क्या बताया और उन्होंने आपको क्या बताया? क्या उन्हें वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी), ऋणशोधन अक्षमता प्रक्रिया आदि से शिकायतें थीं? 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः उद्योगपतियों के साथ हुई बैठक व्यापक थी। भारत सरकार ने एक लोकार्पण किया है। भारतीय अर्थव्यवस्था और आगे क्या करना चाहिए से संबंधित पहलुओं पर हमने एक स्पष्ट चर्चा की थी। चर्चाओं से अनेक रचनात्मक सुझाव उभरे हैं।

जिन मुद्दों पर हमने चर्चा की, वे इस बात पर केंद्रित थे कि कॉर्पोरेट सेक्टर भारत के विकास में किस तरह अधिक योगदान दे सकता है। उदाहरण के लिए कृषि क्षेत्र ही ले लीजिए। मैं इस साक्षात्कार के दौरान एक अन्य प्रश्न के जवाब में कह चुका हूँ कि भारतीय कृषि क्षेत्र में कॉर्पोरेट भागीदारी कम है। मुझे लगता है कि यह एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ बहुत कुछ बदलना चाहिए।

हमने रक्षा क्षेत्र में भारतीय उपक्रमों की और अधिक भागीदारी के बारे में चर्चा की। भारत सरकार ने इस क्षेत्र में इतने सारे सुधार किए हैं, जिसमें अधिक एफडीआई, कम बाधाएं आदि शामिल हैं, इसलिए कॉर्पोरेट दुनिया को अब इस अवसर पर आगे बढ़ना चाहिए और निवेश करना चाहिए। आजादी के इतने सालों बाद रक्षा व्यवसाय में भारत की क्षमताओं में वृद्धि क्यों नहीं हो सकती?

व्यापारी प्रमुखों ने कहा कि हम जो (दिवालियापन अदालतों के माध्यम से जीएसटी और बैंक ऋण प्रस्ताव जैसे सुधार) कर रहे हैं वह व्यापार में खराब तत्वों को हटा रहा है और यह व्यवसाय के लिए अच्छी बात है।

स्वराज्य: क्या आपको नहीं लगता कि आप दो क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन कर सकते थे: भारत के बैंकों का स्थिरीकरण। 2017-18 में उनके पुनर्पूंजीकरण की बजाय, 2014 में आपने ऐसा क्यों नहीं किया? और दूसरी तरफ आधा अधूरा निजीकरण है। हाल ही में एयर इंडिया निजीकरण की विफलता इसका एक तर्क है….

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः आपकी बात गलत है।

हमने 2014 में बैंकों की समस्या की पहचान की थी। पुणे में बैंककर्मियों की मीटिंग का आयोजन किया गया था जिसमें शीर्ष अधिकारियों ने भाग लिया। मैंने उन्हें व्‍यावसायिकता के साथ कार्य करने को कहा और क्षेत्र के बारे में स्पष्ट करने के लिए कहा। मैंने उन्हें आश्वासन दिया कि दिल्ली से आने वाली फोन काल्स जो उनके काम को प्रभावित करती थी, वह फोन कॉल्स अब उन्हें परेशान नहीं करेंगी क्योंकि यह हमारी सरकार के काम करने का तरीका नहीं है। यह वही है जो मामलों की वास्तविक स्थिति को स्पष्ट करने में सक्षम था।

इससे पहले, अगर किसी को 500 करोड़ रुपये का भुगतान किया जाता था और जब ऋण चुकाने का समय आता था, तो दिल्ली से एक फोन कॉल सुनिश्चित करता था कि 500 करोड़ रुपये का एक अन्य ऋण दिया जाए ताकि पिछले ऋण का भुगतान किया जा सके। यह चक्र चलता रहा। हमने इसे रोक दिया। यही कारण है कि पुराने ऋण को एनपीए (गैर निष्पादित संपत्ति) के रूप में दिखाया जाना पड़ता है।

अब (ऋणशोधन अक्षमता और दिवालियापन संहिता के साथ), कई व्यवसायियों को बैंक की देय राशि का भुगतान करने में विफल होने पर अपनी कंपनियों को खोना पड़ा है।

बैंक विलय के बारे में पहले केवल बात की जा रही थी, लेकिन यह लागू नहीं हुआ था। लेकिन हम आगे बढ़ गए हैं। क्या आपने पाँच बैंकों का विलय नहीं देखा ?

स्वराज्य: आप निजीकरण पर उदाहरण के लिए एयर इंडिया के हालिया (असफल) निजीकरण के मामले पर, बहुत उत्सुक नहीं लगते हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः मैं आपको अपने तथ्यों की जांच करने का अनुरोध करता हूँ। हमारी सरकार ने महत्वपूर्ण विनिवेश किया है। आप इस पर अधिक शोध कर सकते हैं और अंत में आप भी इसी निर्णय पर आएंगे।

एयर इंडिया के लिए, सरकार ने जो किया है वह अत्यंत निष्कपटता से किया है। आपको एक बिक्री प्रस्ताव और नीति निर्णय के जवाब की कमी के बीच भेद जानना होगा। कैबिनेट स्तर पर, हमने न केवल एयर इंडिया बल्कि कई अन्य (हानि पहुँचाने वाली) सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों की बिक्री को मंजूरी दे दी है। यह स्वयं में कई तरीकों से ऐतिहासिक है: उनका अभी तक नहीं बिकना समय और प्रक्रिया का परिणाम है। हम ऐसी बिक्री नहीं करना चाहते जहाँ हम पर इल्जाम लगाए जाएं कि जब एक चीज एक्स (X) राशि में बिक रही है तो हमने कम में क्यों बेचा। लेकिन सामरिक बिक्री के लिए नीतिगत निर्णय पहले से ही लिया जा चुका है।

मोदी साक्षात्कारप्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन’ का संस्करण

स्वराज्य: 2014 से पहले, आपने न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन की बात की थी? क्या आप इस लक्ष्य की ओर बढ़ने के तरीके पर विस्तार से बता सकते हैं? इस वाक्यांश से आपका क्या मतलब था?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः मैंने हमेशा विश्वास किया है, और कई अवसरों पर यह कहा है कि सरकारों पर कम निर्भरता आगे बढ़ने का तरीका है।

एक सरकार को उत्पादकता बढ़ाने की तथा कार्यविधि को सुधारने की आवश्यकता है। इसे एक सहायक की भूमिका निभानी है, न कि अवरोधक की।

हमने पिछले चार वर्षों में इस सिद्धांत पर कार्य करके इसकी व्याख्या की है। प्रौद्योगिकी इस उद्देश्य को प्राप्त करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन’ का अंतिम उद्देश्य लोगों के जीवन में अक्सर सरकार द्वारा बनाई जा सकने वाली बाधाओं को दूर करना और लोगों को अपनी पूरी क्षमता प्राप्त करने के लिए परेशानी मुक्त करना है।

स्वराज्यः क्या आप हमें उदाहरण दे सकते हैं?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः उदाहरण के लिए, आप दस्तावेज प्रतियों को जमा करने के लिए स्वयं सत्यापन करने की व्यवस्था पर विचार करिए। पहले, लोगों को दस्तावेज प्रमाणित कराने के लिए नोटरी या राजपत्रित अधिकारियों की तलाश करनी पड़ती थी। इसके लिए अक्सर, उन्हें 50 या 100 रुपये का भुगतान भी करना पड़ता था, जो अब समाप्त हो गया है। अब, हमने यह दिखाया है कि सरकार अपने लोगों पर भरोसा करती है, हमने सरकार की इस भूमिका को कम कर दिया है और इससे करोड़ों लोगों को राहत मिली है।

जबकि कई सरकारें नए कानून बनाने पर गर्वांवित होती हैं, पर मुझे पुराने कानूनों को खत्म करने पर गर्व है। एक हजार से अधिक पुराने कानूनों को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया है।

हमने सरकार में वर्ग 3 और वर्ग 4 नौकरियों के लिए साक्षात्कार भी बंद करा दिए हैं। सरकार की एक और भूमिका को कम कर दिया है, इससे भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार कम हुआ है और ईमानदार उम्मीदवारों को बढ़ावा मिला है।

हमने विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड (एफआईपीबी) को समाप्त कर दिया है और अधिकांश एफडीआई अनुमोदन स्वचालित क्रम से होते हैं।

स्वराज्य: व्यवसाय करने में आसानी के बारे में अपका क्या विचार है?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः व्यवसाय करने में आसानी के लिए, विभिन्न श्रम कानूनों के तहत बनाए गए पहले अनिवार्य 56 रजिस्टरों को अब पाँच सामान्य रजिस्टरों द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया है और 36 फॉर्मों को घटाकर अब 12 कर दिया गया है। सभी मौजूदा श्रम कानूनों को चार श्रमिक नियमावली में सरलीकृत, तर्कसंगत और समेकित किया जा रहा है।

एक कंपनी को निगमित करने की प्रक्रिया को आसान बना दिया गया है और अब 24 घंटों में इसे पूरा करना संभव है।

नगर निगम के अधिकारियों से बिल्डिंग अनुमोदन प्रक्रिया कम कर दी गई है – दिल्ली में 24 से आठ और मुंबई में 37 से आठ हो गई है। निर्माण के सभी चरणों में आवेदन और अनुमोदन की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन कर दी गई है और कोई व्यक्तिगत मुलाकात या संपर्क की आवश्यकता नहीं है। हलफनामे की आवश्यकता को समाप्त करके ई-उपक्रम द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया है। इसे सभी स्थानीय नगरीय निकायों तक विस्तारित किया जा रहा है।

हमने पर्यावरणीय अनुमति के लिए ऑनलाइन आवेदन एवं अनुमोदन की प्रणाली शुरू की है जो कि पहले अटकी रहती थी।

सूचना प्रौद्योगिकी की मदद से इंस्पेक्टर राज को खत्म करने के लिए जीएसटी की रूप रेखा तैयार की गई है। रिटर्न से रिफंड तक, सबकुछ ऑनलाइन होता है।

श्रम सुविधा पोर्टल पर, एक ही स्थान पर कई श्रम अनुपालन किए जा सकते हैं। श्रम निरीक्षकों को कंपनियों पर छापा मारने से भी वंचित कर दिया गया है, इसके बजाय वे अब कम्प्यूटरीकृत सिस्टम द्वारा निर्देशित होते हैं जो उन्हें उद्देश्य मानदंडों के आधार पर निरीक्षण पर भेजता है।

अधिकांश सरकारी योजनाओं में, हमने डीबीटी (प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण) या नकद हस्तांतरण के माध्यम से फंड हस्तांतरण करके सरकार की एक परत को समाप्त कर दिया है।

मैं इस तरह की योजनाओं को और अधिक विस्तारित कर सकता हूं, लेकिन शायद आपको लिखने की जगह की कमीं पड़ सकती है तो, चलिए अगले प्रश्न की तरफ बढ़ते हैं।

क्या हम दूध और मर्सिडीज एक ही दर पर प्राप्त कर सकते हैं?

स्वराज्यः एक साल पहले आपने जीएसटी को गुड एंड सिंपल टैक्स कहते हुए लॉन्च किया था। हमें विश्वास है कि जरूर ही यह एक गुड टैक्स है लेकिन क्या यह वास्तव में सिंपल है? आपके आलोचकों का कहना है कि टैक्स में आदर्श रूप से केवल एक ही दर होनी चाहिए, जिसमें कुछ ही वस्तुएं ऊपरी और निचले मेरिट स्लैब में होनी चाहिए।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः केवल एक स्लैब रखना बहुत ही आसान होता लेकिन इसका मतलब हमारे पास शून्य प्रतिशत कर दरों पर खाद्य पदार्थ नहीं हो सकते थे। क्या दूध और मर्सिडीज एक ही दर पर हो सकते हैं? इसलिए कांग्रेस के जो दोस्त कहते हैं कि वह सिर्फ एक जीएसटी रेट रखते, तो वे प्रभावी तरीके से कह रहे हैं कि वे खाद्य पदार्थों और वस्तुओं पर 18 प्रतिशत कर लगाएंगे जो वर्तमान में शून्य या 5 प्रतिशत है।

स्वराज्यः आपके अनुसार, अभी तक क्या लाभ हुआ है?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः मुझे कुछ आँकड़ों से शुरू करने दीजिए। स्वतंत्रता प्राप्ति से अब तक पंजीकृत उद्यमों की संख्या 66 लाख थी। जीएसटी के लागू होने के केवल एक साल बाद पंजीकृत नए उद्यमों की संख्या 48 लाख है। लगभग 350 करोड़ चालान संसाधित हुए और 11 करोड़ रिटर्न दाखिल किए गए। अगर जीएसटी वास्तव में बहुत जटिल था तो क्या हम ऐसे आँकड़ों को देखते?

देश भर में चेक-पोस्टों को समाप्त कर दिया गया है और राज्य की सीमाओं पर अब कोई भी लाइन नहीं लगती है। न केवल ट्रक चालक अपना मूल्यवान समय बचा रहे हैं बल्कि रसद क्षेत्र को भी बढ़ावा मिला है और इस तरह से हमारे देश की उत्पादकता में बढ़ोतरी हो रही है अगर जीएसटी जटिल था तो क्या यह सब होता?

स्वराज्यः हम अभी भी व्यापारियों और अर्थशास्त्रियों से इतनी आलोचना क्यों सुनते हैं?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः जीएसटी एक बहुत बड़ा बदलाव था, जिसमें दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से पुनः व्यवस्थित करने की आवश्यकता थी। इस सुधार में 17 कर और 23 उपकर एक एकल कर में शामिल हो गए। आखिरकार जब इसको पेश किया गया था तो इसको सरल बनाने और प्रणाली की संवेदनशीलता को सुनिश्चित करने का हमारा प्रयास था। सुधार के दौरान अक्सर परेशानी होती है, लेकिन ऐसे मुद्दों की न केवल पहचान की गई बल्कि वास्तविक समय में इन पर संज्ञान भी लिया गया था।

स्वराज्यः जीएसटी के एक साल बाद भी काफी चीजें होना बाकी है… 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः जीएसटी एक क्रमिक विकास वाली प्रणाली है और हम राज्य सरकारों, जनता तथा मीडिया आदि से प्राप्त प्रतिक्रियाओं के आधार पर इसकी देखरेख करते हैं। जनता तथा व्यापारियों आदि से प्राप्त बहुत सी प्रतिक्रियाओं को शामिल किया जा चुका है।

जीएसटी ने भारतीय सहकारी संघवाद को अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन में देखा है। हमने राज्यों को समेकित किया है और सक्रिय रूप से एक सर्वसम्मति विकसित की जिसमें पिछली सरकारें विफल रहीं।

स्वराज्यः क्या हम आगे दरों में और कमी को देखेंगे?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः दरों के बारे में बात करें तो पहले कई कर छिपे हुए थे। अब जो आप देख रहे हैं वह वही है जिसका आप भुगतान करते हैं। सरकार ने वस्तुओं के लगभग 400 समूहों पर करों को कम कर दिया है। वस्तुओं के लगभग 150 समूहों को शून्य प्रतिशत दर में रखा गया है। अगर आप दरों को देखते हैं तो दिन-प्रतिदिन की अधिकांश वस्तुओं की दरों में वास्तव में कमी आई है। चावल, गेहूं, चीनी, मसालों आदि में कुल कर में कमी कर दी गई है। दैनिक उपयोग की अधिकांश वस्तुओं में या तो छूट दे दी गई है या उनको 5 प्रतिशत के स्लैब में रखा गया है। लगभग 95 प्रतिशत वस्तुएं 18 प्रतिशत से कम के स्लैब में हैं।

 

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