अर्थव्यवस्था
कपास की कीमतों में वृद्धि: मोदी सरकार इस साल ले सकती है चैन की साँस

प्रसंग
  • इस बार, किसानों की फसल में पैदावार कम हो सकती है लेकिन उच्च कीमतों से उनके नुकसान की क्षतिपूर्ति हो जानी चाहिए।
  • इससे मोदी सरकार की समस्या सुलझती है

कपास की मौजूदा कीमतें एक साल पहले इसी अवधि की तुलना में सबसे ज्यादा हैं। कृषि मंत्रालय से उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक मानक किस्म वाली शंकर-6 कपास 5,500 रुपये प्रति मन (20 किलोग्राम) से ऊपर बिक रही है। प्रेस्ड जिन में परिवर्तित कच्ची कपास 46,500 रुपये प्रति कैंडी (356 किलोग्राम) से ऊपर बिक रही है।

कपास की कीमतें बढ़ने की दो वजहें हैं। पहली, पिछले साल के मुकाबले इस साल कपास का उत्पादन कम होने का अनुमान है। भारतीय कपास संघ, व्यापारियों का एक समूह, का कहना है कि इस सीजन (अक्टूबर 2018 – सितंबर 2019) में कपास का उत्पादन 343.25 लाख बेलें (प्रत्येक 170 किलो की) रहेगा जबकि पिछले सीजन में 365 लाख बेलों का उत्पादन हुआ था।

महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में सूखा पड़ने से इस सीजन में कपास का उत्पादन प्रभावित हुआ है। पिछले साल के मुकाबले इस साल कपास उत्पादन में अकेले गुजरात में 18 लाख, महाराष्ट्र में 3 लाख तथा कर्नाटक में 1.5 लाख बेलों की गिरावट देखी जा रही है। सबसे ज्यादा उत्पादन वाले राज्यों – पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान में उच्च उत्पादन से कुछ हद तक गिरावट की भरपाई हुई है।

दूसरी वजह यह है कि कपास किसान इसकी कीमतों में और बढ़ोतरी की उम्मीद लगाए बैठे हैं, इसीलिए वे अपनी कपास को मंडियों में लाने में सावधान हैं। 1 अक्टूबर से 15 नवंबर तक देश भर की विभिन्न मंडियों में कपास की तकरीबन 43 लाख बेलें आई हैं। इससे तुलना की जाए, तो देश भर में 45 दिनों में करीब 45 लाख बेलों की खपत है। इसके अलावा, कम से कम 8 लाख बेलों का निर्यात किया जा चुका है। इस तरह से, 53 लाख बेलों की खपत होती है और केवल 45 लाख बेलों की ही आमद हुई, तो साफ है कि 10 लाख बेलों की आमद कम हुई है।

अब यह उम्मीद है कि हो सकता है पिछले सीजन की 23 लाख बेलों के पिछले स्टॉक (कैरीओवर स्टॉक) से इस कमी की भरपाई हो जाए। पिछले सीजन का कैरीओवर स्टॉक (इस साल का ओपनिंग स्टॉक) 36 लाख बेलों के मुकाबले कम है। इस सीजन के अंत तक, कैरीओवर स्टॉक 15.25 लाख बेलों तक गिर जाएगा।

इस अनुमान के नतीजतन, नए सीजन की शुरूआत में कपास की कीमतें तेजी से बढ़ीं। हालाँकि, देश में कपास के उत्पादन का करीब 80 फीसदी उपभोग करने वाले कताई कारखाने इसकी खरीद को लेकर होशियार रहे। कारखाने कपास की खरीद करके इसका तुरंत उपयोग कर रहे हैं, वे इसका भंडारण नहीं कर रहे हैं क्योंकि इससे उनका मुनाफा और नकदी प्रभावित हो सकती है। वे अगली खरीद करने से पहले भी कीमतों के स्थिर रहने का इंतजार कर रहे हैं।

इस संदर्भ में कपास की कीमतों में मामूली सी कमी आई है। शुरुआत में इसकी कीमत 47,500 रूपए प्रति कैंडी थी लेकिन वर्तमान में 46,500 रूपए प्रति कैंडी होने से पहले बीच में 46,000 रूपए प्रति कैंडी हो गई थी। इसके व्यापारियों का कहना है कि कीमतों में तेजी से वृद्धि की संभावना बहुत कम है।

राजकोट के एक रुई ओटने वाले कहते हैं. “कपास उगाने वाले किसान 7,500 रुपये प्रति कैंडी तक कीमतें बढ़ने की उम्मीद कर रहे हैं। ऐसा होने की संभावना नहीं है क्योंकि मिलें उनकी खरीद में सतर्क हैं और निर्यात धीमा हो गया है।” इसका अर्थ है कि कीमतों में उछाल सीमित होगा।

मूल्य में किसी भी वृद्धि के सीमित होने के कई कारण हैं। पहला, निर्यात के लिए कीमतों में प्रतिस्पर्धा नहीं है। जहाँ घरेलू कीमतों में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है, वहीं डॉलर के मुकाबले मजबूत होते रुपए से मदद नहीं मिली है। वर्तमान में डॉलर के मुकाबले रूपया 72 के स्तर पर है जो महीने की शुरुआत में 74 के स्तर पर था।

रूपए की मजबूती निर्यात को अप्रतिस्पर्धी बनाती है। कोटलुक ए इंडेक्स – कपास की कीमतों के लिए वैश्विक बेंचमार्क – के साथ 86.30 पर, रुपये में बढ़ोत्तरी ने अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के लिए भारत से कपास की खरीद महंगी कर दी है। तीसरा कारण यह है कि भारत में कपास का आयात 24 लाख बेल अनुमानित किया गया है जो पिछले साल 15 लाख बेल था।

लेकिन ये कारण ऐसे नहीं हैं जो किसी को भी, विशेष रूप से केंद्र में नरेंद्र मोदी को परेशानी में डाल सकें। इस साल केंद्र द्वारा निर्धारित, कपास की वर्तमान कीमत न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी), जो 5,150 रुपये प्रति क्विंटल है, से अधिक है जो पिछले साल मध्यम रेशे की कपास की 4,320 रूपए प्रति क्विंटल थी। उत्पादित कपास में से अधिकांश इसी किस्म की है। लंबे रेशे की कपास का न्यूनतम समर्थन मूल्य 5,450 रूपए प्रति क्विंटल है।

पिछले वर्ष कपास की कीमतें इस समय के न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम थीं। गुजरात में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी, जो चुनाव में शीर्ष पर रही है, कीमतों को कम नहीं होने दे सकती। भारतीय कपास निगम (सीसीआई) के माध्यम से केंद्र ने बाजार हस्तक्षेप के साथ कदम बढ़ाया और कीमतें बढ़ने से पहले 2 लाख बेलें खरीद लीं। सीसीआई अपने व्यापारिक संचालन के लिए स्वयं कपास खरीदता है और इस वर्ष संगठन का कहना है कि इस बार 100 लाख बेल खरीदने का लक्ष्य है।

अमेरिकी कृषि विभाग (यूएसडीए) की नवीनतम रिपोर्ट के मुताबिक, बाजार समर्थन के साथ फर्म कपास की कीमतों में वृद्धि संभव है। यूएसडीए के अनुसार, इस बार वैश्विक कपास उत्पादन 3.5 प्रतिशत कम होगा। खपत पिछले साल की तुलना में 2.9 प्रतिशत अधिक रहेगी, जबकि कैरीओवर स्टॉक 12 फीसदी कम होगा। अंतर्राष्ट्रीय कपास सलाहकार समिति का पूर्वानुमान है कि इस वर्ष रेशे की कीमतें पांच साल के उच्च स्तर तक बढ़ सकती हैं।

प्रत्येक सरकार के लिए कपास हमेशा एक पेचीदा फसल रही है। फसल विफलता या कम कीमत या कीट हमला इस पर हावी होते रहे हैं। इस बार शायद किसानों की फसल में पैदावार कम है लेकिन अच्छी कीमतों से नुकसान की भरपाई में मदद मिलनी चाहिए। इससे मोदी सरकार की समस्या सुलझती है जैसा कि इस साल केंद्र सरकार ने एमएसपी को 23 फीसदी बढ़ा दिया है।