अर्थव्यवस्था
सोयाबीन किसान प्रसंस्करकों को सीधे उत्पाद बेचने की तैयारी में, मध्य प्रदेश से रिपोर्ट

नरेंद्र मोदी सरकार ने “एक देश, एक बाज़ार” के नारे के साथ कृषि सुधारों की शुरुआत की है जिसका लाभ उठाने के लिए मध्य प्रदेश के सोयाबीन किसान तैयार हैं। अब वे कृषि उत्पादन बाज़ार समिति (एपीएमसी) की मंडियों की बजाय सीधे प्रसंस्करक को अपना उत्पाद बेच सकते हैं।

इसका अर्थ हुआ कि किसान सीधे मिलों के द्वार तक जा सकते हैं या सोयाबीन प्रसंस्करक किसान के खेत की मेड़ तक आ सकते हैं क्योंकि राज्य सरकार ने भी सितंबर-अक्टूबर में कटाई होने वाले तेलबीजों की सीधी बिक्री की अनुमति दे दी है।

सोयाबीन एक खरीफ फसल है जिसे किसान जून-जुलाई में बोते हैं और मध्य सितंबर से अक्टूबर के अंत तक काटते हैं। सोयाबीन किसानों के अनुसार इस वर्ष उन्होंने फसल जल्दी बो दी थी इसलिए अगले 60-70 दिनों में फसल तैयार हो जाएगी।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में मध्य प्रदेश सरकार पहली राज्य सरकार थी जिसने राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के दौरान किसानों को अपना उत्पाद सीधे बेचने की अनुमति दी थी।

इसके चलते पंजाब को पीछे छोड़ते हुए मध्य प्रदेश भारतीय खाद्य निगम के भंडार में सर्वाधिक योगदान करने वाला राज्य बन गया। भंडार के लिए किसानों से खरीदे 3.88 करोड़ टन गेहूँ में मध्य प्रदेश का योगदान 1.29 करोड़ टन का था, वहीं पंजाब का 1.27 करोड़ टन।

केंद्र ने राज्यों को भी निर्देश दिया था कि वे कृषि उत्पाद की सीधी बिक्री की अनुमति दें ताकि रबी फसलें लॉकडाउन के दौरान सड़कर बर्बाद न हों। 25 मार्च को लॉकडाउन लागू होने के 10 दिनों बाद ही सरकार ने सीधी बिक्री की अनुमति दे दी थी।

केंद्र ने आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत लाए जाने वाले कृषि सुधारों के माध्यम से किसानों को कृषि उत्पाद देश में कहीं भी बेचने और ठेका आधारित खेती की अनुमति दी, साथ ही कई उत्पादों के लिए भंडारण सीमा को हटा दिया।

“प्रसंस्करक हमसे सीधे खरीदने के लिए तैयार हो गए हैं। वे हमारे खेतों से ही उत्पादन ले जाएँगे।”, भोपाल जिले में रहने वाले एक किसान राजु बनशंकर ने बताया। मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र के एक किसान ने बताया कि प्रसंस्करक उसके जैसे किसानों से इस बार सीधे सोयाबीन खरीदेंगे।

“सीधी बिक्री से हमें काफी लाभ होगा।”, किसान अखिलेश सिंह अंजना ने कहा। “मंडी जाने में परिवहन में भी हमारा खर्चा होता है, समय व्यर्थ होता है वह अलग, साथ ही कई बार व्यापारी सोयाबीन तौलने में दोखाधड़ी भी करते हैं।”, उन्होंने बताया।

अब मंडी नहीं जाना पड़ेगा इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए अंजना ने कहा कि देश में कहीं भी उत्पाद बेचने की केंद्र की अनुमति एक वरदान बनकर आई है। केंद्र द्वारा किसान उत्पादन व्यापार और वाणिज्य अध्यादेश 2020 लाए जाने से पहले किसान पंजीकृत एपीएमसी में उत्पाद बेचने को बाध्य थे।

“कुछ किसान हैं जिनके पास अभी तक पिछले वर्ष के अक्टूबर में काटा हुआ सोयाबीन है। वे प्रसंस्करकों के पास जाकर लाभ कमा रहे हैं, हालाँकि अभी भी कुछ किसान मंडियों का ही रुख कर रहे हैं।”, भारतीय किसान संघ की इंदौर इकाई के प्रमुख विजेंद्र सिंह ने बताया।

“मंडियाँ अस्तित्व में रहेंगी और वे आवश्यक भी हैं। वे किसानों को स्वतंत्रता देती हैं। हमें एक बात याद रखनी है कि हर किसान नहीं जानता कि कहाँ जाकर फसल बेचनी है। इसलिए मंडी सर्वश्रेष्ठ विकल्प है।”, उन्होंने आगे कहा।

सॉल्वेन्ट एक्सट्रैक्टर्स संघ के कार्यकारी निदेशक बीवी मेहता ने स्वराज्य को बताया कि ऐसे निर्णय स्वागत योग्य हैं क्योंकि किसान से लेकर अंतिम उपभोक्ता तक सभी हितधारकों को इससे लाभ होगा। भारतीय सोयाबीन प्रसंस्करक संघ के कार्यकारी निदेशक डीएन पाठक ने बताया कि मई से ही कई किसान अपना उत्पाद सीधे बेच रहे हैं।

कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के अनुसार 81.8 लाख हेक्टेयर के क्षेत्रफल में सोयाबीन बोया गया है, 2 जुलाई तक के उपलब्ध डाटा के अनुसार जो कि पिछले वर्ष से 16.4 लाख हेक्टेयर अधिक है।

इस वर्ष तेलबीजों की बुआई में हुई 75.5 लाख हेक्टेयर वृद्धि में सर्वाधिक वृद्धि सोयाबीन खेती में ही हुई है। भारत के सोयाबीन उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र है मध्य प्रदेश जहाँ 34.8 लाख हेक्टेयर के क्षेत्रफल में सोयाबीन बोई गई है।