अर्थव्यवस्था
सेबी का नवीनतम निर्णय फंड प्रबंधकों को इकाईधारकों के प्रति अधिक उत्तरदायी बनाएगा

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने अनिवार्य कर दिया है कि परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनियाँ (एएमसी) किसी योजना का प्रबंधन करने वाले फंड प्रबंधक समेत अपने कर्मचारियों को कम से कम 20 प्रतिशत वेतन उन योजनाओं के रूप में दें जिनका प्रबंधन वे कर रहे हैं। यह निर्णय थोड़ा भी जल्दी नहीं आया है।

साथ ही सुझाव दिया गया है कि यदि कोई व्यक्ति सिर्फ एक योजना का प्रबंधन कर रहा है, तो उसके वेतन का 10 प्रतिशत उसी योजना की इकाइयों के रूप में दिया जाए और शेष 10 प्रतिशत उसी फंड हाऊस की इकाइयाँ हों जिनमें जोखिम भी सही और वाजिब हो।

यूएस में कर्मचारियों, विशेषकर प्रबंधन के उच्चतर स्तर पर कार्यरत कर्मियों के लिए वेतन में स्टॉक विकल्प सामान्य बात है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कंपनी में उनका निहित स्वार्थ बढ़े, साथ ही जिन शेयरधारकों के फंड का प्रबंधन वे कर रहे हैं, उनके भी वित्तीय हितों का ध्यान वे रखें।

भारत में फ्रैंकलिन टेंपलटन के इकाईधारक अभी तक अपने घावों पर लेप लगा रहे हैं। इस फंड के प्रबंधक दोषी हैं गलत धारणा देने के लिए, उन्होंने बैंक के टियर 1 बॉन्ड को सुरक्षित फिक्स्ड डिपॉज़िट के समतुल्य बताया।

साथ ही, फ्रैंकलिन टेंपलटन के कुछ वर्षो पूर्व, इंफ्रास्ट्रक्चर लीज़िंग एवं वित्तीय सेवाओं (आईएलएफएस) तथा इसके असंख्य उपक्रमों एवं 397 के आसपास विशेष प्रयोजन वाहन (एसपीवी) के सहर्ष बॉन्ड में निवेश करने वाले भारत के लगभग सभी म्युचुअल फंड दोषी रहे हैं।

निर्माणाधीन बेंगलुरु मेट्रो में आईएलएफएस

इन परियोजनाओं की लागत जान-बूझकर बढ़ा-चढ़ाकर दिखाई जाती थी ताकि प्रोत्साहकों से फंड आकर्षित किए जा सकें। म्युचुअल फंडों के पास शोध शक्तियाँ होती हैं जिनका उपयोग उन्हें करना चाहिए था और पता लगाना चाहिए था कि आईएलएफएस के प्रोत्साहक कैसे निवेश आकर्षित कर रहे हैं।

बाज़ार विनियामक सेबी की सराहना होनी चाहिए क्योंकि उसने वह कर दिखाया है जो किसी दूसरे देश ने नहीं किया है। दूसरे देशों में एएमसी के कर्मचारी स्वेच्छा से अपने फंड में निवेश करते हैं ताकि इकाईधारकों का विश्वास बढ़ाया जा सके लेकिन भारत में स्वेच्छा से चलने वाले प्रयास कभी ही काम कर पाते हैं।

बस मुकेश अंबानी जैसे लोग अपवाद हैं जो निरंतर रिलायंस उद्योग के शेयर बाज़ार से खरीदते रहते हैं। ऐसा करके वे अपने शेयरधारकों को एक विश्वास बढ़ाने वाला संदेश देते हैं, जबकि दूसरे प्रोत्साहक प्राथमिकता आधारिक मार्ग अपनाने में तत्परता दिखाते हैं जिसका रियायत पर दुष्प्रभाव पड़ता है। हालाँकि, यह ऐसे ही चलता है, इसपर बात नहीं करेंगे।

कुछ वर्ष पहले सेबी ने आईपीओ की रेटिंग को अनिवार्य करके सनसनी मचा दी जिसकी कल्पना भी नहीं की गई थी। उस समय तक भारत में सिर्फ ऋण उपकरण और योजनाओं को रेट किया जाता था लेकिन सेबी ने उस संरचना को तोड़ते हुए इक्विटी शेयर को सार्वजनिक जारी करने पर रेटिंग अनिवार्य कर दी।

ऐसा नहीं है कि रेटकर्ताओं ने बहुत अच्छा काम किया है, चाहे वह ऋण उपकरणों की रेटिंग हो या इक्विटी की। लेकिन कम से कम सेबी के प्रयासों से यह संभव हो पा रहा है कि आईपीओ के निवेशक को अपने ही रस का स्वाद चखना पड़ रहा है जहाँ क्रेता सावधान हो गए हैं।

फंड प्रबंधकों का गुट 20 प्रतिशत वेतन को गैर-नकद मुआवज़े के रूप में देने के सेबी के हाल के निर्णय के विरोध में व्यूहरचना कर रहा है क्योंकि यदि उन्हें 20 प्रतिशत किसी फंड विशेष की इकाई के रूप में मिलेंगे तो गृह ऋण की ईएमआई और घरेलू खर्चों के बाद, उनके पास कहीं और निवेश करने के पैसे नहीं बचेंगे।

विशेषकर तब जब इस फंड इकाई आवंटन के लिए तीन वर्षों की स्थाई अवधि तय की गई है जिसमें वेतन के रूप में मिलने वाली इकाइयों को वे तीन वर्षों के बाद ही बेच सकते हैं। वे कह रहे हैं कि इस नियम के कारण म्युचुअल फंड उद्योग से प्रतिभाएँ पलायन करने लगेंगी यदि सेबी इस निर्णय को वापस नहीं लेता है तो।

स्टॉक विकल्प कर्मचारियों को कंपनी से बांधे रखने के तरीके के रूप में उभरा था ताकि मुख्य प्रबंधन कर्मचारी ऐसे प्रयास करें जिसमें लघु अवधि में कंपनी को लाभ दिलाने की बजाय वे दीर्घ अवधि पर विचार करें। वे ऐसा इसलिए करेंगे क्योंकि वे चाहते हैं कि स्थाई अवधि की समाप्ति पर उन्हें आवंटित शेयर का मूल्य अच्छा रहे।

स्टॉक विकल्प से वे अपने निर्णयों के दीर्घकालिक प्रभावों के विषय में सोचेंगे और साथ ही उनके शेयर की स्थाई अवधि की समाप्ति तक वे उसी कंपनी के साथ रहना चाहेंगे। विडंबना है कि जब भारत में एएमसी कर्मचारियों के लिए 20 प्रतिशत वेतन अनिवार्यतः इकाइयों के रूप में देने का नियम आया तो इस तर्क के विपरीत दावे किए जा रहे हैं।

यह तर्क अपना ही खंडन कर देता है इसलिए सेबी को उसपर ध्यान नहीं देना चाहिए। सेबी यह अवश्य कर सकता है कि 20 प्रतिशत से घटाकर इकाई की भागीदारी 15 प्रतिशत कर दी जाए या स्थाई अवधि कम कर दी जाए। लेकिन जो निर्णय लिया है उसे जारी रखना चाहिए, वापस नहीं करना चाहिए।

मानव प्रवृत्ति है कि वह अपने पैसे के प्रति अधिक प्रतिबद्धता, झुकाव और सहानुभूति रखता है। जब फंड प्रबंधकों का लाभ इकाईधारकों के लाभ में ही निहित होगा तो वे फंड निवेश करने से पहले सावधानी बरतेंगे। आशा है कि इससे भारत में पुनः फ्रैंकलिन या आईएलएफएस जैसी घटना नहीं होगी।