अर्थव्यवस्था
राजनीतिक भूख के लिए अर्थव्यवस्था की बलि चढ़ा रहे राहुल गांधी

आशुचित्र- किसानों की कर्जमाफी की घोषणाओं से राहुल गाँधी अप्रत्यक्ष रूप से ऋण न चुकाने के लिए भड़का रहे हैं। यह अर्थव्यवस्था की तबाही नहीं है तो और क्या है?

कुछ राज्यों में किसानों के ऋण माफ़ कर देने से दो लाख करोड़ का अतरिक्त भार अर्थव्यवस्था पर पहले ही बढ़ा हुआ था, वहीं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मोदी सरकार को पूरे भारत के किसानों के कर्ज माफ़ करने की चेतावनी दे दी है।

राहुल ने कहा, “हमने 10 दिनों के भीतर कर्ज माफ़ करने का वादा किया था, और दो राज्यों में हमने यह छ: घंटों के भीतर कर दिखाया।” राजकोष के संदर्भ में लिए गए इस लापरवाही भरे निर्णय पर विचार करना आवश्यक है। करदाताओं का पैसा बहा देना एक लापरवाही के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। इससे भी बदतर उन्होंने कहा कि जब तक सारे कर्ज माफ़ नहीं कर देंगे तब तक वह मोदी की नींदें उड़ा कर रखेंगे। यदि मोदी ने यह नहीं किया तो सत्ता में आने के बाद राहुल कर्ज माफ़ करेंगे।

अपनी बात के समर्थन हेतु राहुल बड़े व्यवसायियों के कर्ज़ राइट ऑफ की बातें लेकर आ गए। बात दें कि राइट ऑफ वो रकम होती है जो बैंक वसूल नहीं पाते तथा सरकार की इजाज़त से उस खाते को निरस्त कर दिया जाता है। राहुल ने बड़े व्यवसाय तथा कृषि क्षेत्र में राइट ऑफ के दो प्रमुख अंतर नहीं बताए। पहला कि कॉर्पोरेट क्षेत्र के ऋण पूरे भारत में निरस्त नहीं किए जाते तथा जब व्यवसाय असफल होता है तो कुछ ही कर्जदारों के लिए राइट ऑफ का प्रावधान होता है। वहीं दूसरा यह कि दिवालियापन के कानून के अनुसार, कर्जदार अपनी पूरी व्यावसायिक संपत्ति खो देता है लेकिन कृषि संबंधित ऋण में राइट ऑफ के बाद कोई भी किसान अपनी संपत्ति नहीं खोता है।

स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है कि राहुल 2019 के चुनाव में मोदी के लिए कर्जदारों को हथियार बना रहे हैं। बहुत से राज्य पहले चरण की कर्ज़माफी कर चुके हैं तथा अब केंद्र से कर्ज़ माफ़ करने को कह रहे हैं। यह जबरदस्ती अर्थव्यवस्था की हालत खराब कर देना है।

पूर्व प्रमुख वित्तीय सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने पिछले वर्ष कहा था कि कर्ज़माफी की जो घोषणाएँ पहले हो गई हैं तथा आगे होने वाली हैं, वे सकल घरेलू उत्पाद की दर को 0.7 प्रतिशत गिरा देंगी तथा यह अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका होगा। हमारे सामने है कि कई राज्य इंफ्रास्ट्रक्चर हेतु निवेश करने में तथा विकास कर सकने में असमर्थ हैं। इन हालातों में जब देश की अर्थव्यवस्था “डबल बेलेंस शीट” की समस्या झेल रही है ऐसे में राहुल गांधी का अर्थव्यस्था को और अधिक मंदी की हालत पर ले जाने वाली बातें करना निश्चित ही उन्हें दोषी बनती हैं।

एक बात स्पष्ट रूप से जाननी होगी कि इससे फर्क नहीं पड़ता कि कर्ज़माफी के वादे सत्ता संभालने वाली पार्टी करे अथवा विपक्ष की पार्टी। प्रमुख बात है कि यह वादे एक राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी कर रही है जो आगे लोगों को ऋण न चुकाने के लिए प्रेरित करेगा तथा हालात और बदतर हो जाएँगे। राहुल गांधी किसानों को ऋण न देने के लिए अप्रत्यक्ष रूप से भड़काने का प्रयास कर रहे हैं। यह अर्थव्यवस्था की तबाही के अतिरिक्त और क्या है?

यदि ऐसे ही कर्जमाफी के वादे होते रहे तो यह कर्ज चुकाने की नीति को कहाँ ले जाकर छोड़ेगा।

2017 में उत्तर प्रदेश में की गई कर्ज़माफी के लिए भाजपा ज़िम्मेदार है लेकिन राहुल गांधी हालात और बदतर बनाने जा रहे हैं।

वर्तमान सरकार को अर्थव्यवस्था में गिरावट का दोषी ठहराना आसान होता है लेकिन जब केंद्र को प्राप्त कर का 62 प्रतिशत हिस्सा राज्यों को मिलता है ऐसे में उनका मोदी को हानि पहुँचाने के लिए वित्तीय प्रारूप को बिगड़ना तथा राहुल का सरकार को चेतावनी देना दोनों ही दोषी हैं।

यह स्पष्ट है कि राहुल गांधी किसी भी तरह से सही नहीं कर रहे हैं। मोदी के लिए यही सही होगा कि वह कृषि क्षेत्र से दूर ही रहें। किसानों की मदद के नाम पर अर्थव्यवस्था की हालत खराब करने से चुनाव हारना बेहतर है। यदि ऋण चुकाना बंद हो गया तो ऐसे में बैंक ऋण देना बंद कर देंगे और इससे सबसे ज्यादा संकट किसानों को ही झेलना पड़ेगा।