अर्थव्यवस्था
यूपीए सरकार में जीडीपी में तेजी से इंकार नहीं, लेकिन हमें पूछना चाहिए कि इस वृद्धि के लिए हमने क्या कीमत चुकाई है

प्रसंग
  • एनडीए सरकार के क्लीन अप पीरियड के दौरान विकास दर को यूपीए के एक दशक के बैसाखी पर हुए विकास से तुलना करना गलत होगा

इस बात से इंकार करना कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) कार्यकाल के दौरान सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर उच्च थी, भारतीय जनता पार्टी सहित किसी के लिए भी अशिष्ट होगा। यह बात कुछ समय पहले तक तो सच थी, लेकिन कुछ दिनों पहले जारी नई पद्धति के उपयोग से सकल घरेलू उत्पाद की पिछली श्रृंखला देखने के बाद यह अब और प्रासंगिक हो गया है।

आंकड़ों से पता चलता है कि यूपीए के शासन वाले दशक (2004-14) में औसत लागत मूल्य पर सकल घरेलू उत्पाद में 8.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी जबकि नरेन्द्र मोदी की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) पार्टी के शुरूआती चार सालों में यह औसत 7.35 प्रतिशत ही है।

इसके तीन कारण हैं-  2014-15 और 2015-16 में दो साल लगातार खराब मानसून, नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) । अगर यह तीन बाधाएं न आती तो यह अंतर और भी कम हो सकता था । तीनों बाधाओं में से केवल एक, नोटबंदी, को लेकर एनडीए पर निशाना साधा जा सकता है। बाकी दो कारण, प्राकृतिक आपदा और राष्ट्रीय आम सहमति के परिणामस्वरूप लगने वाले कर के लिए भाजपा को दोषी नहीं ठहराया जा सकता ।

अगर इन बाधाओं को दरकिनार भी कर दिया जाए तो भी यह संभव है कि यूपीए और एनडीए के विकास के आँकड़ों के बीच में एक बड़ा अंतर रहा होगा।

इसलिए, पी. चिदंबरम, जो यूपीए सरकार में अधिकांश मामलों में वित्त प्रबंधक थे, शीर्ष आंकड़ों के बारे में अपनी पीठ थपथपाने के हकदार हैं। कल (19 अगस्त) को उन्होंने कहा, “सच्चाई हमेशा के लिए नहीं दबाई नहीं जा सकती है……आंकड़े बोलते हैं। मुख्य और निर्विवाद निष्कर्ष यह है कि आजादी के बाद से यूपीए -1 और यूपीए -2 ने उच्चतम दशकीय वृद्धि (कारक लागत पर 8.13 प्रतिशत) दर्ज की।”

चिदंबरम की बातों मे कुछ सच्चाई है जिसे हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता।

2006-07 में 10.8 प्रतिशत की दर से दशक के उच्चतम स्तर पर वृद्धि संख्या सुर्खियों में रही जो तथ्यात्मक है (सकल घरेलू उत्पाद की संख्या में लगातार संसोधन हो रहा है यही वजह है कि ये आंकड़े मौजूद हैं )। तथ्यों के आधार पर स्थिति सामने आ सकती है।

असलियत यह है कि यूपीए ने पैसे खर्च करके विकास खरीदा है। इसका दावा करना कि ‘विकास तो वास्तविक था लेकिन कीमतें नहीं’ अविश्वसनीय होगा।

यूपीए ने उच्च विकास करके सुधार नही किया जो अधिकांशतः वाजपेई युग में हुआ  बल्कि जुनूनी तौर पर पैसे को पानी की तरह बहा कर ऐसा किया। 2003-04 से लेकर 2007-08 तक वैश्विक गर्मबाजारी के दौर में यूपीए के उच्च विकास प्रक्षेपण का वर्णन केवल इसकी उच्च व्यय नीतियों द्वारा किया जा सकता है, जिसके परिणामस्वरूप उच्च मुद्रास्फीति दर स्थापित हुई। जब वस्तु  मूल्य घटने के कारण वैश्विक स्तर पर कीमतों में कमी आ रही थी तब 5 प्रतिशत खुदरा मुद्रास्फीति (उपभोक्ता मूल्य सूचकांक – औद्योगिक श्रमिक) के तहत प्रारंभिक दो वर्षों के बाद, यूपीए सरकार के दिनों के दौरान कीमतों में लगातार कमी आई जिसमें पूर्व लेहमान-अवधि शामिल है।

यूपीए -2 के दौरान लगभग हर वर्ष खुदरा मुद्रास्फीति दहाई अंकों में थी और पाँच साल की अवधि के लिए औसत 10.3 प्रतिशत था; यूपीए के दस वर्षों के कार्यकाल में यह औसत 8.15 प्रतिशत था (सभी आंकड़े आरबीआई हैंडबुक ऑफ इंडस्ट्री इकोनॉमी, 2017 से लिये गये हैं) 2014-17 में एनडीए का खुदरा मुद्रास्फीति औसत 4.6 प्रतिशत रहा है (इस अवधि के दौरान स्रोत से लिया गया डाटा यहां उपलब्ध है)।

2006-07, वह वर्ष जिसमें सकल देशी उत्पाद की कीमतें आसमान छू रहीं थीं, के बाद केंद्र सरकार के सकल राजस्व में कमी आनी शुरू हो गई। ऐसा केवल लेहमान संकट के ही कारण नहीं था बल्कि इस तथ्य के कारण भी था कि यूपीए ने हर हाल में अर्थव्यवस्था चलाने का फैसला किया, भले ही तत्कालीन विकास की आशंका समाप्त हो गई हो।

चार तर्कों पर विचार करें।

पहला, पिछले छह वर्षों में यूपीए का औसत सकल राजकोषीय घाटा 5.42 प्रतिशत अधिक था। इसके विपरीत, एनडीए के पदभार ग्रहण करने के प्रथम वर्ष को छोड़कर यह आंकड़ा चार प्रतिशत से नीचे रहा है, जहाँ स्पष्ट रूप से यूपीए की विरासत थी। साधारण शब्दों में इसका मतलब यह हुआ कि वित्तीय गैरजिम्मेदारी ने वृद्धि को मिनटों में कम कर दिया। यूपीए ने अपने पहले चार वर्षों में केवल वित्तीय अनुशासन बनाए रखा, इस समय तेजी से विकास हो रहा था और कर राजस्व भी बढ़ रहा था। यहाँ पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि यह उच्च सकल राजकोषीय घाटा पिछले छह वर्षों में यूपीए के 2010-11 में 1,06,000 करोड़ रुपये से अधिक के 3 जी स्पेक्ट्रम राजस्व की समृद्दि (बोनान्ज़ा) प्राप्त करने के बावजूद था। यह बोनान्ज़ा शासन ने अंधाधुंध खर्च करके उड़ा दिया था।

दूसरा, राजकोषीय वृद्धि का एक बड़ा हिस्सा तेल के लिए गलत तरीके से दी गयी सब्सिडी के रूप में था। यूपीए के दशक में, कुल तेल सब्सिडी 8.3 लाख करोड़ रुपये थी – जो प्रतिवर्ष 83,000 करोड़ रुपये से अधिक है।

अगर हम यह मान लें कि इसकी आधी सब्सिडी ही अनिवार्य थी क्योंकि मिट्टी के तेल और खाना पकाने की गैस के लिए कुछ सब्सिडी की आवश्यकता होती है, तो इस हिसाब से यूपीए की सत्ता में प्रत्येक वर्ष 40,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का राजस्व प्रोत्साहन छोड़ दिया जाता था – यह वह सब्सिडी थी जो गरीबों को स्पष्ट रूप से नहीं दी जाती थी।

तीसरा, तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के अनुसार, यूपीए ने लेहमैन अवधि के बाद बहुत बड़ी मात्रा में उत्पाद शुल्क और सेवा कर में कटौती की पेशकश की, जिसकी लागत 1,80,000 करोड़ रुपये से अधिक थी। अगर हम इस तथ्य को जोड़ें कि 2014 में चिदंबरम ने ऑटोमोबाइल और उपभोक्ता वस्तु उद्योगों के विशेष उत्पाद शुल्क में कटौती की पेशकश की, तो यहां बड़े पैमाने पर यूपीए की तेल अर्थव्यवस्था का कुप्रबंधन स्पष्ट हो जाता है: यहाँ तक कि अगर ईधन की सब्सिडी में इजाफा होता है, तो कारों की घटती कीमतें लोगों को अधिक ईंधन का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करती है।

चौथा, सब्सिडी का दूसरा पहलू स्पेक्ट्रम और कोयले जैसे प्राकृतिक संसाधनों की बिक्री में गिरावट का था, जिसके परिणामस्वरूप स्पेक्ट्रम और कोलगेट घोटाले हुए थे। यहां तक कि राजकोष भारी वित्तीय घाटे में जा रहा था और ए. राजा, वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री की सहमति के साथ, 2001 की कीमतों पर स्पेक्ट्रम बेच रहा था। आवंटियों ने भारी जनसंपर्क में इक्विटी बेचकर बड़ी मात्रा में सिर्फ स्पेक्ट्रम से मोटी पूजी जुटाई।

बेशक, हमें आने वाले वर्षों में दूरसंचार मे उछाल मिला, लेकिन यह उछाल करदाता की कीमत पर खरीदा गया था और उसके एवज में हर भारतीय को राजकोषीय घाटे मे दो अंकों की खुदरा मुद्रास्फीति की दर से कीमत चूकानी पडी।

उच्च राजकोषीय भ्रष्टाचार की वजह से वृद्धि की इस “खरीद” का परिणाम यह रहा कि उच्च खुदरा मुद्रास्फीति और विकास दर में आगामी मंदी, सार्वजनिक और निजी निवेश की कमी तथा दोहरे बैलेंस शीट की समस्या खडी हुई।

यह कह सकते हैं कि तेल की कीमतों में गिरावट के मामले में एनडीए को अपना खुद का अप्रत्याशित लाभ मिला। लेकिन यूपीए ने घाटे मे चल रही तेल विपणन को दरकिनार कर राजस्व कर और स्पेक्ट्रम के अप्रत्याशित लाभ को विचारहीन सब्सिडी में बढ़ाके दिखाया, जबकि, एनडीए ने वास्तव में राजकोषीय घाटे को कम करने और तेल क्षेत्र को सुदृढ़ बनाने के लिए अपने अप्रत्याशित लाभ का इस्तेमाल किया।

पूछा जाए कि कौन सी आर्थिक रणनीत बेहतर है?

यदि सिफ व्यय करने की रणनीति से मुद्रास्फीति या उच्च राजकोषीय घाटे पर कोई फर्क नहीं पड़ता तो यह सराहनीय है।  दुनिया की कोइ भी सरकार ऐसा करने में प्रसन्न नहीं होगी। मोदी सरकार ने भी ऐसा नहीं किया और हम अपेक्षाकृत धीमी वृद्धि के लिए इसे दोषी ठहरा रहे हैं।

यूपीए -1 से एनडीए -1 की विरासत में मुद्रास्फीति कम, राजकोष में सुधार और एक चालू खाता अधिशेष था। यूपीए  -2 ने एनडीए -2 को उपहार में दोहरे अंकों की मुद्रास्फीति, दोहरे घाटे की समस्या, दोहरे बैलेंस-शीट की समस्या, निजी निवेश का पतन और रोजकोष की लूट दी।

एक टिप्पणीः 1988-89 में राजीव गाँधी के कार्यकाल के दौरान 10.2 प्रतिशत की अधिकतम वृद्धि दर्ज की गई थी। हम जानते हैं कि भारत उस शानदार प्रदर्शन के बाद दिवालिया होने के कगार पर था। वह वृद्धि भी राजकोषीय भ्रष्टाचार की देन थी। वी पी सिंह की कमजोर सरकार इस स्थिति को सुधारने के लिए कुछ भी नहीं कर सकी, और 1991 में इस गंदगी को साफ करने का जिम्मा पी वी नरसिम्हा राव को दिया गया। इस बार, यूपीए -2 की गंदगी मोदी द्वारा साफ की गई थी। यूपीए के बैसाखी पर विकास के पूरे दशक की तुलना अगर एनडीए सरकार के विकास प्रदर्शन से की जाए तो यह गलत होगा। अगर एनडीए दोबारा सत्ता में आती है तो एनडीए और यूपीए के दर्शकों की तुलना करना ठीक होगा।

जगन्नाथन स्वराज के संपादकीय निदेशक हैं। वह @TheJaggi पर ट्वीट करते हैं।