अर्थव्यवस्था / भारती
सहकारी समितियों के लिए बना नया मंत्रालय कृषि मंत्रालय के लिए क्या परिवर्तन लाएगा

बुधवार (7 जुलाई) को नियोजित कैबिनेट विस्तार एवं फेरबदल से पूर्व नरेंद्र मोदी सरकार ने एक नए मंत्रालय के गठन की घोषणा की- सहकारिता मंत्रालय और गृह मंत्री अमित शाह को इस नए मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है।

इस नए मंत्रालय की घोषणा करती हुई प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) की विज्ञप्ति में कहा गया कि “यह मंत्रालय देश में सहकारिता आंदोलन को मज़बूत करने के लिए एक अलग प्रशासनिक, कानूनी और नीतिगत ढाँचा प्रदान करेगा।”

इस विज्ञप्ति में आम तौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सहाकारी समितियों की महत्ता का उल्लेख किया गया है और विशेष रूप से बहु-राज्य सहकारी समितियों (एमएससीएस) के विकास की आवश्यकता की बात की गई है।

एमएससीएस ऐसी समितियाँ होती हैं जो राज्य सीमाओं की दोनों ओर काम करती हैं, जमा राशि लेती हैं और ऋण देती हैं तथा वर्तमान में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अधीन आने वाले कृषि, सहकारी समिति एवं किसान कल्याण विभाग के अंतर्गत काम करती हैं।

इस विभाग में 1,295 एमएससीएस सूचीबद्ध हैं। हालाँकि, इस घोषणा का संबंध वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा 1 फरवरी 2021 को प्रस्तुत केंद्रीय बजट से है। बजट का अनुच्छेद 94 कहता है, “बहु-राज्य सहकारी समितियों के लिए सरकार प्रतिबद्ध है।”

साथ ही उन्होंने इन समितियों को पूर्ण समर्थन देने की बात कही थी। “सहकारी समितियों के लिए व्यापार सहजता (ईज़ ऑफ डुइंग बिज़नेस) बढ़ाने के लिए मैं प्रस्तावित करती हूँ कि उनके लिए एक पृथक प्रशासनिक संरचना बने।”, सीतारमण ने आगे कहा।

1 फरवरी 2021 को वित्त मंत्रालय के बाहर निर्मला सीतारमण

उस समय इस घोषणा पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया था और न ही यह अनुमान लगाया गया था कि एक अलग “प्रशासनिक संरचना” का अर्थ एक नए मंत्रालय का गठन होगा। इस नए मंत्रालय के उद्देश्य को दो तरीकों से समझा जा सकता है-

पहला, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय पर इसका प्रभाव। तुलनात्मक रूप से यह कृषि मंत्रालय की महत्ता को कम कर देता है। भले ही इस मंत्रालय के अधीन अभी भी बहुत कुछ आता है लेकिन किसी एक विभाग का एक बड़ा भाग लेकर उसका नया मंत्रालय बना देना, मूल निकाय को कमतर करता है।

साथ ही एक संभावना हो जाती है कि भविष्य में पूरे के पूरे कृषि मंत्रालय को ही भंग किया जा सकता है। एमएससीएस के अलावा मंत्रालय के पास सिंचाई, मत्स्यपालन एवं पशुपालन, शोध एवं शिक्षा तथा कृषि कौशल विकास का काम रहता है।

इसके अलावा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का मुद्दा भी है। सैद्धांतिक रूप से सिंचाई जल संसाधन मंत्रालय का भाग हो सकता है, शोध विज्ञान एवं तकनीक का, शिक्षा शिक्षा मंत्रालय के अधीन और कृषि कौशल विकास कौशल विकास मंत्रालय के अधीन।

मात्र एमएसपी संबंधित कार्य ही कृषि मंत्रालय विशिष्ट कार्य है। हालाँकि इसे किसी विनियामक प्राधिकरण को भी दिया जा सकता है। फिर बचा मत्स्यपाल एवं पशुपालन जिसे एक मंत्रालय की आवश्यकता होगी। इस पूरी प्रक्रिया को कई वर्षों में किया जा सकता है।

कृषि मंत्रालय के न होने पर भी उसका हर कार्य दूसरे मंत्रालयों के अधीन चला जाएगा जिससे अत्यधिक नीति-निर्माण की बजाय उनका क्रियान्वयन बेहतर हो सकेगा। यह ग्रामीण राजनीतिक शक्तियों को कम करेगा जैसे कृषि संबंधित राजनीतिक लोग इस मंत्रालय का लाभ उठाते हैं। इसके बाद कृषि को एक वास्तविक प्रतिनिधित्व मिलेगा।

कई महीनों से जारी कृषि कानून-विरोधी आंदोलन

दूसरा, यह देखना अभी शेष है कि इस मंत्रालय के अधीन और किन सहकारी समितियों को लाया जाता है। एक संभावना चिट फंडों में हस्तक्षेप की हो सकती है। वर्तमान में 2019 में संशोधित चिट फंड विधेयक 1982 चिट फंड के कार्यों को नियंत्रित करता है।

इन निकायों पर राज्य सरकारों का नियंत्रण होता है, हालाँकि अधिनियम में केंद्र सरकार की बात की गई है। चिट फंडों को गैर-बैंकिंग वित्त कंपनी माना जाता है लेकिन भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के खंड 45-1अ के तहत उनका पंजीयन आवश्यक नहीं होता है।

साथ ही, चिट फंड जमा राशि नहीं लेते हैं, बल्कि सब्सक्रिप्शन मॉडल पर काम करते हैं। ऐतिहासिक रूप से चिट फंड कई सारे वित्तीय घोटालों का कारण रहे हैं जिससे सामान्य जनता को भारी नुकसान झेलना पड़ा है।

प्रायः जिन राज्यों में चिट फंड काम करते हैं, वहाँ उनकी राजनीतिक पहुँच होती है। ऐसे में जिन सदस्यों के साथ धोखाधड़ी होती है, उन्हें न्याय मिलने में समस्या होती है। क्या सरकार चिट फंड प्रबंधन का काम नए मंत्रालय को सौंपेगी जिसमें आरबीआई की भी भूमिका हो?

इसके अलावा ग्रामीण सहकारी समितियों में भी हस्तक्षेप किया जा सकता है। गुजरात सहकारी दुग्ध विपणन संघ या अमूल के प्रबंध निदेशक आरएस सोढ़ी ने अपने ट्विटर खाते से इस नए मंत्रालय का स्वागत किया।

क्या और अमूल हो सकते हैं? क्या किसान उत्पादक संघ (एफपीओ) के विनियमन को बजट 2019 और 2020 में जो प्रोत्साहन मिला, उसका लाभ इस मंत्रालय से जोड़कर दिया जाएगा? शिक्षा के क्षेत्र में सहकारी समितियाँ हैं। हालाँकि वे राज्य-विशिष्ट होती हैं और उन्हें संभवतः केंद्रीय मंत्रालय के अधीन लाना लाभकारी नहीं होगा।

मोदी सरकार के अधिकांश निर्णयों की तरह ही इस घोषणा के इर्द-गिर्द भी कुछ दिनों तक अटकलें लगती रहेंगी। लेकिन इसके साथ ही रोचक संभावनाएँ खुल गई हैं जिसमें पारंपरिक रूप से एक स्थान पर केंद्रित राजनीतिक शक्तियों को फैलाया जा रहा है।