अर्थव्यवस्था
कर्ज़माफी को मोदी की अस्वीकृति- राजनीति में यथार्थवाद की ओर एक शुरुआत है

आशुचित्र-

  • बदलाव के विचार का प्रभावशाली अथवा निष्क्रिय होना अधिकारी तंत्र की स्वीकृति पर नहीं बल्कि राजनेताओं द्वारा मतदाताओं को तर्कसंगत रूप से समझाने पर निर्भर करता है।
  • चुपके से बदलाव करना भारतीय राजनीतिक अर्थव्यवस्था में अब कोई स्थान नहीं रखता है।

कांग्रेस द्वारा किसानों के ऋण माफ करने के वादों से तीन राज्यों में चुनाव जीतने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह अनुभूति होना कि खतरनाक लोकलुभावनवाद केवल सीधी लड़ाई से लड़ा जा सकता है, एक श्रेष्ठ बात है।

ग़ाज़ीपुर में कहते हुए उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि केंद्र से किसी भी प्रकार के ऋण माफ़ नहीं किए जाएँगे। गौरतलब है कि राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी को ऋण माफ़ नहीं करने तक निद्राहीन रातों की धमकी भी दी थी। उनकी खुद की पार्टी की राज्य सरकारों द्वारा ऋण माफ़ करने की बात पर उन्होंने कहा कि ऐसी ऋणमाफी की घोषणाएँ “लॉलीपॉप” हैं और किसानों को इनसे कोई फायदा नहीं होगा।

उन्होंने कहा था कि वर्ष 2009 में किसानों के क़र्ज़ का मूल्य छ: लाख करोड़ था लेकिन यूनाइटेड प्रेग्रेसिल अलायंस (यूपीए) सरकार ने केवल 60,000 करोड़ के ऋण ही वसूले तथा उन्होंने कहा था, “35 लाख लाभार्थी ऐसे थे जो न तो किसान थे और न ही उन्होंने कोई ऋण ले रखा था। कर्ज़माफी से किसे फायदा पहुँचा था? मैं आपको कांग्रेस के झूठ और बेईमानी से सावधान करना चाहता हूँ।”

मोदी का “लॉलीपॉप” वाला कहा हुआ कथन किसी भी अन्य किसान कल्याण योजना के लिए नहीं है और यह एक अच्छी शुरुआत है तथा इससे सरकार द्वारा कर्ज़माफी की रीति से मुकाबला करने की एक उम्मीद दिखाई देती है।

आने वाले समय में जब कर्ज़माफी पर राजनीति गरमा जाएगी तब ऐसे में मोदी को अपना कथन स्पष्ट रूप से समझाने की आवश्यकता होगी कि ऋणमाफी का किसानों पर क्या नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

उन्हें उदाहरण देते हुए समझाना चाहिए कि 2014 से लेकर अभी तक दो लाख करोड़ के कर्ज़ माफ किए जा चुके हैं और उन्हें किसानों से यह पूछना होगा कि क्या ऋण माफ होने के बाद भी उनके हालात में सुधार हुआ है?

उन्हें पूछना होगा कि बैंक अब आसानी से ऋण दे रहे हैं या उससे बच रहे हैं?

उन्हें किसानों को बताना होगा कि जिस राशि को ऋणमाफी के लिए उपयोग किया जा रहा है वही राशि अन्य योजनाओं तथा सुविधाओं में लगाई जा सकती है जैसे कि शीतकालीन भंडार गृह जिनसे किसानों की आय में वृद्धि हो सकती है।

उन्हें किसानों से पूछना होगा कि क्या वे नगद के बदले सब्सिडी और उर्वरक लेना चाहेंगे।

वहीं मोदी को फसल के बीमा की योजना, उपग्रह की मदद से बाढ़, सूखे और कीड़े द्वारा फसलों को खतरे की जानकारी तथा नुकसान की भरपाई की योजनाएँ समझानी होंगी जहाँ पैसा सीधे किसानों के खाते में जाएगा।

मोदी को वादा करना होगा कि केंद्र द्वारा खाद्य सब्सिडी पर खर्च किया जाने वाला पूरा पैसा अब राज्यों को मिलेगा जिससे वे सीमित न्यूनतम सहयोग राशि (एमएसपी) निर्धारित करने में या मुख्य फसलों के लिए कीमत स्थिरीकरण कोष के लिए उपयोग कर सकेंगे। वहीं भारतीय खाद्य निगम सीमित मात्रा में चावल, गेहूँ, और अन्य अनाज केवल बफर भंडार संचालन के लिए खरीदेगा।

मोदी को यही सवाल सार्वजनिक क्षेत्रों की कंपनियों के लिए भी पूछना होगा जैसे एयर इंडिया और बीएसएनएल जो करदाताओं का पैसा पानी की तरह बहा रही हैं। यदि किसान और शहरी गरीब समझ जाएँगे कि किस तरह उनके अधिकार का पैसा इन कंपनियों पर व्यर्थ बह रहा है तो इनके निजीकरण के लिए लोगों का सहयोग भी प्राप्त होने लगेगा।

यदि उत्तर प्रदेश में मोदी का भाषण अर्थव्यवस्था की सच्चाई को लोगों के समक्ष प्रस्तुत करने का एक नया राजनीतिक प्रयास है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। बदलाव के विचार प्रभावशाली अथवा निष्क्रिय अधिकारी तंत्र के स्वीकारे जाने से नहीं बल्कि राजनेताओं द्वारा मतदाताओं को तर्कसंगत रूप से समझाने के कारण होते हैं। चुपके से बदलाव करना भारतीय राजनीतिक अर्थव्यवस्था में अब कोई स्थान नहीं रखता है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।