अर्थव्यवस्था
वित्त मंत्री को संदेश- कर राजस्व या कर आधार बढ़ाने के लिए नए मापदंड, पद्धति ज़रूरी

पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “सीमलेस (बाधारहित), पेनलेस (पीड़ारहित) और फेसलेस” कर प्रणाली की घोषणा की। साथ ही करदाता चार्टर, जिसमें करदाताओं के अधिकार और दायित्व लिखे हैं, का अनावरण किया।

इससे करदाताओं को जो नौकरशाह परेशान करते और उनसे पैसे वसूलते थे, उससे राहत मिलेगी इसलिए यह कदम सही दिशा में है। लेकिन साथ ही प्रधानमंत्री ने इसपर अफसोस व्यक्त किया कि 130 करोड़ लोगों में से सिर्फ 1.5 करोड़ लोग ही कर का भुगतान करते हैं।

हालाँकि मोदी सरकार यदि करदाता के प्रति मित्रवत् बनने मात्र से अपेक्षा कर रही है कि करदाताओं की संख्या बढ़ेगी तो यह अपेक्षा बहुत अधिक है। ऐसा इसलिए क्योंकि कर राजस्व सही राजस्व दर्शन होने पर निर्भर करता है, न कि मात्र अधिक पारदर्शिता पर।

अगर उद्देश्य अधिक कर राजस्व है तो इसे करदाताओं की कम संख्या से भी पूरा किया जा सकता है। और अगर उद्देश्य करदाताओं की अधिक संख्या है तो इसके लिए दूसरा तरीका अपनाना होगा।

वास्तविकता यह है कि 1.5 करोड़ से कई अधिक लोग वास्तव में कर भरते हैं। राजस्व विभाग के डाटा के अनुसार 2017-18 वित्तीय वर्ष में 8.55 करोड़ लोगों ने कर भरा था लेकिन 6.33 करोड़ लोगों ने ही आयकर रिटर्न भरा था। इसका अर्थ हुआ कि 2.2 करोड़ लोग जिनका आयकर स्रोत पर ही कट जाता है, वे टैक्स रिटर्न नहीं भरते।

लेकिन अगर टैक्स रिटर्न भरने वालों में से 1.5 करोड़ लोग ही अंततः प्रत्यक्ष कर भर रहे हैं तो कर को लेकर हमारी अवधारणाओं पर पुनः चिंतन की आवश्यकता है, कर अनुपालन में कमी की धारणा बनाकर बैठने से कुछ नहीं होगा।

संभवतः हम गलत मापदंड पर नाप रहे हैं कि कितना कर भरा जाना चाहिए, हमें यह देखना चाहिए किससे कितना वसूला जाना सही होगा। भारत का कर-जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) अनुपात 11-12 प्रतिशत है जिसका आधा प्रत्यक्ष करों से आता है।

लेकिन अगर हम वास्तविकता देखें कि करोड़ों नागरिक जल्दी काम कराने के लिए पैसे या घूस देते हैं तो कर-जीडीपी अनुपात काफी अधिक हो जाएगा। कर-जीडीपी के आकलन से निजी कर को बाहर नहीं रखा जा सकता, भले ही इसका अनुमान लगाना कठिन है।

हमारे पास एक बड़ा कारण है कि भारतीय परिप्रेक्ष्य में मापदंड के रूप में कर-जीडीपी अनुपात को ही नकार दिया जाए क्योंकि विश्व भर में इस अनुपात में काफी अंतर है। वर्ल्ड बैंक डाटा के अनुसार, यूएस का कर-जीडीपी अनुपात (9.6 प्रतिशत) भारत (11 प्रतिशत) से कम है।

नॉर्डिक देशों में यह अनुपात अधिक है, लगभग 20-30 प्रतिशत। वहीं स्विट्ज़रलैंड का अनुपात (10.1 प्रतिशत) भारत से कम है। भारत में निजी कर वसूली को जोड़कर बनने वाले कर-जीडीपी अनुपात के अनुसार यदि हम नीतियाँ बनाएँगे तो गलत करेंगे। इसके अनेक कारण हैं।

पहला, कर-जीडीपी अनुपात देश की आर्थिक गतिविधि का सूचक नहीं है। यदि आर्थिक गतिविधि करों से अधिक तेज़ी से बढ़ती है तो ज़रूरी नहीं कि वह गलत ही हो क्योंकि आर्थिक गतिविधियाँ ही माँग और रोजगार सृजित करती हैं।

सरकारों को इस बात की चिंता करनी चाहिए कि क्या राजस्व राज्य के खर्च उठाने के लिए पर्याप्त है, अनुपात की चिंता नहीं होनी चाहिए। यदि सरकार जो करना चाह रही है, वह कम अनुपात से भी हो पा रहा है तो यह सफलता है, असफलता नहीं। अनुपात राजस्व और वृद्धि पर दीर्घ अवधि के अध्ययनों के लिए ही महत्त्वपूर्ण है, यह हमारा उद्देश्य नहीं है।

दूसरा, कर-जीडीपी अनुपात के अनुसार सोचने से सरकार इस निष्कर्ष पर पहुँच सकती है कि वह कम कर वसूल रही है जबकि वास्तविकता अलग हो सकती है। यदि आपको लगता है कि अधिक लोगों को कर भरना चाहिए या जो भर रहे हैं, उन्हें अधिक कर भरना चाहिए तो कर से बचने वालों या भ्रष्टाचार करने वालों के लिए नियम बनाएँगे।

लेकिन कर-जीडीपी अनुपात से प्रभावित होकर बनाई गई नीतियाँ परोक्ष रूप से भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे सकती हैं क्योंकि राजस्व बढ़ाने के लिए कर अधिकारी दूसरे तरीके अपनाएँगे- हालाँकि नया फेसलेस, पेनलेस तंत्र इसकी समाप्ति की ही बात करता है।

तीसरा, जातिगत, धार्मिक और भाषाई विभाजनों से विखंडित कम विश्वास वाले समाज में सरकारों का उद्देश्य होना चाहिए कि लोगों के हाथों में अधिक से अधिक पैसा छोड़ा जाए क्योंकि कर भुगतान में लोगों को भय रहता है कि उनके कर से न जाने किसको लाभ मिलेगा और वे अपने समुदाय के न्यास, आदि में दान देना बेहतर समझते हैं।

एकरूपी और एक संस्कृति वाले देशों में अधिक कर दर सही होती है क्योंकि करदाता जानता है कि इस कर का लाभ उसके ही संबंधियों को मिलेगा। भारत जैसे देश में जहाँ समुदायों के बीच एकता पर प्रश्न खड़े होते रहते हैं, वहाँ यह कर पाना संभव नहीं है।

चौथा, जिस देश में उच्च उत्पाद कर हैं जैसे हमारे देश में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) कर है, तो आयकर दर व जीएसटी दर में कुछ संबंध होना चाहिए। भारत के अधिकांश व्यापार अनौपचारिक हैं जहाँ व्यक्तिगत व्यापार बड़ी संख्या में हैं।

इसका अर्थ हुआ कि अधिक जीएसटी दर्शाता है कि व्यक्तिगत आय भी अधिक है और जब कोई अंतर इसमें दिखता है तो कर अधिकारी इसपर संदेह करेंगे। यही कारण है कि कई छोटी कंपनियाँ कम राजस्व दर्शाती हैं ताकि उन्हें अधिक व्यक्तिगत आयकर न भरना पड़े।

व्यापारी दो बहीखाते रखते हैं, एक नकद के लिए और एक जीएसटी के लिए। इसका अर्थ हुआ कि आयकर दर कम होनी चाहिए ताकि वे जीएसटी और व्यक्तिगत आय में विसंगतियाँ उत्पन्न न करें। अनेक दरों और छूटों वाली वर्तमान जीएसटी प्रणाली की आवश्यकता ही इसलिए है क्योंकि छोटे जीएसटी करदाता प्रत्यक्ष कर के दायरे में नहीं आना चाहते हैं।

पाँचवा, जिस देश में प्रति व्यक्ति आय (2019-20 में 1.34 लाख रुपये प्रति वर्ष) से दोगुना है कर से मुक्ति का स्तर (2.5-3 लाख रुपये की वार्षिक आय), वहाँ निस्संदेह ही स्तर काफी ऊपर है, नीचे नहीं।

इससे हम यह भी समझ सकते हैं कि जनसंख्या की तुलना में करदाताओं की संख्या इतनी कम क्यों है। यदि कर से मुक्ति का स्तर प्रति व्यक्ति आय के जितना होता तो घरेलू काम करने वाले, व्यक्तिगत ड्राइवर, प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन, आदि भी कर भर रहे होते।

छठा, यदि उच्चतम कॉरपोरेट कर दर उच्चतम व्यक्तिगत कर दर से कम है को व्यक्ति अपनी आय को भी कंपनी की आय में दर्शाएगा ताकि वह अधिक आयकर से बच सके। ऐसी चीज़ों को हम प्रोत्साहित नहीं करना चाहते हैं। कई फिल्म कलाकार जो करोड़ों में कमाते हैं, वे भी ऐसा ही करते हैं।

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि करदाताओं की संख्या को कैसे बढ़ाया जाएगा जब आधी जनसंख्या (कृषि) कर से मुक्त है और शहर के कई लोग न सिर्फ कर नहीं भरते हैं, बल्कि सब्सिडियों (गैस, आनाज, आदि पर) को लाभ भी उठाते हैं।

तीन निष्कर्ष निकलते हैं। पहला, यह भूल जाएँ कि कर-जीडीपी अनुपात कोई उचित मापदंड है। दूसरा, व्यक्तिगत आयकर दर को धीरे-धीरे कम करके 15 प्रतिशत पर लाएँ या उस स्तर पर जहाँ जीएसटी की औसत दर है।

साथ ही जो 2.2 करोड़ करदाता रिटर्न नहीं भरते हैं, वे हमें संकेत दे रहे हैं कि क्या किया जाना चाहिए- अधिक से अधिक स्थानों में स्रोत पर ही कर कटौती पर ध्यान दिया जाए, टैक्स रिटर्न पर कम। रिटर्न से मात्र कागज़ी काम बढ़ता है। हमें बहुत सारे करदाता चाहिए जो थोड़ा-थोड़ा कर भरें, न कि कम करदाताओं से अधिक कर वसूला जाए।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं। अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद निष्ठा अनुश्री द्वारा।