अर्थव्यवस्था
कीन्सियाई अर्थशास्त्र नौकरी या वृद्धि देने वाला नहीं, मात्र चुनावों में जीत दिलाने वाला

कीन्सियाई अर्थशास्त्र लगता है उतना ही टिकाऊ है जितना राहुल गांधी का राजनीतिक जीवन। जितना यह विफल होता है, उतना ही हर कोई सोचता है कि एक अंतिम बार और प्रयास करना चाहिए। प्रत्यक्ष है कि कीन्सियाई उपाय लघु अवधि में काम आते हैं लेकिन अपरिहार्य रूप से भविष्य के लिए एक समस्या खड़ी कर देते हैं।

हमने यह 2008 में वैश्विक आर्थिक मंदी, यूरोज़ोन संकट और हाल में कोविड के कारण मंदी के दौरान देखा है। एक वर्ष से भी कम की अवधि में अमेरिका ने कुल 40 खरब डॉलर से भी अधिक के तीन वित्तीय प्रोत्साहन जारी किए हैं और बाज़ार फिर भी परेशान है- जैसा कि बॉन्ड कमाई में उछाल से देखा गया।

हम शर्त लगा सकते हैं कि यह कम सोचा-समझा वित्तीय प्रोत्साहन भले ही आज हमें कितना ही मानवीय क्यों न लग रहा हो, लेकिन अगले संकट का आधार यही बनेगा। इसका एक उदाहरण जापान है जहाँ पिछले तीन दशकों से वित्त की अतियाँ हाथ से बाहर चली गई हैं- सार्वजनिक ऋण जीडीपी का 240 प्रतिशत है।

पैसे को पानी की तरह बहाने के बावजूद अधिकांश वर्षों में वृद्धि 0-1 प्रतिशत ही रही लेकिन इससे कोई फर्क पड़ता नहीं दिख रहा है। पिछली सदी में किसी आर्थिक सिद्धांत ने ऐसा राजनीतिक समर्थन प्राप्त नहीं किया है, जैसा कीन्सियाई अर्थशास्त्र को मिला है। संभवतः ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि माना जाता है कि ग्रेट डिप्रेशन की समस्या सुलझाने में इसने बड़ी भूमिका निभाई थी।

हालाँकि कई अर्थशास्त्री अभी तक इस बात की पुष्टि नहीं करते हैं कि मंदी से विश्व को उभारने में जॉन मेयनार्ड कीन्स का जादूई अर्थशास्त्र काम आया या द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वित्तीय विस्तार एक तरह से तय हो गया था। इसे लाभ कहें या हानि लेकिन जब भी राजनेता और उनके आर्थिक सलाहकार कोई तरीका नहीं खोज पाते हैं तो उन्हें कीन्स ही याद आते हैं।

जॉन मेयनार्ड कीन्स

सामान्य बुद्धि कहती है कि जब राजनेता और अर्थशास्त्री दोनों ही किसी विचार पर एक-दूसरे से काफी सहमत हों तो अवश्य ही लोगों के विरुद्ध कोई षड्यंत्र होगा। यह वास्तविक अर्थशास्त्र नहीं हो सकता। मेरे पूर्व सहकर्मी टीसीए श्रीनिवास राघवन ने कई बार कहा है कि कीन्सियाई वित्तीय हथकंडा अर्थशास्त्र से अधिक राजनीति है।

ऐसा क्यों, यह समझना कठिन नहीं है। चुनावी लोकतंत्रों में वृहत् अर्थव्यवस्था के चक्र से छोटी अवधि का होता है राजनीतिक चक्र जिसके कारण राजनेता मात्र यह सुनिश्चित करते हैं कि अगले चुनाव तक वृद्धि या नौकरियों में कोई कमी न हो।

अब जब लोगों को लगने लगा है कि कीन्स के अर्थशास्त्र से बाज़ार प्रसन्न नहीं है तो इस पुराने विचार को मॉडर्न मोनेटरी थियोरी (आधुनिक मुद्र सिद्धांत) के नाम से नए संस्करण के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

इस सिद्धांत का मानना है कि यदि कोई देश बाज़ार से कम दर पर ऋण ले सकता है, भले ही वह पहले से कितने ही ऋण में डूबा हो, उसे ऋण लेते रहना चाहिए जब तक यह ऋण का बोझ बड़ी मुद्रास्फीति के रूप में प्रत्यक्ष नहीं दिखने लगता। क्योंकि अभी तक उस बिंदु पर नहीं पहुँचा गया है इसलिए इस सिद्धांत को पूरी तरह से नकारा नहीं गया है।

मुझे संदेह है कि 2008, यूरो संकट और कोविड मंदी के बाद कीन्सियाई वृहत् अर्थव्यवस्था और सामान्य वृहत् अर्थव्यवस्था कई विफलताओं के बाद अक्षुण्ण बचेगी। यदि अर्थशास्त्रियों का सर्वश्रेष्ठ विचार यही सुझाव है कि और पैसा खर्च किया जाना चाहिए तो हम जले पर मरहम लगाकर वृद्धि का सपना देख रहे हैं।

राजनेता इस प्रकार के वित्तीय जादू करने में गैर-ज़िम्मेदार अर्थशास्त्रियों से अधिक सक्षम हैं। वास्तविक अर्थव्यवस्था पर्याप्त नौकरियाँ और अच्छी आय देने में सक्षम नहीं है और इस वास्तविक समस्या के लिए एक काल्पनिक समाधान खोजना, वास्तव में कोई समाधान है ही नहीं।

हम जिस नए विश्व में प्रवेश कर रहे हैं, वहाँ सूक्ष्म अर्थव्यवस्था की समझ और क्षेत्र की विशेषज्ञता तथा जो दिख रहा है व जिसे नापा जा सकता है, उसकी पहचान करके ही हम बेहतर तरीके खोज सकेंगे। वृहत् अर्थव्यवस्था में हम सिर्फ अनुमान लग सकते हैं कि क्या होगा लेकिन सूक्ष्म अर्थव्यवस्था पर नज़र हमें बेहतर समझ देगी।

क्षेत्र पर गहन ज्ञान और इससे जुड़े लोगों का अवलोकन- वे अर्थव्यवस्था से मिलने वाले प्रोत्साहन और अर्थदंडों पर कैसी प्रतिक्रियाएँ दे रहे हैं- से ही समझ होगी। वैज्ञानिक अध्ययन का आधार भी यह है कि चीज़ों को छोटे-छोटे टुकड़ों में समझा जाए।

पूरा डिज़ाइन करके अप बेहतर कार नहीं बना सकते हैं, बेहतर कार तब बनेगी जब आप इसके हर टुकड़े पर अलग से काम करके उसे डिज़ाइन करें और फिर उन टुकड़ों का आपसी तालमेल स्थापित करें। आज मैं जिस अर्थशास्त्री पर विश्वास करूँगा, वह वो नहीं होगा जो कीन्सियाई सुझाव दे, बल्कि वह जिसके वाक्यों में संदेह और नम्रता होगी।

“मुझे पूरा विश्वास नहीं है, लेकिन…”, “हमें एक बार यह करके देखना चाहिए, यदि यह विफल होता है तो हम इससे सीख लेंगे और कुछ बेहतर करेंगे।”, इस प्रकार के वाक्य बोलने वाले अर्थशास्त्री पर मैं विश्वास करूँगा। रोचक है कि रघुराम राजन, कौशिक बसु और अमर्त्य सेन जैसे प्रसिद्ध अर्थशास्त्री खराब गणित वाले आर्थिक सुझाव दे रहे हैं।

वहीं एक राजनेता- नरेंद्र मोदी सामान्य बुद्धि के आधार पर रूढ़िवादी आर्थिक सुझावों को मान रहे हैं। इसके अलावा आर्थिक चक्र को चुनावी चक्र के साथ लाने की लोकतांत्रिक समस्या को भी मोदी दीर्घ अवधि का समाधान दे रहे हैं। वहीं उनके विरोधी मानते हैं कि मूर्खतापूर्ण आर्थिक विस्तार और अशक्त शासन ही स्वस्थ लोकतंत्र है।

अप्रैल में होने वाले विधान सभा चुनावों में राजनीतिक दल कई मुफ्त वस्तुओं की घोषणा कर रहे हैं जो फिर से सिद्ध कर रहे हैं कि राजनीतिक और आर्थिक चक्र के एक साथ न चलने की समस्या को मोदी के अलावा कोई नहीं समझ रहा है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं।