अर्थव्यवस्था
दूरसंचार क्षेत्र में जियो बनाम एयरटेल का युद्ध क्यों अब एक-तरफा नहीं रहने वाला

जो लोग सोच रहे थे कि दूरसंचार के क्षेत्र में प्रभुत्व के लिए भारती एयरटेल और रिलायंस जियो की टक्कर एक-तरफा हो रही है, उनके लिए एक ताज़ा समाचार है कि हाल के महीनों में एयरटेल ने अधिक गति पकड़ ली है।

अवश्य ही जियो कुल उपभोक्ताओं की संख्या में अभी भी शीर्ष पर है। भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण के अनुसार नवंबर 2020 तक जियो के 40.8 करोड़ उपभोक्ता थे जबकि एयरटेल के 33.4 करोड़। ब्रॉडबैन्ड सेवाओं में भी जियो की बाज़ार भागीदारी 55 प्रतिशत की है जबकि एयरटेल की 23.5 प्रतिशत।

लेकिन अगस्त से नवंबर 2020 के चार महीनों में एयरटेल ने जियो से अधिक उपभोक्ताओं को स्वयं से जोड़ा है। नवंबर में एयरटेल से 43.7 लाख नए उपभोक्ता जुड़े जबकि जियो से मात्र 19.3 लाख उपभोक्ता। जियो के लिए चिंता का विषय यह भी है कि इसका सक्रिय उपभोक्ता आधार एयरटेल से कम है।

जियो के 80 प्रतिशत से कम उपभोक्ता सक्रिय हैं जबकि एयरटेल के 96.63 प्रतिशत उपभोक्ता सक्रिय हैं। गणना करने पर जियो के सक्रिय उपभोक्ता 33.8 करोड़ हो जाते हैं जो कि एयरटेल से ज़्यादा अधिक नहीं है। प्रति उपभोक्ता औसत राजस्व (एआरपीयू) में भी अंतर देखने को मिलता है।

एयरटेल का एआरपीयू 166 रुपये है जबकि जियो का 151 रुपये। घाटे की लगातार छह तिमाहियों को झेलने के बाद एयरटेल ने 2020-21 की तीसरी तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर 2020) में वापसी की, हालाँकि भारत में इसका परिचालन अभी भी तंगी झेल रहा है।

कुछ महीनों बाद जब एआरपीयू 200 रुपये पहुँच जाएगा तब भारत में इसका परिचालन भी बेहतर होगा। सुनील मित्तल के एयरटेल ने बाज़ी कैसे पलटी? आर्थिक रूप से कमज़ोर वी और सस्ते फीचरफोन के साथ डाटा की बिक्री को रोकने से जियो से नए उपभोक्ताओं का न जुड़ना कुछ कारण रहे।

जियो का फीचरफोन

हालाँकि यह परिस्थिति बदल सकती है जब जियो गूगल द्वारा बनाए जा रहे एक नए सस्ते स्मार्टफोन के साथ अपना डाटा इस वर्ष के उत्तरार्ध में फिर से बेचना शुरू कर दे लेकिन देखना होगा कि यह कैसे होता है। जियो की मार झेलने के बाद 2019 के अंत में एयरटेल लड़ाई के लिए फिर से तैयार हुई।

जियो के साथ कम शुल्क की लड़ाई में क्षतिग्रस्त हो चुकी एयरटेल ने शुल्क बढ़ाने का साहस जुटाया। हालाँकि जियो समेत सभी दूरसंचार कंपनियों को इसका लाभ हुआ लेकिन एयरटेल ने दिखा दिया कि यह एक बार पुनः शुल्क का पथ-प्रदर्शक बन सकता है।

तब से इसने दो और प्रयास किए हैं- पहला गत दिसंबर में हैदराबाद में 5जी सेवाओं का लाइव प्रदर्शन। रिलायंस उद्योग की आखिरी वार्षिक महासभा में जियो ने घोषणा की थी कि उसके पास घरेलू रूप से विकसित 5जी तकनीक है लेकिन 5जी की घोषणा करने वाली पहली कंपनी एयरटेल ही बनी।

इससे एक बात समझी जा सकती है कि जब वित्तीय वर्ष 2021-22 में 5जी स्पेक्ट्रम की नीलामी होगी तो अपनी सेवाएँ जारी करने में एयरटेल पीछे नहीं रहेगा। एयरटेल का दूसरा बड़ा प्रयास रणनीतिक है और वित्त इकट्ठा करने की जियो की योजना की तरह ही है।

2020 में मध्य में रिलायंस ने फेसबुक, गूगल, क्वलकॉम जैसे कई अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों को जोड़ा और जियो प्लैटफॉर्म्स, जिसमें जियो दूरसंचार, जियो मार्ट, जियोसावन और कई ऐप्स और सेवाएँ आती हैं, के 33 प्रतिशत शेयर उन्हें दे दिए। इससे 2020 के अंत तक रिलायंस पर कोई ऋण नहीं रहा।

अब एयरटेल अपनी परिसंपत्तियों का मुद्रीकरण कर रही है और यह अपनी डिजिटल परिसंपत्तियों जैसे एयरटेल पेमेन्ट्स बैंक, एयरटेल डीटीएच (डिश सेवा), फाइबर-आधारित ब्रॉबैन्ड सेवा, आदि को अलग करके ऐसा कर रही है।

छोटी-सी दुकान पर एयरटेल पेमेन्ट्स बैंक

इकोनॉमिक्स टाइम्स  को दिए एक साक्षात्कार में सुनील मित्तल ने कहा था कि दो अलग व्यवसायों के लिए एक होल्डिंग कंपनी बनाने की योजना रहेगी- एक में सिर्फ दूरसंचार और दूसरे में सभी डिजिटल सेवाएँ जैसे पेमेन्ट्स बैंक जिसे भारतीय रिज़र्व बैंक की अनुमति के बाद एक छोटा वित्त बैंक बना दिया जाएगा।

डिजिटल व्यापार के भाग बेचकर भारती एयरटेल ऋण से मुक्त होने के लिए आवश्यक संसाधनों को जुटा सकेगी। तीसरी तिमाही में एयरटेल ने रिपोर्ट किया कि ब्याज, कर, मूल्य-ह्रास और ऋणमुक्ति से पहले की कमाई (एबिटडा) से तीन गुना है इसका कुल वार्षिक ऋण।

हालाँकि यह दिसंबर 2019 में 3.4 गुना के आँकड़े से कम है। साक्षात्कार में सुनील मित्तल ने कहा, “दूरसंचार कंपनियों के व्यापार में वित्तीय सेवाओं का क्षेत्र अगला महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है। मेरा मानना है कि एयरटेल पेमेन्ट्स बैंक कई अरब डॉलर का एक अवसर है।”

कुल मिलाकर बात यह है कि मुकेश अंबानी से लड़ने के सुनील मित्तल के सामर्थ्य को कम नहीं आँका जा सकता। इतिहास से इसे समझें- इस सदी के पहले दशक में रिलायंस इन्फोकॉम के साथ मुकेश अंबानी ने दूरसंचार के क्षेत्र में प्रवेश किया जो सीडीएमए तकनीक और कम शुल्क पर आधारित था।

लेकिन भारत पहले से ही दूरसंचार के लिए जीएसएम तकनीक का विस्तृत रूप से उपयोग कर रहा था और सीडीएमए कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाया। 2005 में बटवारे के बाद रिलायंस इन्फोकॉम अनिल अंबानी के पास चला गया और कंपनी ने भारी नुकसान झेला। पहले युद्ध में मित्तल विजयी हुए।

सौभाग्य से जियो के साथ मुकेश अंबानी को दूसरा अवसर मिला। उन्होंने काफी अच्छा प्रदर्शन किया है और मित्तल की एयरटेल समेत दूसरी दूरसंचार कंपनियों पर बढ़त बनाई है। लेकिन मित्तल लड़ रहे हैं और अंबानी को कड़ी टक्कर देने के लिए तैयार हैं। अंबानी के लिए यह सरल नहीं होगा।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं।