अर्थव्यवस्था
औद्योगिक क्रांति 4.0 में निर्माण के माध्यम से कैसे संभव है भारत का अपरंपरागत प्रवेश

हमारे जीने, काम करने और समाज से जुड़ने के तरीकों में परिवर्तन करने का सामर्थ्य रखने वाली आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), 3डी प्रिंटिंग, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) और क्वान्टम कम्प्युटिंग जैसी तकनीकों के आविष्कार से विश्व “औद्योगिक क्रांति 4.0” (आईआर4) की ओर बढ़ रहा है।

विशेषकर उद्योगों और निर्माण के क्षेत्र में आईआर4 शारीरिक रूप से कठिन और बार-बार करने वाले कार्यों के लिए यांत्रिकी प्रणालियों को डिजिटल प्रणालियों से जोड़ रहा है जो कठिन बुद्धि-संबंधी कार्य भी कर सके। जब ये दो शक्तियाँ मिल जाएँगी तो मशीनें न सिर्फ शारीरिक कार्य कर सकेंगी बल्कि स्वयं समझकर नए और कुशल पैटर्न से काम करेंगी।

वास्तुशास्त्र, अभियांत्रिकी और निर्माण उद्योग में इसे “कंस्ट्रक्शन 4.0” कहा जाता है। यह अर्थव्यवस्था और श्रम बाज़ार की संरचना को परिवर्तित कर रहा है जिससे कई सारी सामाजिक चिंताएँ उभर आईं हैं, विशेषकर तकनीक के कारण बेरोज़गारी और कार्य प्रणाली के अंत की।

ऐसा माना जाता है कि स्वचालित वस्तुएँ मानव का काम छीन लेंगी और वे बेरोजगार हो जाएँगे या “बेकार” की श्रेणी में आ जाएँगे, जैसे इतिहासकार और लेखक युवल नोआ हरारी कहते हैं, जिसका सामाजिक और राजनीतिक रूप से सामूहिक दुष्प्रभाव पड़ेगा।

वर्तमान में विकास के ट्रेंड की तुलना यदि हम पिछली औद्योगिक क्रांतियों से करेंगे तो एक मूल पैटर्न देखेंगे कि तकनीक, समाज, कार्य और राजनीति के आपसी संबंधों ने इस उथल-पुथल का कैसे सामना किया है। समाज किसी नई तकनीक को उस दृष्टि से देखता है कि उस समय या छोटी अवधि में वह उसके लिए कितनी लाभकारी है, अन्यथा बगावती तेवर दिखाए जाते हैं।

जैसा कि हमने ब्रिटेन में पहली औद्योगिक क्रांति के समय देखा, जिन यंत्रों को लाया गया, वे श्रमिकों का स्थन लेने वाली थीं। इससे काम स्वचालित हो गया, देहाड़ी घट गई और कामगारों के लिए रोजगार के अवसर व उनका जीवन स्तर घट गया। लेकिन कुछ दशकों में हवा पलट गई। औद्योगिक क्रांति का लाभ कामगारों तक पहुँचा, उन्हें उच्चतर देहाड़ी, बेहतर रोजगार और जीवन स्तर व राजनीतिक अधिकार मिले।

मूल बात यह है कि किसी भी तकनीकी परिवर्तन का प्राथमिक चरण असहज बना सकता है लेकिन शीघ्र ही इसका लाभ श्रमिकों तक भी पहुँचेगा। साथ ही तकनीक से उत्पादन बेहतर होता है, लागत कम होती है और उपभोग बढ़ता है जिससे लोगों की क्रय क्षमता व जीवन स्तर बढ़ता है।

लेकिन इससे बेहतर तर्क होगा कि नई तकनीक सृजनात्मक विध्वंस लेकर आती है। जब इसे उद्यमिता से जोड़ा जाता है तो नए उत्पाद और नई सेवाएँ बनती हैं, नए क्षेत्रों में रोजगार के भी नए अवसर बनते हैं जिन्हें नए कौशल के साथ श्रम चाहिए होता है। इस प्रकार अर्थव्यवस्था, श्रम बाज़ार और उपभोग की संरचनाओं में मौलिक परिवर्तन होते हैं।

टिप्पणीकारों और पत्रकारों द्वारा बढ़ा-चढ़ाकर कही जाने वाली “तकनीकी बेरोजगारी” और “कार्य का अंत” जैसी बातों को नकारकर अधिकांश वैज्ञानिक साहित्य उपरोक्त विचार का समर्थन करता है और संकेत देता है कि हो सकता है हम परिवर्तन के ही चरण में हों।

औद्योगिक क्रांति 4.0 की ओर बढ़ता भारत

भारत दावा कह रहा है कि वह आईआर4 का नेतृत्व करने वालों में से एक होगा लेकिन भारत में तकनीक स्वीकार्यता की स्थिति और स्वचालन को बढ़ावा देने के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था की आवश्यकता को समझें। भारत कह रहा है कि वह अपारंपरिक तरीके से औद्योगिक चरण से गुज़रे बिना सीधे औद्योगीकरण के बाद की एआई, 3डी प्रिंटिंग, आईओटी और क्वान्टम कम्प्युटिंग की अर्थव्यवस्था में पहुँच जाएगा।

यदि कोई अर्थव्यवस्था स्वचालन तकनीकों को अपनाना चाहती है तो ऐसा राज्य होना चाहिए जिसकी विचारधारा वैश्विक आर्थिक प्रणाली और श्रम, जो कि महंगा है, उस बाज़ार में प्रतिस्पर्धा की हो। इससे कंपनियाँ नवाचार करने और नई तकनीकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित होती हैं लेकिन “महंगे श्रम” में नवाचार और नई तकनीकों को चलाने का कौशल होना चाहिए।

क्या भारतीय राज्य की आर्थिक विचारधारा और श्रम बल स्वचालन तकनीकों को अपनाने की इन आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं? इसे समझने से पहले समझिए कि भारत का श्रम बल और पूंजी कहाँ लगी हुई है तथा इसकी उत्पादकता कितनी है।

चार्ट 1- 1980 से 2016 तकप्रमुख क्षेत्रों में भारत में रोजगार वृद्धि (डाटा स्रोत- केएलईएमएस 2018, आरबीआई)

चार्ट 2- 1980 से 2016 तक प्रमुख क्षेत्रों में आउटपुट की वृद्धि (डाटा स्रोत- केएलईएमएस 2018, आरबीआई)

ये दोनों चार्ट भारतीय अर्थव्यवस्था, इसका श्रम बल और इसमें परिवर्तन के पैटर्न दर्शाते हैं। भारत का श्रम बल अधिकांशतः कृषि-संबंधी और ग्रामीण है लेकिन अर्थव्यवस्था शहरी है। ऐसे में जहाँ कृषि में सर्वाधिक श्रम बल और न्यूनतम आउटपुट है, वहीं अधिकांश आउटपुट सेवाओं और विनिर्माण से आता है।

लेकिन चार्ट में ध्यान देने वाली बात यह है कि 2000 के दशक से भारतीय श्रम बल तेज़ी से कृषि से दूर हो रहा है और सेवाओं व निर्माण से जुड़ रहा है। श्रम शहरी हो रहा है। लेकिन इस श्रम का बहुत काम भाग विनिर्माण से जुड़ पाता है क्योंकि उसमें उच्च कौशल (जबकि कृषि छोड़कर आने वाले श्रम में कम कौशल होता है) की आवश्यकता होती है और वह पूंजी-आधारित क्षेत्र है।

इसके अलावा वैश्विक आर्थिक प्रणाली में भारतीय विनिर्माण दूसरों की तुलना में कम विकसित है। ऐसे में पारंपरिक तरीके से भारत में अगला औद्योगिक विकास मुश्किल लगता है। अपारंपरिक तरीका निर्माण से संभव है। यह हम इस धारणा पर कह रहे हैं कि निर्माण क्षेत्र में तकनीक श्रम का स्थान लेने की बजाय श्रम सहायक के रूप में स्वचालित काम करती है।

इस क्षेत्र में बिना कौशल या कम कौशल वाले श्रमिकों के साथ नई तकनीकों को स्वीकारा जा सकता है और इसकी माँग भी काफी है जो छोटी अवधि में आर्थिक विकास और रोजगार के अवसर ला सकता है। लंबे समय में अधिक देहाड़ी, अन्य क्षेत्रों पर सकारात्मक प्रभाव, निर्माण में उच्च-कौशल वाली नौकरियाँ और एआई, 3डी प्रिंटिंग व आईओटी जैसी उन्नत तकनीकें निर्माण क्षेत्र में देखने को मिल सकती हैं।

लेकिन आज की परिस्थिति देखकर लगता है कि भारत में निर्माण नई तकनीकों को स्वीकारने और विश्व के अनुसार निर्माण की गति के मामले में काफी पीछे है। निर्माण और परियोजना प्रतिबंधन अध्ययनों का साहित्य दर्शाता है कि निर्माण गुणवत्ता, समय पर कार्य पूरा और रखरखाव के मामले में भारत मानकों पर खरा नहीं उतरता।

इसका कारण कम कौशल वाला श्रम, निर्माण मानकों का अभाव और कानून व अनुबंध को लागू करने में दुर्बलता है। हालाँकि, हाल के कुछ अध्ययनों में इसका समाधान स्वचालन बताया गया है। अध्ययन कहता है कि भारत में विनिर्माण क्षेत्र में व्याप्त तकनीकों को स्वीकार करके लाभ 52 प्रतिशत बढ़ाया जा सकता है, समय और लागत को क्रमशः 58 प्रतिशत और 67 प्रतिशत बचाया जा सकता है।

प्रक्रिया को ध्यान से देखने पर पाएँगे कि निर्माणमें तकनीक कोई समरूपक इकाई नहीं है। नियोजन और डिज़ाइन, क्रियान्वयन और रखरखाव निर्माण के तीन चरण हैं। हर चरण में तकनीक और श्रम के आपसी संबंध भिन्न हैं।

डिज़ाइन और नियोजन- इस चरण में उच्च कौशल वाला श्रम लगता है जैसे सिद्धांत आधारित डिज़ाइनर, वास्तुशास्त्री, नियोजक और अभियंता तथा मॉडलिंग, बीआईएम और वर्चुअल रियलिटी जैसी तकनीकें लगती हैं। इससे श्रम कुशलता बढ़ जाती है और बेहतर उत्पादकता होती है।

क्रियान्वयन- इसमें निर्माण प्रबंधक और अभियंता जैसे उच्च कौशल वाले लोगों के साथ-साथ मध्यम-कौशल और कम-कौशल वाले निरीक्षक, श्रमिका और मिस्त्री भी होते हैं। इस चरण में तकनीक अपनाने से सरल कार्यों के लिए श्रम आवश्यकता कम हो सकती है लेकिन कठिन कार्यों में श्रमिकों की सहायता होगी। वे बेहतर, सरल और सुरक्षित तरीके से बेहतर निर्माण गुणवत्ता, समय और सामान की बचत कर सकते हैं।

रखरखाव- इस चरण में सामान्य देख-रेख करने वाले, इलेक्ट्रिशियन और मरम्मत करने वालों जैसा मध्यम-कौशल श्रम आवश्यक है। इस चरण में तकनीक के माध्यम से श्रम की सहायता होती है।

कई क्षेत्रों में तकनीकी विकास हो रहा है लेकिन अभी तक हमारे पास ऐसी मशीनें नहीं हैं जो मानव की फुर्ती, परिस्थिति आधारित समस्या समाधान और सामाजिक बुद्धिमता का स्थान ले पाए। निर्माण स्थल पर ये कौशल अति आवश्यक हैं, ऐसे में स्वचालन पूर्ण रूप से मानव का स्थान नहीं ले सकता है।

हालाँकि, जिन नवाचारों में “जैविक बिग डाटा” को आईओटी से जोड़ने की बात चल रही है, वहाँ हो सकता है हमारी इस अवधारणा को भविष्य में चुनौती मिले। श्रम क्षमता को कई गुना बढ़ाने वाली मशीनों के साथ यदि “जैविक बिग डाटा” और आईओटी को जोड़ दिया जाए तो श्रम की शारीरिक क्षमता, सटीकता और उत्पादकता बढ़ेगी।

ये तकनीकें निर्माण के क्षेत्र में भविष्य की बातें हैं लेकिन ध्यान आकर्षित कर रही हैं। इनमें क्षमता है कि मानवीय फुर्ती से भी अधिक चपलता से काम कर सके और ये सिर्फ काल्पनिक बातें नहीं हैं।

हाल ही में जर्मन कंपनी जर्मन बायोनिक ने क्रे एक्स नामक एक्सोस्केलेटन तैयार किया है जो कंपनी के अनुसार “स्व-शिक्षित होने वाला पावर सूट” है। इसे सैमसंग से 2 करोड़ डॉलर (140 करोड़ रुपये) की वित्तीय सहायता मिल रही है और कई उपभोक्ताओं की इसमें रुचि है।

इन प्रगतियों के समान स्तर पर आने के लिए भारत के निर्माण को बड़ी छलांग लगानी होगी। वर्तमान में भारत को “डिज़ाइन और नियोजन” चरण से शुरुआत करनी चाहिए जिसपर अभी तक अधिक ध्यान नहीं दिया गया है। इस चरण में तकनीक को अपनाना सरल है क्योंकि इसपर उच्च कौशल वाला श्रम काम करेगा, वहीं दूसरे चरणों में तकनीक का उपयोग कम और मध्यम-श्रम करेगा।

ऑटोडेस्क के मुख्य कार्यकारी एन्ड्रू एनगनॉस्ट ने कुछ ऐसा ही संकेत दिया है। भारतीय निर्माण ने नई तकनीकों को अपनाने में समय लगाया है। इस क्षेत्र में संचार का अभाव और कार्य प्रगति में खलल होने के कारण देरी और लागत वृद्धि होती है। स्वचालन से इन चीज़ों में सुधार हो सकता है।

अब बात करते हैं नई औद्योगिक क्रांति में भारत के नेतृत्व के दावे की, तो वास्तविकता यह है कि हम वर्तमान में उपलब्ध तकनीकों को अपनाने में भी पीछे हैं। जिन कारणों से भारत तकनीक और नवाचार को अपना नहीं पा रहा वह मौलिक और अनेक हैं।

सबसे पहले भारत के राजनेताओं और नीति-निर्माताओं को समझना होगा कि भारत दावा कर रहा है कृषि अर्थव्यवस्था से छलांग लगाकर उन्नत औद्योगिक अर्थव्यवस्था पर जाने का, बिना औद्योगीकरण या औद्योगीकरण के साथ होने वाले सामाजिक परिवर्तन के। ऐसे में भारत के पास मज़बूत संस्थाएँ, बेहतर कानून व्यवस्था और कौशल युक्त श्रम नहीं है जो औद्योगीकरण के साथ आ जाता है।

हालाँकि, ऐसा नहीं है कि भारत इसे प्राप्त नहीं कर सकता। निर्माण उद्योग से शुरू कर या आईआर4 में प्रवेश कर सकता है लेकिन आवश्यकता है बड़े संसाधनों और श्रम में कौशल विकास की जो कृषि से निर्माण तक, गाँवों से शहरों तक आ सकें। इसके साथ ही तकनीक को स्वीकारना और भूमि अधिग्रहण जैसे सुधार भी करने होंगे। इंफ्रास्ट्रक्चर मानकों और व्यवहारों का उदारीकरण भी आवश्यक है।

इन सुधारों से आर्थिक प्रगति, रोजगार प्रजनन व मूल्य संवर्धन होगा और छोटी अवधि में वर्तमान की सेवाओं तथा विनिर्माण उद्योग के लिए व्यापार सरलता बढ़ेगी। सुधारों से संस्थाएँ और कानून व्यवस्था सुदृढ़ होंगी। कुल मिलाकर बेहतर राष्ट्रीय और शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर होगा जिसका सकारात्मक प्रभाव मध्यम से दीर्घ अवधि में अन्य उद्योगों पर पड़ेगा, इससे उन्नत निर्माण तकनीक की स्वीकार्यता प्रोत्साहित होगी।

विनिर्माण के स्थान पर निर्माण के माध्यम से भारत का आईआर4 में अपरंपरागत प्रवेश हो सकता है मानव जीवन, राजनीतिक और पर्यावरण के संदर्भ में कम उथल-पुथल वाला और कम पीड़ादायक हो।