अर्थव्यवस्था / भारती
ई-कॉमर्स और डिजिटल व्यापार की स्वीकार्यता कोविड-19 महामारी से कैसे गतिशील हुई

युगारंभिक घटनाओं से प्रायः संपूर्ण उद्योगों का परिवर्तन छोटी अवधि में हो जाता है। कोविड-19 वैश्विक महामारी कुछ इसी प्रकार की घटना है जो भारत में ई-कॉमर्स के अंगीकरण और वृद्धि को चालित कर रही है।

कहा जाता है कि कई दशक निकल जाते हैं व कुछ नहीं होता है और फिर कुछ सप्ताह आते हैं जिनमें दशकों का काम हो जाता है। कुछ इसी प्रकार का स्थाई प्रभाव ई-कॉमर्स की स्वीकार्यता पर पड़ रहा है।

महामारी के कारण लोगों को घरों के अंदर ही रहना था लेकिन जीवन यापन के लिए उनकी आवश्यकताएँ तो वही रहीं। सामान खरीदने का सबसे सरल माध्यम था ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र जो बिना संपर्क में आए घर तक सामान पहुँचा दे।

पहली बार डिजिटल भुगतान करने वाले उपभोक्ताओं के ऑनलाइन खरीददारी को अपनाने से भी ई-कॉमर्स की वृद्धि को बल मिला। डिजिटल खरीददारी का भौगोलिक मानचित्र भी बदल गया जहाँ मेट्रो शहरों के बाहर दूसरे और तीसरे स्तर के नगरों में भी इसकी माँग बढ़ी।

देश भर के छोटे व्यापारों और स्थानीय रसद आपूर्ति का डिजिटलीकरण हो रहा है जिसने आपूर्ति पक्ष के कारकों को भी इस भौगोलिक विस्तार के अनुकूल बना दिया है। महामारी के कारण लोगों की मानसिकता बदली है।

पहले लोग प्रत्यक्ष रूप से देख-परखकर ही कुछ खरीदना पसंद करते थे लेकिन अब वे अपने घर की सुरक्षा और सहजता से ऑनलाइन खरीददारी कर रहे हैं। सामाजिक दूरी और संपर्क के बिना सामान प्राप्ति जैसी विशेषताओं के कारण मानसिकता में परिवर्तन आया है।

2020 की अंतिम तिमाही में पूर्ववर्ती वर्ष की तुलना में ई-कॉमर्स की ऑर्डर मात्रा और सकल व्यापार मूल्य में क्रमशः 36 और 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, यूनिकॉमर्स एवं कियर्नी द्वारा जारी ई-कॉमर्स ट्रेंड्स रिपोर्ट के अनुसार।

पर्सनल केयर, सौंदर्य और देखभाल सामग्रियों की खरीददारियों में 95 प्रतिशत की वृद्धि हुई, वहीं पूर्ववर्ती वर्ष की तुलना में शीघ्र उपयोग उपभोक्ता सामानों (एफएमसीजी) और स्वास्थ्य श्रेणियों में 46 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

कई प्रमुख ब्रांडों की वेबसाइट ने महामारी-पूर्व ट्रैफिक के दोगुना होने की बात रिपोर्ट की। दूसरे और तीसरे स्तर के शहरों में पूर्ववर्ती वर्ष की तुलना में मात्रा एवं मूल्य में 90 प्रतिशत की वृद्धि हुई। विश्व के अन्य भागों से भारत का अनुभव कोई अलग नहींं रहा।

हालाँकि, कई बड़े देश ई-कॉमर्स स्वीकार्यता की वृद्धि में भारत से आगे हैं। वैश्विक रूप से ऑनलाइन किराना की श्रेणी इस परिवर्तन की सबसे बड़ी लाभार्थी बनी है। चीन में सामाजिक व्यापार सबसे तेज़ी से उभरा है।

2015 में जहाँ 10 अरब डॉलर के साथ इसकी ई-कॉमर्स में 1 प्रतिशत की भागीदारी थी, वह 2020 तक 2.5 खरब डॉलर के साथ ई-कॉमर्स में 10 प्रतिशत की भागीदारी रखने लगा, उद्योग से आई रिपोर्टों के अनुसार।

यूनाइटेड स्टेट्स में 2020 में 7.92 खरब डॉलर की ई-कॉमर्स बिक्री हुई जो 2019 के 5.98 खरब डॉलर से 32.4 प्रतिशत की वृद्धि है, यूएस के वाणिज्य विभाग के अनुसार। 2019 में पूर्ववर्ती वर्ष से 15.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी और इस बार की वृद्धि दर इसके दोगुने से भी अधिक है।

अंतर्राष्ट्रीय यूरोमॉनिटर का अनुमान है कि 2020 से 2025 तक की अवधि में वैश्विक खुदरा क्षेत्र की संपूर्ण मूल्य वृद्धि में आधा योगदान डिजिटल का होगा। ई-कॉमर्स अवसरों की इस मूल्य वृद्धि में 55 प्रतिशत भागीदारी चीन और यूएस की होगी।

वैसे भी वैश्विक रूप से सबसे बड़े ई-कॉमर्स बाज़ारों से यही अपेक्षा है। हालाँकि, भारत भी काफी तेज़ी दिखा रहा है। विश्व आर्थिक मंच की एक रिपोर्ट के अनुसार 2030 तक भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता बाज़ार होगा।

अपेक्षा है कि 2024 तक भारत का ई-कॉमर्स 99 अरब डॉलर के आँकड़े को छू जाए जिसका अर्थ हुआ कि 2019 से 2024 तक की अवधि में 27 प्रतिशत की वार्षिक चक्रवृद्धि दर रहेगी (सीएजीआर)। हाल ही में आई ईवाइ इंडिया ट्रेंडबुक के अनुसार संभवतः किराना, फैशन और वस्त्र व्यापार इस वृद्धिशील प्रगति के मुख्य कारक होंगे।

वर्तमान में भारत के खुदरा ई-कॉमर्स में उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स और कपड़ों की 40-40 प्रतिशत की भागीदारी है। वहीं दूसरी ओर अपेक्षा है कि 2023 तक ई-कॉमर्स का मात्र 1 प्रतिशत यानी लगभग 10 अरब डॉलर ही भारत की किराना बिक्री ऑनलाइन हो सकेगी।

सामाजिक व्यवसाय जिसका वर्तमान मूल्य 1.5-2 अरब डॉलर है, 2025 तक उसका मूल्य 20 अरब डॉलर तक हो सकता है। इसका अर्थ होगा कि सीएजीआर 60 प्रतिशत होगा। 2030 तक 30 प्रतिशत की सीएजीआर से बढ़ते हुए यह 60 अरब डॉलर हो सकता है, बेन व सिकोइया की दिसंबर 2020 की रिपोर्ट के अनुसार।

अपेक्षा है कि भारत के छोटे शहरों में ई-कॉमर्स वृद्धि का अगला चरण सामाजिक व्यवसाय के माध्यम से ही आएगा। हाल ही में एक रिपोर्ट के माध्यम से यूबीएस विश्लेषकों ने माना है कि भारत में अमेज़ॉन और फ्लिपकार्ट जैसे ई-कॉमर्स मंचों को प्रतिस्पर्धा देने के संभाव्य स्रोत सामाजिक व्यवसाय और व्यापार से व्यापार (बी2बी) बाज़ार स्थल हैं।

भारत के डिजिटल ट्रेंड में एक और विशेषता है कि यहाँ ऑफलाइन और ऑनलाइन व्यापारों का अभिसरण हो रहा है। यह सहयोगी मॉडल ही संभवतः भारत में खुदरा व्यापार की वृद्धि का आधार बनेगा।

नासकॉम की रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 2030 तक ऑफलाइन और ऑनलाइन व्यापार के गठबंधनों से लगभग 1.2 करोड़ रोजगार के अवसर उत्पन्न होंगे। साथ ही ये गठबंधन व्यापार से उपभोक्ता (बी2सी) निर्यातों के व्यापार को वर्तमान के अनुमानित 2.1 अरब डॉलर से बढ़ाकर 2030 तक 1.25 खरब डॉलर कर देंगे।

इन सहयोगों से 8 अरब डॉलर का वृद्धिशील कर संग्रह भी होगा जो कुल खुदरा कर योगदान में 37 प्रतिशत की भागीदारी रखेगा। भले ही ई-कॉमर्स के क्षेत्र में भारत से बड़ी वृद्धि की अपेक्षा की जा रही है लेकिन वर्तमान में भारत के 8 करोड़ से अधिक छोटे व्यापारों में से 10 प्रतिशत से भी कम अपना सामान ऑनलाइन बेचते हैं।

हालाँकि, अधिक से अधिक छोटे व्यापार अब ई-कॉमर्स बाज़ार स्थल मंचों से जुड़ रहे हैं। भारत साक्षी बन रहा है कि कई छोटे व्यापार डिजिटल व्यापारों के रूप में स्वयं को पुनर्जीवित कर रहे हैं- उपभोक्ताओं को सीधे बेचना, डिजिटल भुगतान स्वीकारना, उपभोक्ताओं के द्वार तक सामान पहुँचाना, आदि।

कई व्यापार डिलिवरी और पिक-अप बिंदु की भूमिका भी निभाने लगे हैं। महामारी के पश्चात के विश्व की माँगों को समझते हुए भारत की उद्यमी प्रवृत्ति ने मुखर प्रतिक्रिया दी है। लगभग सभी शहरों में छोटे व्यापारी मोबाइल चैनल अपना रहे हैं, ऑनलाइन भुगतान लागू कर रहे हैं और तकनीक आधारित स्टार्ट-अपों के साथ सहयोग की संभावनाएँ खोज रहे हैं।

पहली बार ऐसा हो रहा है कि दूसरे और तीसरे स्तर के नगरों में परिवर्तन को इच्छुक लोग ई-कॉमर्स की ओर देख रहे हैं, और किसी विलासिता साधन के रूप में नहीं, बल्कि अपनी खरीददारी व्यवहार के एक अभिन्न अंग के रूप में।

भारत में खुदरा व्यापार का भविष्य इसी पर निर्भर करता है कि भारत के छोटे व्यापारी कितनी शीघ्रता से डिजिटलीकरण कर पाते हैं। एक बार ये व्यापार वर्चुअल विश्व में काम करना सीख जाएँ तो बड़े मंचों (जहाँ विभिन्न वस्तु व सेवाएँ उपलब्ध होती हैं) पर अपनी निर्भरता कम कर सकेंगे।

सामाजिक व्यवसाय और स्थानीय व्यवसाय के आकार लेने के बाद यह निर्भरता और घट जाएगी। हालाँकि, इस बात में कोई संदेह नहीं है कि भारतीय खुदरा व्यापार उत्पादकता, पहुँच और तकनीक के माध्यम से लाभ उठाने के लिए तैयार है।