अर्थव्यवस्था
भारत के ऑटो उद्योग में मंदी का दोष निर्मला का नहीं, वृद्धि के लिए पूर्व चुनावों का

आशुचित्र- भारत के नर्म ऑटो उद्योग के लिए कोई शीघ्र निर्वाण नहीं है। भविष्य में आवश्यक वाहनों में निवेश हेतु इसे संसाधन ढूँढने होंगे और साथ ही पिछले कुछ वर्षों की स्टेरॉयड आधारित बिक्री को पचाना होगा।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन के बजट में इलेक्ट्रिक वाहनों पर काफी ध्यान दिया गया है। इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) को खरीदने के लिए लिये गए ऋण के ब्याज पर कर छूट, लिथियम आयन बैटरी के आयत पर शुल्क हटाया गया और ईवी-संबंधी पुरजों, बैटरियों और इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माताओं को निवेश कर से छूट दी गई है।

हालाँकि देश में ईवी विक्रय और निवेश को बढ़ावा देने के लिए यह सब आवश्यक है, बजट के दिन ऑटो उद्योग के चेहरे उतरे हुए थे जब निर्मला सीतारमन के भाषण में उनके संकट के समाधान के लिए कुछ नहीं था। अन्य बातों के अलावा ऑटो उद्योग में लगातार आठ महीनों तक बिक्री में गिरावट रही है और आगामी वर्ष के लिए भी संभावनाएँ अच्छी नहीं दिख रही हैं।

ग्राहक का विश्वास क्षीण है और कार व बाइक क्रेता वित्तीय वर्ष की समाप्ति की प्रतीक्षा कर रहे हैं जब भारत स्टेज-6 से गैर-अनुपालित वाहन बड़ी छूट पर बेचे जाएँगे। 1 अप्रैल 2020 से सभी वाहनों को भारत स्टेज-6 के अनुसार होना है।

हालाँकि, इसमें ऑटोमोबाइल उद्योग का दोष है जिन्होंने इस चेतावनी पर पहले ध्यान नहीं दिया। सत्य यह है कि भारत ने सार्वजनिक परिवहन की भारी विफलता के चलते निजी वाहनों को समयापूर्व प्रोत्साहित किया। इसके फल स्वरूप पिछले दशक में यात्री और निजी वाहनों की बिक्री में बाढ़ आ गई, विशेषकर 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी के बाद जब उत्पाद शुल्क (एक्साइज़) में छूट दी गई थी।

यदि आप स्टेरॉयड के सहारे वृद्धि करते हैं तो आपको उसका मूल्य चुकाना होता है। यही मूल्य है जो यह उद्योग आज चुका रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ऑटोमोबाइल उद्योग में कुछ मौलिक परिवर्तन भी हुए हैं।

पहला, डीज़ल का घटता चलन। पिछले वर्ष जर्मनी ने शहरों को डीज़ल कारों पर प्रतिबंध लगाने की अनुमति दी, विशेषकर पुरानी कारों पर और संभवतः इसका विस्तार पूरे यूरोप में होगा। भारत में ऐसा और भी पहले हुआ जब सर्वोच्च न्यायालय ने 2015 में दिल्ली में बड़ी एसयूवी डीज़ल गाड़ियों पर प्रतिबंध लगाया। पिछले वर्ष अक्टूबर में कहा गया कि 1 अप्रैल 2020 से भारत स्टेज-4 गाड़ियों की बिक्री बंद हो जाएगी, भले ही वाहनों का निर्माण समय सीमा से पूर्व हुआ हो।

छोटे डीज़ल इंजन की लागत में बढ़त के साथ मारुति और रिनॉल्ट ने अप्रैल 2020 से इसका उत्पादन और बिक्री बंद कर देने की घोषणा की है। अब डीज़ल केवल उच्च स्तरीय गाड़ियों और व्यवसायिक वाहनों के लिए बेचा जाएगा। भारत विशेष में 2014 से डीज़ल की तुलना में पेट्रोल वाहनों पर वित्तीय लाभ ने डीज़ल वाहनों को बाज़ार से निकाला है। भले ही आज भी डीज़ल पेट्रोल से सस्ता है लेकिन इंजन की अधिक लागत से यह वित्तीय लाभ नहीं मिल पाता, विशेषकर छोटे स्तर के वाहनों में।

दूसरा, नगरीय परिवहन में ईवी का बढ़ता चलन। वैश्विक स्तर पर प्रदूषण को लेकर चिंता के कारण कई शहर अनिवार्य रूप से ईवी की ओर रुख कर रहे हैं और भारत भी 2025 तक पेट्रोल और डीज़ल दुपहिया वाहनों और 2023 तक तिपहिया वाहनों पर प्रतिबंध पर विचार कर रहा है। हालाँकि यह कदम बहुत वृहद और बहुत जल्दी है लेकिन दिशा स्पष्ट है- इंटरनल कंबशन इंजनों के गिनती के दिन रह गए हैं। भीड़ वाले शहरों में ईवी का चलन बढ़ जाएगा क्योंकि वे प्रदूषण कारक नहीं हैं।

तीसरा, सहभाजित गतिशीलता (शेयर्ड मोबिलिटी)- ओला और उबर के उत्थान के साथ कम ही लोग कार या दुपहिया वाहन खरीदना चाहेंगे। दो-तीन गाड़ियाँ रखने वाले परिवारों में गिरावट आएगी क्योंकि सार्वजनिक परिवहन, मेट्रो और शेयर्ड मोबिलिटी से यात्रा आसान हो जाएगी।

चौथा, जीवनचक्र का विषय है। यदि हम मानकर चलें कि एक गाड़ी 10 वर्षों तक चलती है और यह भी कि पिछले दशक में करोड़ों लोगों ने वाहन खरीदें हैं तो निस्संदेह ही उपयोग योग्य वाहनों की पर्याप्त संख्या है, विशेषकर भारत जैसे देश में। कारों का ऐसा व्यापार चक्र केवल भारत में ही नहीं है। कनाडा में भी इसी कारण से ऑटो बिक्री लगातार 16 महीनों से गिर रही है। यूएस में भी पूरे 2019 में बिक्री में गिरावट रही है।

आप भारत के कुल 10 प्रतिशत परिवारों से प्रति वर्ष वाहन खरीदने की अपेक्षा नहीं कर सकते। 2013-14 और 2018-19 के बीच घरेलू कारों की बिक्री बढ़कर 1.84 करोड़ से 2.66 करोड़ हो गई थी। इसका मतलब यह कि भारत के 10 प्रतिशत परिवार प्रति वर्ष एक ऑटोमोबाइल खरीद रहे हैं। ऐसी दर उस स्थिति में बरकरार नहीं रह सकती जब शहरों में च्रैफिक बढ़ रहा हो और लोग धुएँ और धुंध से बीमार पड़ रहे हों।

वृहद तौर पर ऑटोमोबाइल बिक्री में लगातार गिरावट का कारण सड़कों पर पहले से ही पर्याप्त पंजीकृत वाहनों का होना है। इसमें उछाल तब ही आ सकती है जब प्रावधान लाया जाए कि 15 वर्ष से अधिक पुराने वाहनों को सड़कों पर नहीं चलने दिया जाएगा और ईंधन-कुशल व कम प्रदूषण कारक वाहनों की खरीद पर लाभ दिया जाए।

भारत के नर्म ऑटो उद्योग के लिए कोई शीघ्र निर्वाण नहीं है। भविष्य में आवश्यक वाहनों में निवेश हेतु इसे संसाधन ढूँढने होंगे और साथ ही पिछले कुछ वर्षों की स्टेरॉयड आधारित बिक्री को पचाना होगा।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।