अर्थव्यवस्था
स्वतंत्रता दिवस संबोधन: मोदी ने कृषि मोर्चे पर सही आवाज उठाई

प्रसंग
  • प्रधान मंत्री ने लाल किले से सही आवाज उठाई है। उन्होंने किसानों के कल्याण और सौर ऊर्जा के माध्यम से खेती करने के बारे में बात की। इसका मतलब है कि सरकार ने न केवल वर्तमान स्थिति पर ध्यान दिया है, बल्कि उभरती हुई तकनीकि पर भी ध्यान दिया है

एक ऐसे देश के लिए, जो चीनी, दाल, गेहूं और चावल जैसी कृषि वस्तुओं के उत्पादन की भरमार से पीड़ित है, कृषि निर्यात नीति के साथ केंद्र एक समाधान है।

हम कई सालों से कृषि निर्यात नीति के बारे में सुन रहे हैं, लेकिन जब 2006-08 में देश को गेहूं और चावल की कमी की तरह किसी भी कमी का सामना करना पड़ा, तो सरकार अपनी कार्यवाही पर दो कदम पीछे चली गई।

न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी), कृषि बीमा, और दालों जैसी फसलों को बढ़ावा देने जैसी नीतियों की बदौलत भारत न केवल एक आत्मनिर्भर राष्ट्र बन गया है बल्कि कृषि अधिशेष भी बन गया है।

भारतीय किसानों के लिए समस्या यह है कि, पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक स्तर पर उपयोगी वस्तुओं की कीमतों में गिरावट आई है, खासतौर पर गेहूं, चावल और मकई (मक्का) जैसे खाद्यान्नों की कीमत में। अच्छे उत्पादन और कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के चलते उच्च कैरियोवर स्टॉक की वजह से कीमतें कम हैं।

ऐसे परिदृश्य में, भारत को वस्तुओं के निर्यात के बारे में सोचना है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भारतीय किसान कृषि लागत में किए गये खर्च से कम कीमतें न प्राप्त करें। चालू वित्त वर्ष के बजट में, अरुण जेटली ने घोषणा की थी कि केंद्र एक कीमत के फॉरमूले को लागू करेगा जो सुनिश्चित करेगा कि किसानों को एमएसपी के रूप में उत्पादन लागत का 150 प्रतिशत मिलेगा। फसलों के लिए एमएसपी की घोषणा सही मायने में इसी जून में की गई थी।

वास्तव में मैगसेसे पुरस्कार विजेता और भारत की हरित क्रांति के वास्तुकार, डॉ एम एस स्वामीनाथन, नरेंद्र मोदी सरकार की एक एमएसपी, जो कि किसान की उत्पादन लागत का कम से कम 150 प्रतिशत है, लागू करने की पहल की प्रशंसा करने वाले पहले व्यक्ति थे।

उन्होंने एक लेख में लिखा है कि, “राष्ट्रीय किसान आयोग (स्वामीनाथन की अध्यक्षता में) ने अपनी रिपोर्ट 2006 में प्रस्तुत की थी। अब सरकार इसे केवल लागू कर रही है।”

प्रधानमंत्री मोदी ने बुधवार (15 अगस्त) को अपने स्वतंत्रता दिवस के संबोधन में बताया कि उनकी सरकार ने कुछ ऐसा किया है जिसे लागू करने का साहस अन्य किसी सरकार के पास नहीं था – किसानों को मिलेगी उत्पादन लागत की 150 प्रतिशत कीमत।

उन्होंने कहा, “उच्चतम एमएसपी की मांग वर्षों से लंबित थी। किसानों से लेकर राजनीतिक दलों एवं कृषि विशेषज्ञों तक, हर कोई इसकी मांग कर रहा था, लेकिन हुआ कुछ भी नहीं।”

जब सरकार ने एमएसपी की घोषणा की है, जो उत्पादन लागत पर 150 प्रतिशत रिटर्न सुनिश्चित करेगी, तो इसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि किसानों के उत्पादन को बिना किसी समस्या के उठाया (खरीदा) जाए। यही वह जगह है जिसके लिए कृषि निर्यात नीति की घोषणा की गई है। पिछले कुछ वर्षों में दालों, विशेष रूप से अरहर, मूंगफली और कपास की खेती करने वाले किसानों को कम कीमत की समस्याओं का सामना करना पड़ा है। गन्ना किसानों के सामने भी समस्याएं आ रही हैं क्योंकि चीनी मिलों के भण्डार भर गये हैं।

स्थिति तभी ठीक हो सकती है जब सही नीतियों की घोषणा की जाए। उदाहरण के लिए, मनमोहन सिंह की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के दौरान, प्राकृतिक रबर उत्पादकों को कम कीमतों के कारण नुकसान सहना पड़ा। तब सरकार ने रबर निर्यात को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया। लेकिन फिर, देश स्थिति बिगड़ गई और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्थानीय कीमतें वैश्विक कीमतों की तुलना में अधिक थीं। कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के बाद रबड़ की कीमतें बढ़ीं और निर्यात की योजनाएं भुला दी गईं।

इसी तरह, चीनी मिलों को अधिक उत्पादन की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। उन पर भरे हुए भंडारों का  बोझ हैं क्योंकि किसान उच्चतम रिटर्न को देखते हुए गन्ना उत्पादन कर रहे हैं। कृषि लागत और उत्पादन आयोग के मुताबिक, गन्ना, एक किसान को प्रत्येक 100 रुपये के खर्च पर 80 रुपये का लाभ देता है। इसी कारण गन्ना का क्षेत्र और उत्पादन बढ़ रहा है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि सरकार ईंधन में इथेनॉल के उपयोग को प्रोत्साहित करने जैसी नीतियां अपना रही है। मोदी ने अपने स्वतंत्रता दिवस के संबोधन में कहा कि उनके शासन के दौरान इथेनॉल उत्पादन में तीन गुना व्रद्धि हुई है। इतना ही नहीं, तेल कंपनियों से इथेनॉल खरीदने और ईंधन के साथ मिश्रण करने के लिए कहा गया है।

फिर भी, केवल इथेनॉल गन्ना किसानों द्वारा सामना की जाने वाली समस्याओं को हल करने में सक्षम नहीं होगा। किसानों के लिए बकाया राशि बढ़ रही है और इस वित्त वर्ष के अंत तक यह राशि 20,000 करोड़ रुपये तक जा सकती है। मोदी सरकार के लिए समस्या यह है कि उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक में गन्ना किसान वोट बैंक के एक महत्वपूर्ण हिस्से का निर्माण करते हैं। समस्या को हल करने में सरकार को निष्क्रिय होते नहीं देखा जा सकता है।

केंद्र मिलों द्वारा चीनी के भंडारण हेतु फ़ंड प्रदान कर रहा है, लेकिन जब तक कि वस्तु निर्यात नहीं की जाती है, तब तक कंपनियों को नकदी संकट का सामना करना पड़ सकता है। परिणामस्वरूप जो किसानों के लिए बकाया राशि बढ़ने का कारण बन जाएगा। इसलिए, चीनी के निर्यात में मदद करने के लिए सरकार द्वारा एक निर्यात नीति को लागू करना उचित है।

अगले कुछ महीनों में खरीफ की फसलों का आगमन शुरू हो जाएगा। ऐसा लगता है कि दालों या अन्य फसलों जैसे मक्का की भरमार हो सकती है।

इन परिस्थितियों में, सरकार को ऐसी किसी भी आकस्मिक स्थिति से निपटने के लिए तैयार रहना उचित होगा, जो कि किसानों के बीच परेशानी पैदा कर सकती है। विपक्ष पहले से ही आग भड़काने के हर अवसर का इंतजार कर रहा है, विशेष रूप से किसानों के बीच संकट के लिए। सरकार के लिए कृषि उत्पाद निर्यात नीति को लागू करना ही पर्याप्त नहीं है। इसे कृषि से संबंधित और लाभप्रद व्यवसायों को बढ़ावा देने के बारे में भी विचार करना होगा। सरकार को किसानों को वायदा कारोबार में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए, विशेष रूप से उन विकल्प के लिए जो अब केवल चुनिंदा धातुओं में उपलब्ध हैं।

इसके लिए प्रधान मंत्री ने लाल किले से सही आवाज उठाई है। उन्होंने किसानों के कल्याण और सौर ऊर्जा के माध्यम से खेती करने के बारे में बात की। इसका मतलब है कि सरकार ने न केवल वर्तमान स्थिति पर ध्यान दिया है, बल्कि उभरती हुई तकनीकि पर भी ध्यान दिया है।

मोदी ने कहा है कि उनकी सरकार निर्णय लेने से डरती नहीं है। अगर सरकार अपने वचनों को क्रियान्वित करने का विकल्प चुनती है, तो सरकार के सामने आने वाली प्रमुख समस्याओं में से एक को हल किया जा सकता है।

उत्पादन के आधिक्य की स्थिति हल हो जाने के बाद नीति को अदूरदर्शी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए या भुलाना नहीं चाहिए। यह आने वाले वर्षों में किसानों के हितों की सेवा करने में सक्षम होना चाहिए।

एमआर सुब्रमणि स्वराज्य के कार्यकारी संपादक हैं। वे  @mrsubramani  पर ट्वीट करते हैं